Monday, 19 October 2026

लोकतंत्र एवं सरकार - एम. एल. नत्थानी

" अंतरराष्ट्रीय हिन्दी साहित्य मंच "
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( मेरी कलम मेरी पहचान )
सत्र :- 351
प्रतियोगिता का विषय -
( सरकार, गैरकानूनी, अवैध, लोकतांत्रिक, नाजायज, अनधिकृत, कानून विरुद्ध, अवैधानिक, प्रतिबंधित, अपराधिक, अवैधता )
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विधा - पद्य ( कविता )
कविता का शीर्षक -
" लोकतंत्र एवं सरकार - एम. एल. नत्थानी 
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लोकतंत्र में जनता रैलियों 
की हर जगह शोभा बढ़ाती 
पुराने वादे भूलकर अपनी 
कमजोर याददाश्त छुपाती 

नित्य मांगते वैध - अवैध 
सभा स्थल में प्रवेश निषेध 
कानून व्यवस्था में जो कैद 
रील बनाने वाले है मुस्तैद 

नये शब्द फिर गढ़े जाएंगे 
सपनों के सौदे मढ़े जाएंगे 
पुष्प हार से वह चढ़े जाएंगे 
न्याय के कसीदे पढ़े जाएंगे 

धरने प्रदर्शन की भरमार होगी 
वोटरों की ही दरकार होगी 
जनसेवा की जयकार होगी 
चापलूसों की दरबार होगी 

दर्शक दीर्घा में जनता बैठी 
वादों पर तालियां बजाकर 
पुराने जख्मों को भूलकर 
वोटों को थाली में रखकर 

लोकतंत्र का यह उत्सव भी 
सत्ता के शीर्ष पर पहुंचाता 
जनता जनार्दन की बेबसी 
पर कोई भी नहीं पछताता 

चकाचौंध देखकर मंच पर 
क्यों लगता धुंधला नेपथ्य 
दर्शक दीर्घा की खामोशी 
यह सम्मानित मंच का सत्य 

जनप्रतिनिधि पधारे मंच पर 
करतल ध्वनि से स्वागत है 
बेबस जनता निहारती रही 
अंतर्मन फिर क्यों आहत है 

धरने प्रदर्शन की ये पटकथा 
तो पहले से निर्धारित है 
लोकतंत्र की यह घोषणाएं 
सुनकर यह मन विचलित है 

पद्य ( कविता ) के रचनाकार का विवरण :-
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नाम - एम. एल. नत्थानी 
 ( छत्तीसगढ़ )

प्रमाण पत्र - यह हमारी वाणी और सारा सच ( मीडिया ) के राष्ट्रीय हिन्दी समाचार पत्र द्वारा साप्ताहिक प्रतियोगिता - सत्र - 351 के लिए प्रेषित पद्य ( कविता )
पूर्णतः मौलिक रचना है ।

कानून का राज हो, अन्याय का अंत हो - डॉ अनुपमा वर्मा "हेमा "

कानून का राज हो, अन्याय का अंत हो - डॉ अनुपमा वर्मा "हेमा "

