तार तार होती मिथिला की संस्कृति - प्रदीप कुमार नायक
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मिथिला महोत्सव बनाम अश्लील कार्य प्रणाली प्रशासन मौन क्यों ?
प्रदीप कुमार नायक
स्वतंत्र लेखक एवं पत्रकार
पर्यटन विभाग, बिहार सरकार और जिला प्रशासन मधुबनी के संयुक्त तत्वाधान में 20 और 21 मार्च को संध्याकालीन सत्र में आयोजित मिथिला महोत्सव मनाएं जाने में मिथिला की संस्कृति से आज की नई पीढ़ी को जोड़ने का उद्देश्य सहज निहित हैं l क्या यही मिथिला की संस्कृति हैं l जहां मंच पर कलाकार अश्लीलता परोसती और उतने ही मजे उठाते प्रशासन के साथ दर्शक l
मिथिला महोत्सव में मैथिली संस्कृति ,मैथिली गायन , झिझीयां नृत्य , मैथिली भक्ति गीत, लोकगीत ,विवाह गीत शिव नचारी तथा मैथिली सभ्यता को दिखाना चाहिए न कि हिन्दी फूहड़ गाने पर अश्लीलता l आज स्वतंत्रता की परिभाषा नारी समाज के लिए बदलती जा रही हैं l क्योंकि जिस तरह मधुबनी वॉटसन हाई स्कूल के मैदान में मिथिला महोत्सव का आयोजन किया गया l इससे तो यही प्रतीत होता है कि मंच पर उपस्थित सिंगर अपने पहनावे अपने खुद के फैसले लेती हैं l क्या इस पर मर्द समाज को आंखे मूंद लेनी चाहिए l जहां क्लेक्टिव डांस,गाने ने मिथिला के संस्कृति को धूमिल कर दिया हैं l मिथिला की धरती जहां पर रियासतों द्वारा तहजीब व परंपराओं की ऊंची इमारतें खड़ी की गई हैं l समय के साथ वे दीवारे दरक रही हैं l अश्लीलता सारी हदें पार रही हैं , जिससे बच्चों की मानसिक स्थिति पर खराब असर पड़ रही है l लोगों को गढ़ने की जिम्मेदारी जिन पर हैं, वे कितने संवेदनशील हैं और किस तरह के मूल्यों व संस्कारों के वाहक हैं l आज लगता हैं कि सब कुछ बिकाऊ हो गया हैं l इसकी वजह केवल एक ही हैं मीडिया तथा सरकारी मानसिकता l सरकार को चाहिए कि वे अश्लील महोत्सव और साहित्य पर रोक लगाएं l इसे रोकने के लिए समाज को आगे आना चाहिए l
क्या महिलाएं कुछ भी कर सकती है और कुछ भी पहन भी सकती है!मर्द समाज को अपनी आँखे बन्द कर लेनी चाहिए!आखिर कहाँ से कहाँ आ गए हम!यह एक विचारणीय प्रश्न है ? किसी विवाह समारोह, पार्टी या सड़को पर पुरुष के पेंट की जीप भी खुली रह जाय तो वो बड़ा लज्जित महसूस करता है!वहीं कुछ अभिजात्य और आधुनिक वर्ग की महिलाएं जब तक अपनी उधड़ी हुई पीठ, नाभि दर्शन और अध खुले वक्ष न दिखा दे, उसके कलेजे को ठंडक नहीं मिलती है!संस्कारित मातृशक्ति इसे अन्यथा न ले l पर जो सत्य है वो सत्य है और कड़वा भी l एक युद्ध इस पाश्चात्य संस्कृति के खिलाफ भी लड़ना पड़ेगा, जिन्होंने सनातन की मर्यादा को तार -तार कर रखी है!
मिथिला महोत्सव में कलाकारों के रियलिटी शो, डांस स्टेज प्रोग्राम देख लीजिए l वे कैसे कैसे हिन्दी फ़िल्मी गानों पर डांस करते है या फिर गाते हैं l कमरिया करे लपालप ,मेरी आज्ञा का , याद आ रहा हैं,ये कैसा जादू डाला रे , जवानी जाने मन, जिमी जिमी आजा आजा , ये कैसा जादू डाला रे जैसे गानों पर डांस करते है !उधर बच्चों के माता -पिता एवं अभिभावक खूब तालियां बजाते है!पब्लिक रियलिटी शो, डांस कांपटिशन और स्टेज प्रोग्राम एवं बिग बॉस भी इसी श्रेणी में आते है!शर्म और हया कहाँ बची है? क्या शर्म और हया से मिथिला के समाज मुक्त हो सकता है ? बच्चों को अच्छी शिक्षा नहीं देंगे!बल्गर विज्ञापन दिखाएंगे!सिनेमा दिखाएंगे और फिर बात करेंगे कि बारह -चौदह वर्ष के बच्चे बच्चियां घर से भाग रहें है !दरअसल,हमारा समाज धीरे धीरे टूट रहा है l कहीं से तो कोई आवाज़ इनके खिलाफ नहीं उठता,ना माता -पिता आवाज़ उठाते है और ना समाज उठाता है l
औरतों की पहचान,उसके चरित्र रसोई घर में होती है और जो औरतें सिर्फ फैशन और अंग प्रदर्शन में ही लगी रहती है,वह घर नहीं बसा सकती है!इस बात की उदाहरण से पूरा अमेरिका और यूरोप भरा पड़ा है ! अब भारत के मिथिलांचल में भी शुरू हो गया है,जो कि बड़े शहरों के अलावा छोटे शहरों व बाजारों में भी दिख जाएगा!हमारा समाज कहाँ पहुंच गया है!ऐसी घटनाओं का विस्फोट इस समाज में क्यों हो रहा है? इसके मूल में क्या है ? ऐसा अनेकों प्रश्न है,जिसका जबाब किसी के पास नहीं है l आज आधुनिकता तथा भौतिकता के दौर में जिस तरह नारी समाज की स्वतंत्रता तथा समानता की चहुओर बात हो रही तथा भारत जैसे राष्ट्र में उसे संवैधानिक दर्जा दिया जा रहा हैं l क्या इस तरह की स्वच्छंदता उचित हैं ?
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