Friday, 24 July 2026

भूख हड़ताल - संजय वर्मा "दृष्टि "

भूख हड़ताल - संजय वर्मा "दृष्टि "


जाने क्यों बढ़ जाता 
रोटी का महत्व
जब कटोरदान से 
झांक रही होती
रखी हुई रोटी 
भूखे खाली पेट में 
समाहित होने की
मगर समस्याओं के समाधान हेतु
भूख हड़ताल जो रखी है
त्वरित अभिलाषा 
ताकि प्रसाद के रूप में 
रोटी से तृप्त हो 
    रोटी कैसी भी हो 
धर्मनिर्पेक्षता का 
प्रतिनिधित्व करती 
भाग -दौड़ भी 
    दो जून की रोटी की
    समाधान हो जाने पर
    भूख हड़ताल समाप्त करने के लिए
   तोड़ना पड़ता है अनशन।

संजय वर्मा "दृष्टि "
मध्य प्रदेश 

सरकार - महाकवि डा अनन्तराम चौबे अनन्त जबलपुर मध्यप्रदेश

अंतरराष्ट्रीय हिन्दी साहित्य मंच हमारीवाणी साप्ताहिक प्रतियोगिता हेतु 

सरकार - महाकवि डा अनन्तराम चौबे अनन्त जबलपुर मध्यप्रदेश 

सरकार द्वारा बने कानून से
आम जनता परेशान हुई ।
कितने पहचान पत्र बने
पर जनता ही परेशान हुई ।

देश की जनता  देश के 
कानून से हलाकान हुई ।
देश की नीतियों से सभी
आम जनता परेशान हुई।

देश में एक नीति बनी
राशन कार्ड व्यवस्था का
अच्छा चलन कराया ।
आम जनता ने इसका
भरपूर फायदा उठाया ।

फिर संशोधन नीति आई
लाल पीले हरे गरीबी रेखा
के कार्डो का चलन कराया ।
मध्य वर्ग की जनता को
जो सुविधायें मिल रही थी
सुविधाओं से वंचित कराया।

फिर एक नीति बनी वोटर
पहचान पत्र को बनवाया ।
जनता को वोट डालने की
अच्छी सुविधा दिलवाया ।

फिर जैसे इन कार्डो का
बस चलन सा हो गया ।
इनकम टैक्स के लिये
पेन कार्ड चलन में आया ।

सभी गाड़ियां चलाने का
लायसन्स कार्ड बनवाया ।
विदेश जाने वीजा कार्ड
दवाई के लिए मेडिकल कार्ड ।

मजदूरी कार्ड मनरेगा कार्ड
निजी पहचान कार्ड बनवाये।
फिर एक नीति बनाई
बैंको में ए टी एम कार्ड की
अच्छी सुविधा दिलाई ।

जनता ने जगह जगह पैसा
निकालने अच्छी सुविधा पाई ।
सारा सच फिर एक नीति बनाई
आधार कार्ड चलन में आया
बैंक औऱ गैस कम्पनियों के
इधर उधर चक्कर लगवाये ।

फिर एक नीति बनाई
स्कूल में बच्चों के साथ
पूरे परिवार के लिए सारा 
सच समग्र आई डी कार्ड की
एक और परेशानी बढाई ।

लाडली लक्ष्मी योजना
बेटियों के लिए लाये ।
इसमें भी एक बार
सभी के चैक बनवाये ।

उनको कैंसिल कराकर
सारा सच फिर नये बनवाये
छै माह तक उसी के लिए
बार बार चक्कर कटवाये ।

इस तरह देश में न जाने
कितने कार्डो की नीति बनाई
अब पे टी एम फोन पे गूगल पे
की सुविधा कम  मुसीबत कराई ।

आम जनता को सुविधा कम
परेशानी कुछ ज्यादा ही बढाई
आम जनता को सुविधा मिले 
न मिले कार्ड बने न बने
आम जनता इन्हीं परिचय पत्रों
को बनवाने में हैरान परेशान हुई।