कलम उठी तो सच लिखेगी, झूठ से न घबराएगी,
अन्यायों के अंधकार में, न्याय-ज्योति जलाएगी।
लोकतंत्र की पावन धरती पर, कानून का सम्मान हो,
सत्ता हो जनसेवा का साधन, जनहित ही प्रधान हो।
जो गैरकानूनी राह चुनेगा, उसका सच उजागर होगा,
जो अवैधता को पोषित करेगा, वह जन-प्रश्नों के घेरे में होगा।
नाजायज हर कृत्य पर उठे, जनचेतना की आवाज़,
कानून-विरुद्ध कर्मों का टूटे, अन्यायपूर्ण हर ताज।
सरकारों का धर्म यही है, जनता का विश्वास रहे,
नियमों की मर्यादा में ही, हर निर्णय का वास रहे।
अनधिकृत अधिकारों की सीमा, कोई लाँघ न पाए,
अवैधानिक आदेशों पर, संविधान प्रश्न उठाए।
प्रतिबंधित हों वे कृत्य सभी, जो मानवता को छलते हैं,
आपराधिक मन के इरादे, समाज में विष घोलते हैं।
कानून किसी का दास नहीं, न ऊँचे पद का मान,
न्याय की चौखट पर एक समान, हो हर व्यक्ति की पहचान।
लोकतंत्र केवल शब्द नहीं, जन-जन का अधिकार है,
निर्भय होकर सच कह पाना, इसका मूल विचार है।
सरकारें आएँ, सरकारें जाएँ, संविधान अमर रहे,
न्याय, सत्य और जनकल्याण का, उज्ज्वल ध्वज लहराए।
मेरी कलम न बिकने वाली, न झुकने वाली शान है,
अन्याय के विरुद्ध उठी, यह जनता की जुबान है।
अवैधता के हर अँधेरे को, सत्य से मिटाना है,
कानून के शासन से ही, सुंदर राष्ट्र बनाना है।
कलम मेरी पहचान बने, सच मेरा अभिमान,
न्याय, समानता, बंधुत्व से, ऊँचा हो हिंदुस्तान।
लोकतंत्र की रक्षा करना, हर नागरिक का काम,
संविधान की राह पर चलकर, रोशन हो देश का नाम।

डॉ अनुपमा वर्मा "हेमा "
Punjab 

नशा मुक्ति - उर्मिल गुप्ता

नशा मुक्ति - उर्मिल गुप्ता

मज़े मज़े में पहले जब कोई करता है नशा
फिर पड़ जाती है लत ,हो जाती है दुर्दशा।
दिन भर की कड़ी मेहनत की कमाई उड़ा कर 
क्या खरीदते हो- एक बोतल, वह भी जहर भरा कर।
गैर कानूनी ढंग से जब पीते हो अवैध शराब
कर लेते हो अपनी किडनी, लीवर सब खराब।
जीवन सुधारने को अब तो करो कोई युक्ति
चलो सब मिल अपनाएं नशा मुक्ति।
क्या तुम्हें नहीं दिखता घर में पसरा सूनापन
नन्हे नन्हे बच्चों का सहमता- घुटता बचपन।
जिस पत्नी की आंखों में कभी बसता था सपना 
वह पैबंद लगी धोती से ढांपती  है तन अपना।
निवाले भी गिन गिन कर मिलते हैं खाने को
इतना भी होश कहां कि सोचे जवान बेटी ब्याहने को।
नशे के बोझ से जवानी में भी कमर झुकती
चलो सब मिल अपनाएं नशा मुक्ति।
नशा नहीं देखता कोई अमीर है या गरीब 
बिगड़ जाता है सभी पीने वालों का नसीब।
चाहे हो सिगरेट, शराब या ड्रग्स की हो बात
सभी में बद से बदतर हो जाते हैं हालात ।
फिर अपराधिक दुनिया में भी रख लेते हो कदम
कानून विरुद्ध लूटपाट,हत्या जैसे करते हो करम।
नरक यही मिलता है याद करो यह सूक्ति।
चलो सब मिल अपनाएं नशा मुक्ति।
गर मन में ठान लो, तो इससे दूरी बना सकते हो
अपने परिवार के लिए नई सुबह ला सकते हो।
फिर लौट आएगी पत्नी ,बच्चों की प्यारी मुस्कान
तुम्हारा शरीर भी स्वस्थ होकर मानेगा एहसान ।
अब भी समय है जीवन की राह नहीं रुकती ।
चलो सब मिल अपनाएं  नशा मुक्ति।।

