रावण आज भी जीवित है - डॉ. वै. कस्तूरी बाई
दशहरा आया, विजय का संदेश लेकर,
दीपों की पंक्तियाँ, खुशियों के रंग लेकर।
राम की मर्यादा, सीता का स्वाभिमान,
रावण के अंत से गूँजा सत्य का गान।
मैदान में ऊँचा पुतला खड़ा मुस्काता है,
जनसमूह तालियों से आकाश गूँजाता है।
अग्नि की लपटों में रावण जल जाता है,
पर मन का अहंकार कहाँ मिट पाता है?
आज भी कहीं लोभ का साम्राज्य पलता है,
कहीं झूठ का सिक्का सरेआम चलता है।
नारी के सम्मान पर प्रश्न उठाए जाते हैं,
निर्दोषों के सपने अक्सर कुचले जाते हैं।
धर्म के नाम पर जब नफरत बोई जाती है,
मानवता की हर आवाज दबाई जाती है।
सत्ता यदि सेवा का पावन अर्थ भुलाए,
न्याय यदि धनवानों के द्वार ठहर जाए।
तो सोचो, किस बात का उत्सव मनाएँ?
किस विजय पर गर्व के दीप जलाएँ?
सच्ची पूजा है भूखे को भोजन देना,
गिरते हुए इंसान को सहारा देना।
सीता के सम्मान की रक्षा हो हर द्वार,
राम के आदर्श बनें जीवन का आधार।
बुराई से लड़ने का संकल्प जगाएँ,
अच्छाई के बीज हर हृदय में उगाएँ।
आओ, पहले अपने भीतर झाँकें,
क्रोध, छल, अभिमान की जड़ें पहचानें।
जब सत्य हमारे आचरण में उतर आएगा,
तभी विजयादशमी का अर्थ निखर जाएगा।
पुतला जलाना केवल परंपरा नहीं,
अपने दोष मिटाना भी साधना सही।
जिस दिन मानव मानव का सम्मान करेगा,
उस दिन धरती पर सच्चा रामराज्य खिलेगा।
डॉ. वै. कस्तूरी बाई
बेंगलूरु
कर्नाटक