Sunday, 22 March 2026

गाथा - ख़ुशी झा

गाथा - ख़ुशी झा 

जय विजय क़ी बात नहीं 
बस शत्रु का संहार हो
नारियों में युद्ध क़ी ललकार हो 
भावना के परे स्त्रित्व अवतार हो.
किसी एक क़ी बात नहीं,
विश्व विजय परमार हो,
लड़ सके जो मिट सके जो 
ऐसी चेतना का अवतार हो

नीलम्ब उठे भड़क उठे,
जो एक भी अगर वार हो.
जय विजय क़ी बात नहीं,
आत्मबल हीं परमार्थ हो.

कभी रुके नहीं  कभी झुके नहीं 
ऐसी अपनी सेना का साथ हो,
बचा कर लहू साथियों के 
शत्रुओं का हीं विनाश हो,
है अक्षम अजय वीर योद्धा 
देखना अब कोई ना वार हो.

चीर दे जो दुश्मन क़ी भुजा क़ो 
ऐसा हर एक नरसिंह अवतार हो
शेष बस बचाना नव जीवन रहे,
हर वार दुश्मनों का बेकार हो.

है हिन्द क़ी सेना सदा हीं विजयी 
सैन्य भारतीय पर हमें तो है नाज़ 
है  हर मुश्किलों में साथ साथ खड़े,
तो कैसे ना मिले हमको तख़्तताज़.

है ज़िद यही अपना हर सपना साकार हो,
हिंदुस्तान क़ी धरती पर हमारा अधिकार हो,
चीर कर ऱख दें हम भारतीय उन भुजाओं क़ो 
जो करता हमें कोई टकराव का ललकार हो.

ख़ुशी झा 
मुंबई

युद्ध - गोरक्ष जाधव

युद्ध - गोरक्ष जाधव

न भूलो की तुम युद्ध का हिस्सा हो,
तुम भी इस शांति की प्रयास में अशांत किस्सा हो।

युद्ध विफलता का आखरी परिणाम है,
युद्ध लोभ, अहंकार  और स्वार्थ का नाम है।

युद्ध अनियंत्रित सत्ता का घिनौना अंग है,
युद्ध सीमाओं के विस्तार का खूनी रंग है।

युद्ध नफरत के विस्फोट से शुरू होता है,
युद्ध चींटियों की तरह सबको मसलता है।

युद्ध लाता है लाशों के अंबार और बर्बरता,
युद्ध लाता है हतप्रभ जीवन की आकुलता।

बस बम, मिसाइल चलती है अनगिनत गोलियाँ,
मासूमों के खून से खेली जाती है रक्त रंजित होलियाँ।

धु-धुकर जलते है सजाए हुए सपने और आशियाने,
पेड़, पशु और पंछी भूल जाते है अपने गाने।

मिलते है आंसू,भूख,दर्द,विलाप और विनाश,
रहती है बाज के पंजों में फँसी मासूम चिड़िया को जीने की आस।

युद्ध केवल युध्द है जीवन का अंत,
मानवीय संवेदना का  निर्मम आकांत।

युद्ध नहीं हमें केवल बुद्ध चाहिए।
शांति से समृद्ध हमें  विश्व चाहिए।

न भूलो की तुम युद्ध का हिस्सा हो.....

गोरक्ष जाधव©®
मंगलवेढा, महाराष्ट्र.

युद्ध - रजनीश कुमार "गौरव"

मेरी कलम मेरी पहचान 
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              *युद्ध*

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*मानवता की रक्षा हो*
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प्रेम और शांति के साथ मिलजुल कर रहने की हमारी एक समृद्ध परम्परा रही है और दूसरी ओर एक सभ्य समाज, आपस में एक दूसरे से तनावपूर्ण जिंदगी जीने की इजाज़त भी नहीं देता है । हां,इस बात से इनकार नहीं किया जा सकता है कि लोगों को आपस में मतभेद भी होते है, मगर फ़िर बातचीत के माध्यम से पुनः मोहब्बत क़ायम करने का हमारे पास हजारों विकल्प भी खुले रहते है,पर इन दिनों हम उस विकल्प को थोड़ा नजरअंदाज करते जा रहे है,और अंततः उस युद्ध को ही हम अपनी शान समझने लगे है ।जो मानवता के लिये ख़तरा है और इस मंडराती हुई ख़तरा के जद में आज संभावित तौर पर हम सब है ।
   यह वक्त निस्संदेह इस गंभीर माहौल पर सोचने का है कि आखिर जो हमारी पहचान है उसे कैसे ससम्मान बरकरार रखा जाए ताकि अमन चैन के साथ दुनिया के हर नागरिक चिंतामुक्त होकर खुशहाल जीवन व्यतीत कर सके।इस विषय पर सामुहिक चिंतन करने का समय है। इसलिए आम आवाम की फ़िक्र को केंद्र में रखकर ही हर हाल में लड़ाई के निर्णय पर विचार न्यायोचित होगा।
हम वाक़िफ है अपनी मजबूती से,हम अवगत है अपनी वीरता से , हमें गर्व है अपने सेनाओं पर और हम जानते है अपनी अदम्य साहस को; मगर सबसे  पहले आदमी है और इस लिहाज़ से हमारे अंदर एक करुणा भी मौजूद है।
जरूरत है सिर्फ़ उसे जगाने की ताकि  निर्दोष आम आदमी एवं दुनिया के मासूम बच्चों की रक्षा हो सके।

