भगत सिंह ने सच्चे देश भक्त के लिए प्राण न्यौछावर कर दिये - डॉ बी .आर .नलवाया मंदसौर
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भगतसिंह का जन्म 28 सितम्बर, 1907 को लायलपुर जिले के बंगा में हुआ था, जो इस समय पाकिस्तान में है । भगतसिंह की उम्र 12 वर्ष थी, तब जलियांवाला बाग हत्याकांड हुआ था,तब उन्होंने लहू से लाल हो चुकी बाग की मिट्ठी को अपनी मुट्ठी में भरकर सौगंध ली "अग्रेजों को छोडूंगा नहीं।" " जहां भगतसिंह की उम्र 12 वर्ष उस उम्र में बच्चे खेलते कूदते है, वही भगतसिंह के जैहन में तय हुआ ,कि वे अग्रेजों से खून की होली खेलेंगे। उसे उन्होंने कर दिखाया। उनके दिमाग तय लक्ष्य था -" अंग्रेजों का अंत"---
14 वर्ष की आयु में ही भगत सिंह ने सरकारी, स्कूलों की पुस्तकें और कपड़े जला दिए। इसके बाद इनके पोस्टर गांवों में छपकर लगे ।
दूसरी ओर 9 अगस्त, 1925 को सरकारी खजाने की ट्रेन को लूट लिया। इस तरह वे क्रांतिकारी, देश भक्त ही नही बल्कि अध्ययनशील, विचारक, कलम के धनी, दार्शनिक, चिंतन, लेखक, पत्रकार के साथ महान क्रांतिकारी थे।
वे अपने लेखों से क्रांतिकारी विचार रखते थे। अपने लेख में कई पूजी पतियों को अपना शत्रु बताया। उन्होंने लिखा कि मजदूरों का शोषण करने वाला चाहें एक भारतीय क्यों ना हो , वह उनका शत्रु है।
वे सच्चे देश भक्त थे, जिन्होंने अपना जीवन देश की आजादी के लिए समर्पित किया। उनके आदर्श और सिद्धान्त आज भी प्रासंगिक है। उनका संघर्ष-समाजवादऔर समानता, देश की आजादी और स्वतंत्रता, शिक्षा और जागरूकता, साम्राज्यवाद पर था।
अग्रेजों ने कहा फांसी की तारीख नजदीक है- माफी माँग लो , भगत सिंह
जान बच जाएगी। उन्होंने लिखा कि___
मुझे फांसी ना दी जाए ,क्यों कि फांसी तो अपराधी को दी जाती है, और मैं तो क्रांतिकारी हूँ। उन्होने कहा-मैं भारत माँ का सच्चा सिपाही हू ,गोली मार ही जाए, गोली से मरने में ही सिपाही की शान है। सरकार की मंशा पूरी नहीं हुई और भगतसिंह को फांसी दे दी गई। इस् तरह 23 मार्च,1931 को भगत सिंह के साथ राजगुरु और सुखदेव को लाहौर जेल में फांसी दी गई थी।
डॉ बी .आर .नलवाया मंदसौर
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