सरकार द्वारा बनाई गई
इन नीतियों से आये दिन देश
की आम जनता परेशान हुई।
जन्म से मृत्यु तक न जाने 
कितने परिचय पत्र बनवाये ।

वर्तमान में चुनाव आयोग ने 
बोटर लिस्ट की चैकिंग में
एस आई आर शुरू किया है ।
घुसपेठियों की पहचान होगी ।
गलत जिसने बोटर पहचान पत्र 
बनवाये है उनकी पहचान होगी ।

विदेशी घुसपेठिये देश में आकर 
 पहले तो देश में बस जाते हैं ।
कुछ दलाल स्वार्थी लोग राशि लेकर 
इनके परिचय पत्र बनवा देते हैं। 

यही घुसपेठिये बोट डालते
फ्री का राशन पानी लेते हैं ।
सरकार की सभी सुविधाएं 
यही घुसपेठिये लेते रहते हैं ।

आरक्षण बाद एस सी एस टी 
एक्ट बनाकर एफ आई आर कराई ।
एफ आई आर दर्ज होने से सरकार 
से लाखों रुपयों की हुई कमाई ।

अब सरकार यू जी सी एक्ट लाई है
सवर्ण  बच्चों की सामत आई है ।
बच्चों की कालेजों की पढ़ाई पर 
सरकार ने जैसे है रोक लगाई ।
              
 महाकवि डा अनन्तराम चौबे अनन्त
   जबलपुर म प्र

लोकतंत्र - डॉ० उषा पाण्डेय 'शुभांगी'

लोकतंत्र - डॉ० उषा पाण्डेय 'शुभांगी'

'जनता का, जनता के लिए, जनता के द्वारा शासन,'
अब्राहम लिंकन ने उन्नीस नवम्बर, अठारह सौ तिरसठ को 'गेटीसबर्ग संबोधन' में दी लोकतंत्र की यह परिभाषा।
जनता सदा सुखी रहे, 
होती हम सबकी यह अभिलाषा।
लोकतांत्रिक सरकार का काम है, 
सही व्यवस्था सुनिश्चित करना।
जनता की सुरक्षा, समाज में शांति बनाए रखना।
विधायिका, कार्यपालिका, न्यायपालिका, लोकतंत्र के हैं तीन अंग।
लोकतंत्र के तीनों अंग ऐसे काम करें, देखने वाले रह जाए दंग।
देश की सरकार हो, या राज्य की हो सरकारें।
लक्ष्य सबका एक हो, सबको लेकर आगे बढ़े, फैलाएं भाईचारे।
बेरोजगारी नहीं रहे, महंगाई  कम करें।
जनता की उम्मीद पर खरा उतरे, समाज उन्नति करे।
जनता और सरकार का संबंध है गहरा। 
जनता ही सरकार बनाती, जनता ही इस पर रखती पहरा।
जनता खुश नहीं, सरकार बदलते देर नहीं लगती।
सरकार अपना कर्तव्य निभाये,
जनता के मुख पर खुशी झलकती।
जनता और सरकार में,
है अन्योन्याश्रित संबंध।
जनता की बात सरकार तक पहुंचे, हो ऐसा प्रबंध।
नेता अपने क्षेत्र की जनता की, खुशियों का रखें ध्यान। 
जनता को न्याय मिले, जनता को हो अपने अधिकारों का ज्ञान।
सिर्फ सरकार की जवाबदेही नहीं, हमारा भी है कुछ फर्ज। 
हम भी अपना कर्तव्य निभाएं, नहीं बने हम खुदगर्ज।
अपने नेता चुनते समय हम
किसी के बहकावे में न आएं, अपने विवेक का उपयोग करें।
उम्मीदवार का इतिहास देखें, 
उनकी ईमानदारी,  कार्य क्षमता, योग्यता के आधार पर 
ही, उनको अपना वोट देना सुनिश्चित करें।
'अंधा बाँटे रेवड़ी फिर-फिर अपनों को दे,' अर्थात अधिकार मिलने पर लोग अपने ही लोगों का फायदा करते हैं, हमने पढ़ी है यह कहावत।
इसलिए नेता ऐसा चुने, जो अपने पराए में फर्क न करें, 
बिना बात नहीं करें
किसी से अदावत (शत्रुता, विरोध)।
लोकतांत्रिक सरकार में, जनता के पास होती असली ताकत।
जनता भी अपने कर्तव्य सही ढंग से निभाए, सरकार की मदद करने की डाले आदत।
सरकार और जनता के बीच, अच्छा संबंध होगा।
सरकार भी टिकेगी, 
देश का विकास अवश्यंभावी होगा।

