Tuesday, 3 November 2026

पर्यावरण - संरक्षण - महाकवि डा अनन्तराम चौबे अनन्त

अंतरराष्ट्रीय हिन्दी साहित्य मंच हमारीवाणी 

साप्ताहिक प्रतियोगिता हेतु 
विषय.. पर्यावरण/ संरक्षण 

महाकवि डा अनन्तराम चौबे अनन्त जबलपुर 
कविता...

   पर्यावरण/ संरक्षण - महाकवि डा अनन्तराम चौबे अनन्त

पर्यावरण को सभी बचालो
पेड़ पौधे कुछ घर में लगा लो ।
शुद्ध हवा इनसे मिलती है ।
पेड़ पौधों को कटने से बचालो ।

मौसम चाहे जो भी हो
छांव पेड़ की मिलती है ।
फलदार पेड़ यदि है तो
फल भी खाने मिलते है ।

सारा सच गर्मी की तपती धूप 
से पेड़ की़ छांव  मिल जाये।
चलते हुए मुसाफिर को तपती
धूप में थोड़ी राहत मिल जाये।  

जीवन में एक ठांव चाहिये
रोटी कपड़ा मकान चाहिये ।
हवा पानी और धूप चाहिये
साफ सुधरा वातावरण चाहिये ।

पर्यावरण तो साफ चाहिये
बेटा, बेटी बच्चे  दो चाहिये ।
स्वच्छता और सफाई हो
हर घर में शौचालय चाहिये ।

गांव शहर रहो जहां भी हो
पर्यावरण बस साफ चाहिये ।
किसी का दम न घुटे कही भी
जीवन में सुख चैन चाहिये ।

भाईचारा बना रहे देश में
अमन चैन होना ही चाहिये ।
 पर्यावरण संरक्षण मना लो
एक पौधा घर में भी लगा लो ।

सुखमय जीवन जीना है तो
पेड़ पौधों को कटने से बचा लो ।
पर्यावरण जब शुद्ध रहेगा
जीवन अपना सुख मय कर लो ।

 
पृथ्वी के आंचल में रहकर
हम सबको जीवन मिलता है ।
सारा सच पृथ्वी सबकी माता है
सुख चैन यहां पर मिलता है ।

धरती को हम स्वच्छ रखें
ये फर्ज हमारा बनता है ।
पेड़ पौधे पृथ्वी में लगायें
जीवन सुख मय रहता है ।

किसान का जीवन खेतों में
जो अपनी  फसल उगाता है ।
कड़ी मेहनत खेतों में करता
अनाज पैदा भी वो करता है  ।

तरह तरह की खनिज सम्पदा
पृथ्वी के अन्दर भरी पड़ी है ।
पावन पवित्र नदियां बहती हैं
जो पृथ्वी की गोद में बहती हैं ।

शहर गांव में रहने वालों को
पानी नदियों से मिलता है ।
मनुष्य पेड़ पौधे जानवरों का
इन नदियों से जीवन चलता है ।

पेड़ पौधों को कभी न कांटों
पर्यावरण  सुरक्षित रहता है ।
खाने को फल इनसे मिलते हैं
सबका जीवन सुरक्षित रहता है।

फर्ज सभी को निभाना है 
जो अपना दायित्व समझते हैं ।
काम कोई मुश्किल नही है
जो फर्ज निभाना समझते हैं ।

बच्चों को भी माता पिता के
प्रति अपना फर्ज निभाना है ।
माता-पिता की सेवा करना 
सारा सच फर्ज निभाना है ।

रीति रिवाज बने पुरखों के
सबको इसे निभाना है ।
घर परिवार के साथ रहकर 
पुण्य का कार्य भी करना है ।

देश में जो नियम कानून बने हैं
उनका भी पालन करना है ।
न्याय कानून का पालन करके 
पर्यावरण/ संरक्षण फर्ज निभाना है ।

