Monday, 2 November 2026

मानव और पर्यावरण संरक्षण " - नाम - एम. एल. नत्थानी

मानव और पर्यावरण संरक्षण " - नाम - एम. एल. नत्थानी

" अंतरराष्ट्रीय हिन्दी साहित्य मंच "
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 ( मेरी कलम मेरी पहचान )
सत्र :- 353
प्रतियोगिता का विषय -
 ( पर्यावरण, भविष्य, सिंगलयूज प्लास्टिक, प्रतिबंध, भागीदारी, संरक्षण, जिम्मेदारी, सुरक्षा )
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विधा - पद्य ( कविता )
कविता का शीर्षक -

" मानव और पर्यावरण संरक्षण " - नाम - एम. एल. नत्थानी
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आधुनिक जीवनशैली में 
मानव ने सुख चैन खोया 
प्रकृति से खिलवाड़ कर 
पर्यावरण संरक्षण खोया 

जिंदगी के हिसाबों जैसी 
ऋतुएं हिसाब करती है 
पर्यावरण असुंतलन से ही 
प्रकृति खराब करती है 

भूगर्भ की कोख में लावा 
सदा ही प्रवाहित होता है 
पर्यावरण का असंतुलन 
जैसा ही कदाचित होता है 

भूस्खलन और हिमपात से 
प्राकृतिक आपदा होती है 
संसाधनों के दोहन से ही 
मानव पर विपदा होती है 

कभी मैदानी भूभागों पर 
प्रचंड गर्मी तो बरसती है 
लेकिन बर्फीले पहाड़ों पर 
सर्द हवाएं तो मचलती है 

ऋतुओं का लेखा-जोखा 
मनुष्य का बही - खाता है 
कर्म बीज की खाद जैसी 
पर्यावरण का फल पाता है

धरती मां की अश्रु धारा को 
मानव समझ नहीं पाया है 
शायद खुद दुख सहकर भी 
प्रकृति संरक्षण को निभाया है 

पद्य ( कविता ) के रचनाकार का विवरण -
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नाम - एम. एल. नत्थानी

प्लास्टिक छोड़ो, प्रकृति से नाता जोड़ो - डॉ अनुपमा वर्मा "हेमा "

प्लास्टिक छोड़ो, प्रकृति से नाता जोड़ो - डॉ अनुपमा वर्मा "हेमा "

🏵️उपशीर्षक : 
🌿 प्रकृति की पुकार — भविष्य की ज़िम्मेदारी 🌿
धरती माँ की आँखों में, आज नमी-सी छाई है,
मानव की ही भूलों ने, कैसी विपदा लाई है।
नदियों में विष घुलता जाए, सूनी हुई हरियाली,
प्लास्टिक के इस जाल ने, बिगाड़ी जग की लाली।
कहाँ गए वे निर्मल झरने, कहाँ गई वह छाँव,
कहाँ गए वन-पर्वत सुंदर, कहाँ गए वे गाँव?
पक्षी व्याकुल, पशु हैं घायल, सागर भी लाचार,
कूड़े में दम तोड़ रहा है, जीवन का संसार।
सिंगल-यूज़ प्लास्टिक पर, अब प्रतिबंध लगाएँ,
कपड़े के थैले अपनाकर, नव परिवर्तन लाएँ।
कागज़, मिट्टी, बाँस के साधन, फिर से अपनाएँ,
धरती के आँचल को मिलकर, स्वच्छ-स्वस्थ बनाएँ।
केवल कानूनों से कब तक, होगा जग कल्याण?
जब तक जन-जन में न जागे, कर्तव्य का ज्ञान।
बच्चे, बूढ़े, युवा सभी, लें संरक्षण की ठान,
हर घर, हर आँगन से गूँजे, पर्यावरण का गान।
नदियाँ केवल जलधारा नहीं, जीवन की हैं रेखा,
वृक्ष नहीं केवल लकड़ी हैं, इनसे साँसें देखा।
बूँद-बूँद जल बचाना है, पेड़ों को अपनाना है,
आने वाली पीढ़ी को, सुंदर कल दिलाना है।
आज अगर हम मौन रहे तो, कल पछताएँगे,
सूखी धरती, दूषित अम्बर, किसको दिखलाएँगे?
आज उठाएँ कदम अगर हम, कल मुस्काएगा,
फिर से अपना नीला अम्बर, धरती को सजाएगा।
नन्हे-नन्हे कदम हमारे, बड़ा बदलाव लाएँ,
मिल-जुलकर भागीदारी से, नव इतिहास बनाएँ।
प्रकृति की रक्षा करना ही, सच्चा धर्म हमारा,
स्वच्छ धरा और निर्मल अम्बर, हो अधिकार हमारा।
कलम मेरी अब मौन नहीं है, सच का दीप जलाएगी,
प्लास्टिक मुक्त धरा की खातिर, जन-जागृति फैलाएगी।
आओ मिलकर शपथ ये लें, कर्तव्य निभाएँगे,
धरती माँ की गोद को फिर, स्वर्ग समान बनाएँगे।
🌱 न प्लास्टिक का अत्याचार हो, न प्रकृति पर वार हो,
🌱 हर जीवन सुरक्षित हो, हरित धरा का संसार हो।
🌱 आज बचाएँ पर्यावरण, कल सुरक्षित होगा जहान,
🌱 प्रकृति बचेगी, तभी बचेगा, मानव का अभिमान!
 मेरी कलम मेरी पहचान —
प्रकृति का संरक्षण ही, मानवता का सम्मान!

