सीता - डॉ० उषा पाण्डेय 'शुभांगी'
पिता जनक जी की लाड़ली, मात सुनैना जी की दुलारी।
मिथिला की थीं राजकुमारी, थीं सीता जी बड़ी प्यारी।
सूखा पड़ा था मिथिला में, जनक जी ने हल चलाया।
हल चलाते खेत में, एक सुंदर कन्या पाया।
पति-पत्नी ने बच्ची को अपनाया, नाम दिया सीता।
अपने गुणों से बालिका सीता ने, सबका दिल जीता।
जनक जी ने सीता स्वयंवर रचाया, मुनि विश्वामित्र संग राघव जी देखने आएं।
प्रत्यंचा चढ़ाई, शिव धनुष टूटा, जानकी
जी संग रघुवर व्याह रचाएं।
अयोध्या की बहू सीता जी बनी, थीं सबके नैनों की तारा।
बहू का कर्तव्य निभाने को, उन्होंने अपना तन मन वारा।
पिता की आजा से, दशरथ नंदन चले वन को, वैदेही भी साथ चलीं।
संयासिनी का रूप धरीं, जनक की लली।
विनम्रता भरा था उनमें, नारी की मर्यादा जानती थीं।
अपने कर्तव्य का पालन करती थीं, बड़ों का आज्ञा मानती थीं।
धर्म परायण थीं, पतिव्रता धर्म निभाया।
कभी नहीं घबराई,
सच का साथ सदा निभाया।
पति को आने में देरी होते देख, दशरथ जी का पिंडदान किया।
कठिन परिस्थितियों में डिगी नहीं, धीरज से सामना किया।
पति ने त्याग दिया, वाल्मीकि आश्रम में शरण लिया।
माता का फर्ज निभाया, लव-कुश को अच्छा संस्कार दिया।
धैर्य, त्याग की
प्रतिमूर्ति, सहनशीलता की मूरत।
माता सीता के गुणों का अपनाने की, आज हर नारी को है जरूरत।
धरती से उत्पन्न हुईं, धरती में ही समा गईं।
नारी का कर्तव्य क्या हो, नारियों को बता गईं।
माता सीता का चरित्र, हमें मुश्किलों से लड़ना सीखाता है।
अहंकार न करो, गरिमा बनाए रखो,
यह बतलाता है।
डॉ० उषा पाण्डेय 'शुभांगी'
वैस्ट बंगाल