   महाकवि डा अनन्तराम चौबे अनन्त
    जबलपुर म प्र 

जिम्मेदारी - नन्दलाल मणि त्रिपाठी पीताम्बर

जिम्मेदारी - नन्दलाल मणि त्रिपाठी पीताम्बर

जिम्मेदारी अर्थात कर्तव्य दायित्व का बोध जो किसी भी व्यक्ति के व्यक्तित्व का निर्धारण करता है व्यक्तित्व का निर्धारण करता है जिम्मेदारियों का निर्वहन के तौर तरीको से होता है!
उदाहरण के लिए यदि देश के प्रधान मंत्री, मंत्री, प्रशासनिक अधिकारियों के व्यक्तित्व पर टिप्पणी सिर्फ उसके कार्य निष्पादन कि दक्षता, क्षमता कार्य प्रणाली, एवं निर्णय लेने कि क्षमता एवं लिए गए निर्णयों के पड़ने वाले दूरगामी, 
मध्यकालिक,अल्पकालिक प्रभावों पर निर्धारित होता है!समाज राष्ट्र समय के साथ चलता रहता है उसकी नियति है काल समय के साथ निरंतर चलना काल समय कि गति नित्य निरंतर को जो भी व्यक्ति अपनी उपस्थिति से नव आदर्श, चेतना कि जागृति करता है उसे समय समाज राष्ट्र अपने अतीत के संस्मरण मे संजोये वर्तमान को आदर्श प्रेरणा के रूप मे प्रस्तुत करता है तो भविष्य के पथ प्रकाश के आचार संघीता या आचरण स्वरूप मे प्रेषित क़र नव संस्कृति संस्कार का आवाहन करता है!
जिम्मेदारी एक एहसास है जिम्मेदारी योग्यता का निर्धारण का प्रासंगिक परिणाम है जिम्मेदारी ही वर्तमान कि परिभाषक अतीत का अंतर्मन एवं  विकास कि धुरी होती है जिम्मेदारीयों के निर्वहन मे महत्वपूर्ण तथ्य स्पष्ट एवं सार्वजनिक है सदैव सार्थक सकारात्मक सोच विचार व्यवहार एवं सात्विक व्यवहार आचरण ही जिम्मेदारी निर्वहन का प्रथम सूत्र है!
जिम्मेदारीयो के बहुत स्पष्ट है कि आत्मीक निष्पक्षता, निरपेक्षता निर्विकार क्षमता का प्रवाह एवं भवनाओं पर नियंत्रण कारगर होता है!
जिम्मेदारी के निर्वहन मे भवो कि संलीनता कि अनवरत आवश्यक है न कि विराम!
जिम्मेदारीयो के एहसास निर्वहन मे महत्वपूर्ण है संतुलित संयमित 
शांत चित्त कि अनिवार्यता है!
जिम्मेदारी बचपन मे विद्यालय जाने से शुरु होती है जहाँ अध्ययन के गुरूतर जिम्मेदारी का निर्वहन करना पढ़ता है ज़ब अध्ययन से विशिष्ट, अति विशिष्ट परिणाम प्राप्त करना ही सभ्य समाज राष्ट्र के निर्माण मे स्वंय कि निर्धारित भगीदारी को पूर्णता संपूर्णता के व्यक्ति व्यक्तित्व को 
प्रचारित प्रसारित करता हुआ राष्ट्र समाज समय के समक्ष एक असाधारण चुनौती को प्रस्तुत करता है!!

नन्दलाल मणि त्रिपाठी पीताम्बर 
गोरखपुर उत्तर प्रदेश!!

कुल्हाड़ी में लकड़ी हमारी पिरोई हुई है - डाॅ० योगेश सिंह धाकरे "चातक"

कुल्हाड़ी में लकड़ी हमारी पिरोई हुई है - डाॅ० योगेश सिंह धाकरे "चातक"
——————————————————

पर्यावरण की रक्षा तो,
तेरा धर्म होना चाहिये ।
शत्रु कोई भी हो.....तेरा
तरू तो मित्र होना चाहिये ।

जीवनदाता है सभ्यतायों के,
इनके संरक्षण पर सवाल है ।
यें ही प्राण वायु के दाता हैं,
अस्तित्व पर ही तलवार है ।

प्राणवायु भी इनकी..
बिना मूल्य की दी हुई है ।
किन्तु कुल्हाड़ी मे लकड़ी,
हमारी  ही पिरोई हुई है ।

हमारी साँसे जो चल रही है..
इनका ही तो उपकार है ।
प्राणवायु सहित अन्न से ही
जीवित समूचा संसार है ।

विनाश करा है वसुधा का..
जल थल नभ दुषित कर ।
बस दोहन कर पाया है तू
धरा  को  प्रदूषित  कर ।

तेरी चाहतों का अन्त नही, 
तुने किसी को नही छोड़ा है ।
प्रकृति हमारी शुभचिंतक थी,
हर मिथक को इसने तोड़ा है ।

करोना में कृत्रिम हवा के लिये,
कितनी व्यापक मारा मारी थी !
उन्होंने भी बहुत सिर पीटे थें..
जिनकी जेंबे अथाह भारी थी !!