डॉ अनुपमा वर्मा "हेमा "
Punjab 

वक्त की जंजीर ने - रजनी श्री बेदी

वक्त की जंजीर ने - रजनी श्री बेदी 

वक्त की जंजीर ने.. जकड़ा है मुझको इस कदर,
कैद हूं,पिंजरा खुला है..
उड़ने की ताकत नहीं।

उड़ गई तो लौट के.. आऊंगी फिर इस कैद में,
जख्मी पंखों से उड़ाने.. भरने की ताकत नहीं।

चहचहाना छोड़ा था.. अपनों में दुश्मन देख कर,
बोझ है रिश्तों का अब बस.. लड़ने की ताकत नहीं।

खुद से शिकवे मै करूं.. और हंस भी दूं नसीब पे,
दर्द का दरिया भरा है.. डूबने की ताकत नहीं।

पत्थर सी आँखें, जड़ हृदय.. और बेजान सा है तन मेरा।
इस दर्द को पहचान के.. 
अब कहने की ताकत नहीं।

पिंजरे में अपने गुम हूं मैं ..बची नहीं अब ख्वाहिशें,
खुद को कैसे और छल लूं.. छलने की ताकत नहीं।

वाह छला क्या खूब खुद को..रूह भी हंसने लगी,
खोई रजनी.. रजनी में भी .. ढूंढने की ताकत नही।