डॉ० उषा पाण्डेय 'शुभांगी'
स्वरचित
वैस्ट बंगाल 

समाप्त - सौरभ पाण्डेय

समाप्त - सौरभ पाण्डेय 

जिंदगी का एक शब्द है समाप्त इस संसार में कोई प्राणी है कोई भी बड़ा सा बड़ा जीव उसकी जीवन की समाप्ति का एक दिन निश्चित अगर जीवन का कोई भी अध्याय हम शुरुआत करते हैं, तो उसे अध्याय का एक दिन समाप्त होने का दिन निश्चित है l चाहे वह अध्याय चाहे जितना बड़ा हो चाहे जितने दिन लगे,चाहे जितने समय लगे,चाहे जितने सेकंड हो,बस हमें यह पता होना चाहिए कि हमारे जीवन का मूलभूत उद्देश्य क्या है l बचपन के दिनों को याद किया जाए तो उन दिनों में हमारा कोई मूलभूत उद्देश्य नहीं रहता क्योंकि हम किसी के अधीन रहते हैं उसी के बताए हो रास्तों को अनुसरण करते हैं लेकिन जैसे हमारी उम्र बढ़ती रहती है सोचने और समझने की क्षमता भी बढ़ती रहती है कि हमारी जिंदगी का मूलभूत उद्देश्य क्या है हम आने वाले समय में अपने प्रथम अध्याय को कैसे शुरुआत करें जीवन का एक लक्ष्य यह भी रहता है शुरुआत हुई अध्याय को एक दिन समाप्ति की ओर भी हमें ले जाना पड़ता है कुछ को बीच में ही रोक दिया जाता है और कुछ लंबे समय तक चलते रहते हैं एक चीज विचार किया जाए क्या हमारे जीवन की मूलभूत आवश्यकता है जो हैं क्या यह भविष्य में कभी समाप्त होगी, हमारे अंदर जो गंदगी है, जो द्वेष है,जो गुस्सा है क्या यह कभी समाप्त होगा मैं कह सकता हूं शायद नहीं जिंदगी के इस अध्याय को कभी भी समाप्ति की ओर नहीं जा सकता क्योंकि हमारा मन हर प्रकार की कपट से भरा हुआ है यह कभी समाप्त नहीं हो सकता एक दिन हम मिट्टी में भले मिल जाए लेकिन जिंदगी दौड़ में इस प्रकार की भोग विलास की वस्तुएं चलती रहेगी जाते-जाते हम भले अपने  को देते जाएं लेकिन जिंदगी का यह अध्याय कभी समाप्त नहीं होगा l बस चलता जाएगा चलता जाएगा लिए

सौरभ पाण्डेय (उत्तर प्रदेश)

भूख हड़ताल: लोकतंत्र में अहिंसक प्रतिरोध का प्रभावी माध्यम - उजमा तरनुम

 

