Monday, 26 October 2026

राम - संजय वर्मा "दृष्टि"

राम - संजय वर्मा "दृष्टि"

श्रीराम ही मेरे शक्ति के दाता
दर्शन मात्र से सारे सुख पाता।
जब ध्यान लगाएं हरदम तुझमें
पुनीत विचार सब समाए मुझमे।
श्री राम की छवि बड़ी निराली
कण -कण में समाई खुशहाली।
सारा जग होता तुझसे ही रोशन
प्राणी पाते धन धान्य और पोषण।
सांस सांस में है बसा नाम तुम्हारा
मर्यादा पुरुषोत्तम राम  मेरा सहारा।
हे श्री राम सारा जग तो है तुम्हारा
जग में तुम बिन कोई नही है हमारा।
पूजन करो और बोलो जय श्री राम 
दुःख दूर होगा मिलेगा सुख आराम।

संजय वर्मा "दृष्टि"
125 बलिदानी भगतसिंह मार्ग 
मनावर(धार)मप्र

रावण आज भी जीवित है - डॉ. वै. कस्तूरी बाई

रावण आज भी जीवित है - डॉ. वै. कस्तूरी बाई 

दशहरा आया, विजय का संदेश लेकर,
 दीपों की पंक्तियाँ, खुशियों के रंग लेकर।
 राम की मर्यादा, सीता का स्वाभिमान,
 रावण के अंत से गूँजा सत्य का गान।
मैदान में ऊँचा पुतला खड़ा मुस्काता है,
 जनसमूह तालियों से आकाश गूँजाता है।
 अग्नि की लपटों में रावण जल जाता है,
 पर मन का अहंकार कहाँ मिट पाता है?
आज भी कहीं लोभ का साम्राज्य पलता है,
 कहीं झूठ का सिक्का सरेआम चलता है।
 नारी के सम्मान पर प्रश्न उठाए जाते हैं,
 निर्दोषों के सपने अक्सर कुचले जाते हैं।
धर्म के नाम पर जब नफरत बोई जाती है,
 मानवता की हर आवाज दबाई जाती है।
 सत्ता यदि सेवा का पावन अर्थ भुलाए,
 न्याय यदि धनवानों के द्वार ठहर जाए।
तो सोचो, किस बात का उत्सव मनाएँ?
 किस विजय पर गर्व के दीप जलाएँ?
 सच्ची पूजा है भूखे को भोजन देना,
 गिरते हुए इंसान को सहारा देना।
सीता के सम्मान की रक्षा हो हर द्वार,
 राम के आदर्श बनें जीवन का आधार।
 बुराई से लड़ने का संकल्प जगाएँ,
 अच्छाई के बीज हर हृदय में उगाएँ।
आओ, पहले अपने भीतर झाँकें,
 क्रोध, छल, अभिमान की जड़ें पहचानें।
 जब सत्य हमारे आचरण में उतर आएगा,
 तभी विजयादशमी का अर्थ निखर जाएगा।
पुतला जलाना केवल परंपरा नहीं,
 अपने दोष मिटाना भी साधना सही।
 जिस दिन मानव मानव का सम्मान करेगा,
 उस दिन धरती पर सच्चा रामराज्य खिलेगा।

डॉ. वै. कस्तूरी बाई 
बेंगलूरु 
कर्नाटक

विजयादशमी — बुराई पर अच्छाई की विजय

विजयादशमी — बुराई पर अच्छाई की विजय 

जब-जब धरती पर पाप बढ़ा,
जब-जब सत्य का दीप बुझा,
तब-तब धर्म ने राह दिखाई,
श्रीराम ने मर्यादा सिखलाई।

विजयादशमी का पावन त्योहार,
लाता है खुशियों की बहार,
रावण के दस सिर जलते हैं,
पर प्रश्न हृदय में पलते हैं।

क्या केवल पुतला जलाने से,
मुक्ति मिलेगी बुरे विचारों से?
जब मन में अहंकार समाया है,
तो किस रावण को जलाया है?

रावण तो हर मन में रहता है,
क्रोध, लोभ बनकर वह बहता है,
ईर्ष्या, छल और अभिमान मिटाएँ,
मन में प्रेम का दीप जलाएँ।

सीता के सम्मान की रक्षा हो,
हर नारी को सुरक्षित पथ मिले,
सत्य, दया और धर्म के आगे,
अन्याय का हर बंधन खुले।

राम केवल एक नाम नहीं हैं,
वे आदर्शों का पैगाम हैं,
सत्य, त्याग, करुणा, मर्यादा,
उनके जीवन के अनुपम धाम हैं।

विजय तभी सच्ची कहलाएगी,
जब मानवता मुस्कुराएगी,
जब निर्धन को अधिकार मिलेगा,
हर बेटी को सम्मान मिलेगा।

नफरत की दीवारें तोड़ें,
प्रेम के रिश्ते सबसे जोड़ें,
जाति-धर्म के भेद मिटाकर,
मानवता से नाता जोड़ें।

आओ, इस दशहरे प्रण लें हम,
सदाचार के पथ पर चलें हम,
अपने भीतर के रावण को,
सच्चाई की शक्ति से हरें हम।

न झूठ का साथ निभाएँगे,
न अन्याय के आगे झुक पाएँगे,
सत्य और न्याय की राहों पर,
नवभारत का दीप जलाएँगे।

जब मन से अहंकार मिटेगा,
जब हर हृदय प्रेम से खिलेगा,
तभी रामराज्य आएगा,
हर घर सुख-शांति पाएगा।

