Wednesday, 10 June 2026

युवा - डॉ० उषा पाण्डेय 'शुभांगी'

युवा - डॉ० उषा पाण्डेय 'शुभांगी' 

युवा, तुम नवभारत के निर्माता हो, देश के हो कर्णधार।
जांबाज हो तुम, गुणों की तुममें है भरमार।
उज्जवल भविष्य भारत का, 
है तुम्हारे हाथ। 
उठो, जागो, आगे बढ़ो,
हिम्मत और धीरज के साथ।
अपनी शक्ति को पहचानो,
सकारात्मक बदलाव लाओ।
जागरूक रहो सदा, 
राष्ट्र के प्रति कर्तव्य निभाओ।
अन्याय के खिलाफ आवाज उठाओ, कुरीतियों का करो सफाया।
गहरे समंदर में जो उतरा, 
उसने ही तो मोती पाया।
हौसले बुलंद हो, जोश में कमी  न रखना। 
उर्जावान बने रहो, बाधाओं से कभी न डरना।
लक्ष्य स्पष्ट हो, राह मिल जाएगा। 
लगन और मेहनत से,
निशाना सध जाएगा।
हार से नहीं घबराना,
हार से ही जीत का रास्ता मिलेगा।
अपनी पराजय का कारण जानो, उसका निवारण करो,
विजय पताका फहरेगा।
बुजुर्गों का सम्मान करो, रिश्तो की समझो कीमत।
प्रभु की मिलेगी, तुम्हें  सदा रहमत।
नीयत साफ हो, कर्म सही हो, नियति बदलती देर नहीं लगती।
ईमानदारी से जो काम करता,
सफलता उसके कदम चूमती।
दूर तक दृष्टि सदा रखना, अपनी क्षमता का उपयोग करो भरपूर।
भले थोड़ी देरी हो, 
मंजिल मिलती हैजरूर।
लालच से दूर रहो, क्रोध पर करो नियंत्रण।
अपने भारत देश पर, 
तन मन धन करो समर्पण। 
हार यदि तुम जाओ, गलत रास्ता कभी न अपनाना।
नशे से दूर रहना, अच्छे कर्म करना, जीवन को सार्थक बनाना।
आगे ही बढ़ते जाना, अभी बहुत कुछ है हासिल करना। 
विनम्र बने रहना, दृष्टिकोण सकारात्मक रखना।
जीतता वही है जो, चुनौतियों का सामना डटकर करता।
सोना आग में तप कर, 
कुंदन है बनता।
इस धरती पर आए हो, 
कुछ तो ऐसा कर जाओ। 
माता-पिता का नाम रोशन हो,
मर कर भी, अमर हो जाओ।

डॉ० उषा पाण्डेय 'शुभांगी' 
स्वरचित
वैस्ट बंगाल 

बेरोजगार - महाकवि डा अनन्तराम चौबे अनन्त

राष्ट्रीय हिन्दी साहित्य मंच हमारीवाणी
साप्ताहिक प्रतियोगिता हेतु 
बेरोजगार - महाकवि डा अनन्तराम चौबे अनन्त 

एक पढा लिखा ब्राह्मण 
बेरोजगार युवक, रोजगार 
ढूंढते ढूंढते हो गया था 
बेरोजगारी से हैरान परेशान ।

जाति से ब्राह्मण होने के 
अभिशाप से था हैरान ।
नेताओ के निजी स्वार्थ ने 
आरक्षण कोटे से किया परेशान।

आरक्षण इतना बढ़ा दिया है
कि ब्राह्मणों को नोकरी मिलना
आज के वर्तमान समय में 
बहुत ही मुश्किल हो गया है।

जाति में ब्राह्मण होने का
एक फायदा जरुर हुआ ।
जन्म जात ज्ञानी और
बुद्धि में बहुत ही तेज था ।

सारा सच पैसों की कमी और
बेरोजगारी से परेशान था । 
घर में माता पिता पर बोझ से
दिनों दिन बहुत ही हैरान था ।