रजनी श्री बेदी
Rajasthan 

Sunday, 1 November 2026

संरक्षण - वरिष्ठ कवि सुरेश कंठ

संरक्षण - वरिष्ठ कवि सुरेश कंठ

         ******  ×  *****
 प्रकृति हमारी अनमोल धरोहर
 इसकी रक्षा  करना  है मनोहर

 पेड़  -  पौधा   का  सम्मान  करें
 हरियाली का काफी गुणगान करें

 जल संरक्षण है बहुत जरूरी 
 इसके बिन हर  खुशी अधूरी 

नदियों   को   निर्मल  रहने  दें
 जलधारा को अविरल बहने दें 

 वायु प्रदूषण  को  दूर  भगाएं 
 स्वच्छ हवा का सुख अपनाएं 

पशु - पक्षियों की रक्षा हो 
सबके जीवन में सुरक्षा हो

वन कटने से उसे रोक लगाएं
नए - नए पौधे  जरूर लगाएं

 मिट्टी का भी मान  को बढ़ाएं 
 उर्वर धरती को निश्चित बचाएं 

संस्कृति का संरक्षण करें 
सरकारों का संवर्धन करें 

भाषा, साहित्य का हो सम्मान
 इनसे बढ़ता है  देश  का मान 

ऐतिहासिक  धरोहर  बचाएं 
अपनी पहचान अमर बनाएं 

संविधान के मूल्यों का ज्ञान 
लोकतंत्र  की  यही  है शान 

मानवता  का   करें  संरक्षण 
प्रेम बने जीवन का आभूषण 

बालक,वृद्धि सभी सुरक्षित हों 
नारी के  अधिकार संरक्षित हों 

पर्यावरण का रखें विचार 
स्वच्छ बने  अपना संसार 

प्लास्टिक का उपयोग घटाएं 
कचरे का सही प्रबंधन बनाएं 

ऊर्जा  की  बर्बादी  को पहले रोकें 
बिजली की हर किरण को संजोएं 

धरती मां का कर्ज चुकाएं
आने  वाली  पीढ़ी बचाएं 

संरक्षण केवल बात नहीं है 
जीवन  की बड़ी सौगात है 

 मिलकर अपना फर्ज निभाएं
 सुंदर  भविष्य  सभी  बनाएं 

 बूंद -  बूंद  से सागर बनता 
 छोटा प्रयास बड़ा फल देता

 जीव- जगत का रखें ख्याल
 तभी बनेगा जीवन खुशहाल 

प्रकृति   से   है अपना  नाता 
इसके बिन अस्तित्व न भाता

 संरक्षण का दीप यहीं जलाएं
 जन - जन  में चेतना फैलाएं

 आज  बचाएं  वन  और  पानी 
 कल होगी खुशियों की कहानी 

 स्वार्थ छोड़कर आगे आएं 
 धरती  का  वैभव  लौटाएं 

 कर्तव्य का संकल्प उठाएं
 संरक्षण का  धर्म  निभाएं 

 यही प्रगति का सच्चा दर्शन
 जीवन का  आधार संरक्षण 

आओ  मिलकर करें प्रणाम 
प्रकृति बचाना अपना काम 

वरिष्ठ “कवि कंठ“ का कहना 
सही  बात  सभी  का  सुनना 
       —---  जय हिंद  —---

रचयिता-  वरिष्ठ कवि सुरेश कंठ,
       बथनाहा, अररिया, बिहार।

किसान की बेटी: मिट्टी की पुकार - कल्याणी शंकर दुधबले

 किसान की बेटी: मिट्टी की पुकार - कल्याणी शंकर दुधबले

मैं एक सीधे-साधे किसान की बेटी हूँ, और रोज़ अपने पिता का वो गहरा दुख देखती हूँ,
जब वो पसीने से सींची धरती पर, कंक्रीट और कचरे का यह बढ़ता हुजूम देखती हूँ।
जिस माटी से मेरे पिता ने हम सबको पाला, आज वो ज़हरीली हो रही है,
बदलते पर्यावरण और सूखी फसलों को देख, उनकी आँखें रातों को सोती नहीं हैं।
वो दिन-रात खेतों में खटकर, अन्न से सबका पेट भरते हैं,
पर इंसानों की इस लापरवाही से, वो अपने बच्चों के भविष्य की चिंता करते हैं।
खेतों की मेढ़ों और नदियों के किनारे, जो प्लास्टिक का अंबार लग रहा है,
उसी सिंगल-यूज की जानलेवा लत से, मेरे पिता का हर सपना बिखर रहा है।
फसलों को निगलते इस प्लास्टिक पर, अब करारा वार करना होगा,
सरकार के इस पूर्ण प्रतिबंध को, हम सबको मिलकर स्वीकार करना होगा।
यह लड़ाई सिर्फ कागज़ों पर नहीं, हमें खेतों और गलियों तक ले जानी है,
देश के हर एक नागरिक को इसमें, अपनी सक्रिय भागीदारी निभानी है।
मेरे अन्नदाता पिता की मेहनत और इस पावन प्रकृति का, हमें मिलकर संरक्षण करना है,
तभी इस झुलसती हुई सुंदर धरा में, फिर से खुशहाली का नया रंग भरना है।
मिट्टी को बंजर होने से बचाना, यह केवल किसी एक का काम नहीं, हम सबकी है ज़िम्मेदारी,
तभी थमेगी प्रदूषण और विनाश की, यह चुपचाप पैर पसारती बीमारी।
हवा, अमृत नीर और खेतों की माटी की, समय रहते कर लो सुरक्षा,
किसान के आंसुओं को पोंछकर, आज कर लो इस पूरी कायनात की रक्षा।
उठो! एक किसान की बेटी की आवाज़ सुनो, एक नया संकल्प सजाना है,
प्लास्टिक मुक्त इस पावन धरा को, फिर से सोने की चिड़िया बनाना है

Name : Kalyani Dudhbade
कल्याणी शंकर दुधबले