उर्मिल गुप्ता🙏
Delhi 

Sunday, 18 October 2026

लोकतन्त्र - यशपाल निर्मल


लोकतन्त्र - यशपाल निर्मल

एक वृक्ष था गाँव के बीचोंबीच,

जिसकी जड़ें बहुत गहरी थीं,

शाखों पर बैठे थे अनेक पखेरू,

सबकी अपनी उड़ानें थीं।

कोई पूरब से सूरज चुनता,

कोई पश्चिम की बात करता,

कोई नीड़ बनाता पत्तों में,

कोई खुला आकाश पढ़ता।

वृक्ष ने कभी नहीं पूछा—

किसका रंग, किसकी बोली,

किसके पंखों में कितनी ताकत,

किसकी चोंच कितनी भोली।

सबको अपनी बात कहने का

एक खुला आकाश मिला था,

हर छोटे-बड़े पखेरू को

अपना एक विश्वास मिला था।

फिर एक दिन कुछ बाज़ आए,

अपने पंजों पर ताज सजाकर,

बोले—अब से यही दिशा होगी,

हम ही उड़ेंगे राह बनाकर।

उन्होंने सबसे ऊँची शाखा

पर अपना एक फरमान टाँगा,

धीरे-धीरे सहम गए पखेरू,

मौन हुआ वन, चुप हुआ पांगा।

एक नन्ही चिड़िया ने पूछा—

“क्या आकाश भी बिक जाता है?

क्या कोई एक पंखों वाला,

सबकी उड़ानें लिख जाता है?”

बूढ़े वृक्ष ने पत्ते हिलाए,

उसकी आँखों में जल था,

“जब तक प्रश्न हवा में जीवित हैं,

तब तक शेष बदल का पल है।”

अगली सुबह सभी पखेरू

एक साथ नभ में आए,

न किसी ने पंजे फैलाए,

न किसी के पंख झुकाए।

उन्होंने मिलकर घोंसलों से

एक नया संदेश उतारा—

“आकाश किसी एक का नहीं,

हर उड़ते पंख का है सहारा।”

बाजों ने फिर जाल बिछाए,

कुछ पंखों को स्वर्ण दिखाया,

कुछ को भय की रात दिखाई,

कुछ को ऊँचा पद दिलवाया।

लेकिन इस बार वृक्ष की जड़ में

एक बीज नया मुस्काया,

मिट्टी ने चुपचाप कहा—

“सत्य ने फिर सिर उठाया।”

वर्षों बाद वहाँ एक वन था,

जिसमें अनेक दिशाएँ थीं,

कहीं गीत थे, कहीं सवाल थे,

कहीं असहमति की छायाएँ थीं।

वृक्ष आज भी खड़ा वहीं है,

उसकी शाखाएँ कहती हैं—

जिस दिन प्रश्न डरेंगे मन में,

उस दिन जड़ें भी ढहती हैं।

लोकतन्त्र कोई ताज नहीं है,

जो सिर पर रखकर राज करे;

वह तो वह खुला हुआ आकाश है,

जिसमें हर पंख अपनी उड़ान भरे।

देश की विषम परिस्थितियों में - सूरज कुमार

देश की विषम परिस्थितियों में - सूरज कुमार

देश की विषम परिस्थितियों में 
निर्णय लेना लगता मानो भार।
सभी जन हो खुश जो रखे भावना
जिसको हम कहते सरकार।।

किसी को लाभ हो किसी को हानि 
जिसके मन में ना रहते ऐसे विचार। 
देश में सर्वत्र फैले खुशहाली 
प्राप्त होते सबको समान अधिकार।।

एक कदम स्वच्छता की ओर 
इस नारे से जिसको है प्यार।
गांव गांव में करती शिक्षा का विस्तार 
जिसको हम रहते सरकार।।

निर्धन को प्राप्त होते आवास 
सबको प्रदान करती रोजगार।
सबको देती जीने का आधार 
जिसको हम कहते सरकार।।

गांव की सड़कें चमकती 
जन जन पे करती है उपकार।
शिक्षा का निरंतर करती विस्तार 
जिसको हम कहते सरकार।।