एक  दिन अचानक मन में 
एक युक्ति समझ में आई ।
रोज सुबह से शमशान घाट में 
जाकर मिट्टी में शामिल होने की 
बात अचानक ही मन में आई ।

और शहर से आने वाली 
शवयात्रा मिट्टी में प्रतिदिन
सच सुबह से दोपहर के बीच 
शवयात्रा में शामिल होने लगा ।

आजकल शव यात्रा में
शामिल होने वालों को
एक किताब दी जाती है ।
अपना नाम पता लिखने 
की बात कही जाती है ।

उस युवक ने भी किताब में 
अपने नाम पते में शमशान घाट
के पहले झोपडी लिख दिया ।
अपनी झोपडी में राम नाम 
सत्य है का बोर्ड लगवा दिया ।

तेरहवीं में खाने के साथ 
दो सौ एक रुपया दक्षिणा 
देना भी लिखवा दिया ।
अचानक दस बारह दिनों के
बाद एक जजमान झोपडी में
आकर तेरहवीं में आने का 
कार्ड देकर  आग्रह किये ।

ब्राह्मण बेरोजगार युवक 
जजमान के घर तेरहवीं खाने गया ।
खाने के बाद दो सौ एक रुपया 
नगद  गिलास सामग्री पा गया ।

इस तरह युवक अब रोज एक 
दो तेरहवीं में शामिल होने लगा ।
क्योंकि रोज, रोजी रोटी का
अच्छा इन्तजार जो हो गया ।

एक दिन युवक ने जजमानों से
विनम्रता पूर्वक आग्रह किया।
मैं बेरोजगार हूं  ऐसा मत
अपने फायदे के लिए बताया ।

मैं बेरोजगार जाति का ब्राह्मण हूं 
दक्षिणा में दान सामग्री तो दीजिए।
दान सामग्री बहुत इकट्ठा हो गई है
इच्छानुसार नगद पैसा बढा दीजिए ।

जजमानों को युवक की 
यह बात भी पसंद आई ।

दूसरे दिन युवक जजमान के घर
तेरहवीं में पेट भर खाना खाया।
बाद तीन सौ एक रुपया पाकर 
मन ही मन बहुत ही हर्षाया ।

इस तरह ब्राह्मण युवक का 
यही क्रम प्रतिदिन चलने लगा ।
सुबह से एक दो शव यात्रा में 
प्रतिदिन शामिल होने लगा ।

दोपहर में नहाने धोने के बाद 
ब्राह्मण भोज में  जाने लगा।
इस तरह धर्म के साथ अपना
ब्राह्मण कर्म भी करने लगा ।

इसी तरह अपने दो चार ब्राह्मण
मित्रों को भी शामिल कर लिया । 
पेट भर खाना, खर्च को पैसों का
फायदा भी प्रतिदिन मिलने लगा ।

सारा सच दक्षिणा की रकम से 
घर परिवार का खर्च चलने लगा ।
अपने ब्राह्मण जाति धर्म से
समाज में सम्मान मिलने लगा ।

और इस तरह मुक्ति धाम में ही 
बेरोजगारी से मुक्ति पा गया ।

हमारे देश में इस तरह लाखों
बेरोजगार , रोजगार पाने घूम रहे हैं ।
माता पिता के कंधों पर बोझ 
बनकर आत्म ग्लानि से जी रहे हैं ।
       
 महाकवि डां अनन्तराम चौबे अनन्त
  जबलपुर म प्र

संघर्ष - संजय जैन "बीना"

संघर्ष - संजय जैन "बीना"
विधा : कविता

जोड़ सको तो जोड़ो तुम
क्यों तोड़ने की कोशिस करते। 
दिल का तेरा हाल बुरा है 
क्यों दिलों से खेलते हो।। 

आज तेरा जो रूप देखा 
सच में दिल घबरा गया। 
कैसे हो सकता है कोई
प्यार से इतना भरा हुआ।। 

कितने गमों को सह कर भी
बिल्कुल विचलित नही हुआ है। 
दृण्य संकल्प लेकर जीता है
सपने अपने पूरे करता है।। 