भूख हड़ताल: लोकतंत्र में अहिंसक प्रतिरोध का प्रभावी माध्यम - उजमा तरनुम

भूख हड़ताल एक ऐसा अहिंसक आंदोलन है, जिसमें व्यक्ति या समूह अपनी माँगों को सरकार, प्रशासन अथवा समाज के सामने प्रभावी ढंग से रखने के लिए स्वेच्छा से भोजन का त्याग करता है। इसका उद्देश्य किसी पर बल प्रयोग करना नहीं, बल्कि अपने त्याग, धैर्य और नैतिक शक्ति के माध्यम से लोगों का ध्यान किसी महत्वपूर्ण समस्या की ओर आकर्षित करना होता है। लोकतांत्रिक व्यवस्था में जब संवाद और अन्य शांतिपूर्ण प्रयास अपेक्षित परिणाम नहीं देते, तब भूख हड़ताल को अंतिम विकल्प के रूप में अपनाया जाता है।

भारत के स्वतंत्रता संग्राम में भूख हड़ताल का विशेष महत्व रहा है। महात्मा गांधी ने सत्य, अहिंसा और आत्मबल के आधार पर अनेक बार उपवास का सहारा लिया। उनके उपवास का उद्देश्य केवल राजनीतिक दबाव बनाना नहीं था, बल्कि समाज में नैतिक जागृति और आत्मचिंतन उत्पन्न करना भी था। उनके इस मार्ग ने यह सिद्ध किया कि बिना हिंसा के भी बड़े सामाजिक और राजनीतिक परिवर्तन संभव हैं।

आज के समय में भी विभिन्न सामाजिक, आर्थिक और राजनीतिक मुद्दों पर लोग भूख हड़ताल का सहारा लेते हैं। भ्रष्टाचार, किसानों की समस्याएँ, पर्यावरण संरक्षण, शिक्षा, रोजगार, महिला सुरक्षा तथा नागरिक अधिकारों जैसे विषयों पर अनेक आंदोलनों में यह माध्यम अपनाया गया है। भूख हड़ताल समाज और सरकार का ध्यान उन समस्याओं की ओर आकर्षित करती है, जिन्हें लंबे समय तक अनदेखा किया गया हो।

हालाँकि, भूख हड़ताल का प्रयोग अत्यंत जिम्मेदारी और संयम के साथ किया जाना चाहिए। यदि इसका उपयोग केवल व्यक्तिगत स्वार्थ, राजनीतिक लाभ या अनावश्यक दबाव बनाने के लिए किया जाए, तो इसका नैतिक महत्व कम हो जाता है। लंबे समय तक भोजन न करने से व्यक्ति के स्वास्थ्य पर गंभीर दुष्प्रभाव पड़ सकते हैं। इसलिए आंदोलनकारियों की सुरक्षा और स्वास्थ्य का ध्यान रखना भी आवश्यक है।

लोकतंत्र में प्रत्येक नागरिक को अपनी बात रखने का अधिकार है, परंतु उसके साथ संवाद, संवेदनशीलता और जिम्मेदारी भी उतनी ही आवश्यक है। सरकार का दायित्व है कि वह जनता की वास्तविक समस्याओं को समय रहते सुने और उनका समाधान निकाले, ताकि लोगों को भूख हड़ताल जैसे कठोर कदम उठाने की आवश्यकता न पड़े। दूसरी ओर, नागरिकों को भी शांतिपूर्ण और संवैधानिक तरीकों से अपनी बात रखने का प्रयास करना चाहिए।

अंततः, भूख हड़ताल केवल भोजन का त्याग नहीं, बल्कि सत्य, धैर्य, आत्मसंयम और नैतिक साहस का प्रतीक है। जब इसका उद्देश्य जनहित, न्याय और सामाजिक कल्याण हो, तब यह लोकतंत्र को मजबूत बनाने वाला प्रभावी माध्यम बन सकता है। किंतु किसी भी समस्या का स्थायी समाधान केवल संवाद, आपसी विश्वास और सकारात्मक सहयोग से ही संभव है। इसलिए भूख हड़ताल को हमेशा अंतिम उपाय के रूप में अपनाना चाहिए, ताकि समाज में शांति, न्याय और लोकतांत्रिक मूल्यों की रक्षा बनी रहे।

उजमा तरनुम 
कर्नाटका