आओ, ऐसा पर्व मनाएँ,
मन के विकारों को दूर भगाएँ,
केवल पुतले नहीं, बुराइयाँ जलाएँ,
सच्चे अर्थों में विजयादशमी मनाएँ।

बुराई पर अच्छाई की विजय का,
यही संदेश अमर हो जाए,
हर हृदय में राम विराजें,
हर जीवन मंगलमय हो जाए।

🏹 जय श्रीराम! जय विजयादशमी! 🏹

डॉ अनुपमा वर्मा "हेमा "
Punjab 

रामायण ऐसी ना होती - ज़रिया डॉ. मंजु चावला

रामायण ऐसी ना होती - ज़रिया डॉ. मंजु चावला

युगों तक कहानी सुनाई ना जाती
रघुकुल रीत जो निभाई ना होती
सौतेली मां कैकई और पिता दशरथ की 
शर्त बेटे राम ने पुराई ना होती
मंथरा को बस ज़रिया माना ना होता
कर्म फल स्वीकार्य जताई ना होती 
सौतेले भाई भरत को राजगद्दी देने पर
खुशी भरी हामी दिखाई ना होती
चौदह साल जंगलों में पत्नी सीता ने भी
अपनी जवानी रुलाई ना होती
सौतेले भाई लक्ष्मण ने मां पत्नी छोड़कर
अपनी हर इच्छा दबाई ना होती
भरत ने सादा जीवन जी राजगद्दी पर
राम की चरणपादुका बिठाई ना होती
सौतेले भाई शत्रुघ्न ने प्रतिनिधि बनकर
बिना छल राजनीति चलाई ना होती
कौशल्या सुमित्रा कैकई ने साथ रहकर
माफ करने की रीत चलाई ना होती
राजा जनक ने अपनी बेटियों को
पत्नीधर्म की शिक्षा दिलाई ना होती
निषाद ,शबरी, वानर सेना , विभीषण
के कुल की अनदेखी कराई ना होती
एक पत्नी व्रत निभाया ना होता
श्रुपणखा की जिद्द ठुकराई ना होती 
सबने अपनी जान, दांव पर लगाकर
सीता की इज़्ज़त बचाई ना होती 
हर एक किरदार में रिश्तों की खातिर
भ्रम होता, विश्वास और सच्चाई ना होती
सब स्वार्थी होकर जो बस अपनी सोचते
कुछ और ही होता रामायण ऐसी ना होती 
ये गाथा भी महाभारत जैसी होती
रामायण का अर्थ प्रेम व अच्छाई ना होती
हर युग में हर घर में सुख शांति वास करती
सबने रघुकुल प्रथा चलाई जो होती
हर लड़का राम और हर लड़की सीता होती
हर घर में रामायण जीनी सिखाई जो होती
अपने जीवन में शांति चाहिए तो
रामायण जीनी सीखनी सिखानी ही होगी

                         ज़रिया डॉ. मंजु चावला
Chandigarh 

रावण - यशपाल निर्मल

रावण - यशपाल निर्मल 

समय की काली दीवार पर किसने टाँग दिया है 
दस चेहरों वाला एक सूरज, 
जिसकी हर किरण से अँधेरा और गहरा होता है!

लंका 
अब समुद्र के उस पार नहीं, 
हमारी आँखों के भीतर उगती है। 
सोने की ईंटों के नीचे कराहती हैं 
असंख्य इच्छाएँ, 
और सिंहासन के पायों से बंधी हैं 
कितनी ही मौन जिह्वाएँ।

रावण! 
तुम्हारी नाभि में अमृत था, हमारी नाभियों में 
भूख का जलता हुआ कुआँ है। 
तुम्हारे दस सिर थे, 
हमने एक ही सिर में 
सौ मुखौटे उगा लिए हैं।

एक मुख पर वेदों की ऋचाएँ, 
दूसरे पर न्याय का उजला चंदन, 
तीसरे पर धर्म की ध्वजा, चौथे पर जनसेवा की मुस्कान— 
भीतर मगर लोभ का काला नाग 
कुंडली मारकर बैठा है।

अशोक-वाटिका 
आज भी हरी है, 
पर उसकी डालियों पर सीताएँ नहीं, 
टँगे हुए हैं असंख्य प्रश्न। हवा उनके आँचल छूकर लौट जाती है चुपचाप,  और पहरेदारों की आँखों में सोया रहता है राजधर्म।

राम का धनुष 
किसी संग्रहालय की दीवार पर ।
धूल ओढ़े पड़ा है। 
प्रत्यंचा की जगह समझौतों का महीन धागा है, 
और तीरों की नोक पर सत्ता की मुहर लगी है।

हर वर्ष मैदान में 
एक काग़ज़ी रावण जलता है, 
लपटें उठती हैं, 
बच्चे तालियाँ बजाते हैं, राख हवा में उड़ती है— मगर उसी राख से 
अगली सुबह 
एक नया मुकुट उग आता है।

रावण! 
तुम्हारी मृत्यु का रहस्य किसी बाण में नहीं छिपा,  वह उस क्षण में सोया है  जब मनुष्य 
अपने भीतर के अँधेरे को  अँधेरा कहने का साहस करेगा।

तब कोई अग्नि 
पुतले को नहीं, 
अहंकार की जड़ों को छुएगी; 
तब विजयादशमी के आकाश में 
धुआँ नहीं, 
एक निर्मल सूर्योदय खिलेगा।

(जम्मू - कश्मीर)