संसार के माया जाल को
भली-भाती समझा जाना है। 
फिर भी छलने वालों को 
साथ में अपने रखता है।। 

अपने ही दुश्मन बनते है 
गैरो में कहाँ इतनी दम है। 
घर में साथ हमारे बैठकर
हमको ही वो डसते है।। 

वाह रे ऊपर वाले तेरी लीला
किस तरह से तुम रचते हो। 
अपनों को ही अपनों से तुम
किस तरह लड़वाते रहते हो।। 

हम तो लड़ने झगड़े के अब
सच में आदि से हो गये। 
जीना मरना देख लिया है
तो मरने से डर लगता नही।। 

जय जिनेंद्र
संजय जैन "बीना" मुंबई

मन का बगीचा - अमिता मराठे

मन का बगीचा - अमिता मराठे 

विश्व पर्यावरण दिवस पर आत्ममंथन का अवसर पाकर
आइए, हम सब मिलकर परिवार और धरती को संजोएँ।
अनन्त शुभकामनाओं सहित—
शीर्षक 
मन का बगीचा 

उस समय तक सब कुछ सुंदर था,
प्रकृति के पाँचों तत्वों से
हमारा गहरा और आत्मीय नाता था।
मिट्टी की सौंधी-सौंधी खुशबू का
रसोईघर तक प्रभाव था।
नदी, जंगल और पर्वत
जीवन के सच्चे आधार थे,
जैव विविधता के संरक्षण का
प्रत्यक्ष भाव हमारे भीतर था।
तभी समाज और राष्ट्र
समृद्ध और आबाद था,
और मन का बगीचा
सदैव प्रसन्न एवं हरा-भरा था।

फिर विकास की दौड़ तेज हुई,
धरती की हरियाली रोने लगी।
विज्ञान की खोजें बढ़ती गईं,
परिवार और वसुंधरा
दोनों प्रभावित होने लगे।
नारी की घरों में सहभागिता घटी,
और मन की बगिया
धीरे-धीरे सूखने लगी।

प्रकृति तो हर पल
देना ही जानती है,
किन्तु लेने में हम
कंजूसी बरतने लगे हैं।
स्वास्थ्य की चिंता में डूबा मानव
दवाइयों की दुकानों पर
भीड़ लगाने लगा है।

अब समय है कि
पर्यावरण संरक्षण के भावों की
मन के बगीचे में मजबूत नींव रखी जाए।
सकारात्मक विचारों,
शांति और सुकून के बीज बोए जाएँ,
और उन्हें निरंतर
सद्कर्मों के जल से सींचा जाए।

शुद्ध आकांक्षाओं के फूल,
विश्वास की कलियों की महक
सदैव बनी रहे
हमारे मन के बगीचे में।
तभी धरती भी मुस्कुराएगी
और मानव जीवन भी
सुख, शांति और हरियाली से भर जाएगा।

अमिता मराठे 
इंदौर मध्य-प्रदेश 
लेखिका एवं समाज सेविका

बेरोज़गारी - डा, तरूण राय कागा

बेरोज़गारी - डा, तरूण राय कागा 

आज कल का जवान इधर-उधर भटक रहा,
रोज़गार की तलाश में इधर-उधर भटक रहा।

        तालीम-याफ्ता बन खाता दर-दर की ठोकरें ,
        रोज़ी रोटी कपड़ा की खोज में अटक रहा।

इश्तहार को टटोल कर नाउम्मीद हो जाता बेकस,
हर किसी दफ़्तर में अपना सिर पटक रहा।

       सियासत-दानों के बहकावे में आकर करता हुड़दंग,
        नतीजा निकला नहीं लड़ाई लफड़ा में लटक रहा।

जोश जुनून जल्वा जज़्बा सातवें आसमान पर कागा,
हुकूमत की हिमायत नहीं आंखों में खटक रहा।

डा, तरूण राय कागा 
पूर्व विधायक 
कवि साहित्यकार
Rajasthan