एक पेड़ से जलाया जाता है.
तुझे मोक्ष की प्राप्ति के लिये !
मोक्षदाता को क्या दे पाता है..
तू मोक्ष के परिपेक्ष के लिये !!

मोक्ष पाता है प्राणवायु पाता है
रे मानव फिर भी नही अघाता है
हर तरह से, दोहन कर लेता है
पर तू,प्यार क्यों नही दें पाता है

————————————————
रचयिता....
डाॅ० योगेश सिंह धाकरे "चातक"
{ओज कवि} अलिराजपुर  म. प्र
@ सर्वाधिकार सुरक्षित...©®
————

सुरक्षा - संजय वर्मा "दृष्टि "

सुरक्षा - संजय वर्मा "दृष्टि "

डरी -डरी सी दहशत से भरी जिन्दगी
पग -पग पर  भय से भरी जिन्दगी
मुड -मुड सी पलट से  भरी जिन्दगी
सूनी राहों पर दबोची जा रही जिन्दगी।

हैवानियत  से सनी जा रही जिन्दगी
हर चौराहों पर अब चीख रही जिन्दगी
चीखों को रोकों जरा, हैरान है जिन्दगी
दुष्कर्मियों पर कसों फंदा रो रही जिन्दगी।

रेप पीड़ित की सिसकती रही जिन्दगी
सुरक्षा की मदद सबसे मांग रही जिन्दगी
कलयुग भी हैरान देख ये दुःख भरी जिन्दगी
गुहार किससे करे ढूंढ़ रही आंसू भरी जिन्दगी।

स्तब्ध है सारी दुनिया देख लाचार भरी जिन्दगी
बेटियों की ये दशा कहा गई सुरक्षा भरी जिन्दगी

फांसी की सजा मिले ये इंतजार कर रही जिन्दगी

बिना भय के रहे लड़कियां ,दुआ मांग रही जिंदगी। 

संजय वर्मा "दृष्टि 

Monday, 2 November 2026

पर्यावरण - सौरभ पाण्डेय 'आशु

पर्यावरण - सौरभ पाण्डेय 'आशु 

पर्यावरण अर्थात हमारे चारों ओर का आवरण चारों दिशाओं में यह आवरण छाया हुआ हैl आज से कई साल पहले बात की जाए तो शायद हमारा पर्यावरण सुरक्षित है, आज वह धीरे-धीरे सुरक्षा खत्म होती जा रही क्योंकि हम इसे सुरक्षा दे ही नहीं पा रहे हैं हमारे पास समय ही नहीं क्योंकि हम अपने जीवन शैली में इतने व्यस्त हो चुके हैं कि हम भूल चुके हैं, यह पेड़ पौधे यह पहाड़ यह नदियां आज असुरक्षा की धीरे-धीरे अग्रेसर  होती जा रही है यह कोई बताने वाली चीज नहीं है यह हमारे चारों तरफ विद्यमान है दूसरी बात सरकार का ही काम नहीं हमारी भी कोई जिम्मेदारी बनती है क्यों हम भूलते जा रहे हैं यही हमारा जीवन है जब तक उनकी सुरक्षा का दायित्व नहीं लेंगे तो हम जीवन पर्यंत असुरक्षा ही महसूस करेंगे  l                                                                          

प्रत्येक व्यक्ति को इसके लिए भी समय निकालना पड़ेगा अपने साथ-साथ लोगों को भी जागरूक करना पड़ेगा इसका एक निस्तारण  यही है ज्यादा से ज्यादा पेड़ पौधे लगाए नदियों को गंदा ना करें,आसपास के जानवरों को सुरक्षा दें प्लास्टिक का काम से कम क्योंकि जिस दिन इनका संतुलन गड़बड़ा हुआ उसे दिन ग्लोबल वार्मिंग तो बढ़ेगी धीरे-धीरे कई आपदाओं को भी लेकर आएगी हमें पता है प्राकृतिक आपदा कोई झेल नहीं सकता है और आने पर से कोई रोक नहीं सकता यह भी हमारी दिनचर्या का एक अभिन्न अंग है कब तक इसे भागते रहेंगे आने वाली नई पीढ़ियां को यह बात जरूर सिखाएं पाठ पुस्तक में से पढ़कर छोड़ ना दे उसे अपने जीवन शैली में अपनाये क्योंकि हमारे आसपास की प्राकृतिक हैं तो हम हैं यह हमारे जीवन का एक विचार बिंदु है क्योंकि इन्हीं से हमारी सुबह है और इन्हीं से हमारी शाम l


सौरभ पाण्डेय 'आशु 
'सुल्तानपुर उत्तर प्रदेश