         - रजनीश कुमार "गौरव"
            (स्वतंत्र रचनाकार)
कुतुबपुर, सारण, बिहार

सैनिक - इंजी.सौरभ पाण्डेय

सैनिक शब्द सुनते ही हमें गर्व महसूस होता हैl हमारा भारत देश कई सैनिकों के वीर गाथाओं से भरा एक संगम है, ईमानदारी व समर्पण वह वीरता की कहानी आज देश की हर घरों में हमें सुनने को मिलता है l हर सैनिक अपने फर्ज देश के ऊपर यह कुर्बानियां एक मिसाल है l                                                               हमारे देश के जनता वर्ग से यही निवेदन है कि हर सैनिक को हमें सम्मान की निगाह से देखना चाहिएl यह भी सोचना चाहिए यह देश के प्रति हमारी सुरक्षा के लिए सदैव तत्पर रहते हैं, तो हमारा भी कुछ फर्ज होना चाहिए कि उनके परिवार  के लोगों को वह सम्मान वह अपनापन दे जितना बन सके हमें उतना करना चाहिए l                                                              एक सैनिक जिसे ना कोई जाति से मतलब और ना ही धर्म से उसे बस इतना पता है यह मेरा देश है और मैं एक भारतीय हूंl जिन मां-बाप के ऐसे सैनिक बेटों को हम सभी सलाम करते हैं जिन्होंने अपने पुत्र को देश के नाम समर्पण किया है और हर तरफ से भारत माता की सुरक्षा की जिम्मेदारी सौंप हैं l ऐसे पुत्रों को हम सलाम करते हैं और उनके कार्यों को प्रति हम सभी भारतीय इनका सदैव आभार प्रकट करते हैं                 
                                        इंजी.सौरभ पाण्डेय जिला सुल्तानपुर उत्तर प्रदेश

तबाही - डा अनन्तराम चौबे अनन्त


 सारा सच हमारी वाणी की साप्ताहिक प्रतियोगिता हेतु 

नाम.. महाकवि डा अनन्तराम चौबे अनन्त जबलपुर मध्यप्रदेश 
कविता.. तबाही 

प्रकृति की अनहोनी घटना
जब भी तबाही मचाती है ।
स्मृतियों के झरोखों से ही
उस मंजर की याद आती हैं ।

भूकंप, तूफान, सुनामी हो
आते ही तबाही मचाते हैं ।
तबाही ही तबाही मचती है
जन जीवन तबाह कर देते है ।

सुनामी लहर कहीं आती हैं
शहर गांव उजाड़ देती हैं ।
इन्सान हों या जानवर हों
सभी को बेघर कर देती हैं ।

सुनामी लहर डरावनी है
सारा सच जहां से गुजरती है ।
कोहराम मचाती जाती है ।
पेड़ पौधे भी उजाड़ देती है ।

चारों तरफ रूदन क्रंदन 
ही क्रंदन सुनाई देता है ।
सारा सच लोगों में डर और 
भय हाहाकार मचा देता है ।

कोरोना ने तबाही मचाई
कोरोना ने सबको रूलाया था ।
सारा सच कोरोना की क्रूरता ने 
कैसा बेरहमी का कहर मचाया था ।

किसी के पिता किसी के बेटे को
कोरोना अकाल ही निगल गया ।
मां बहन बेटी बहूं को भी कोरोना 
की तबाही ने मौत ग्रास बना लिया ।

प्रकृति की ऐसी विनाशकारी
लीला को कौन रोक पाता है ।
प्रकृति को कब क्या करना है
भविष्य को कौन समझ पाता है ।

सुनामी भूकंप  कोरोना तबाही 
रूदन, क्रंदन को छोड़ जाती है ।
ऐसी त्रासदी  जब भी आती है
लाशों के ढेर लगाती जाती है ।

किसी की मां किसी का बेटा
बस लाशों में बदल जाते हैं ।
सारा सच कई मासूम बच्चे भी
मलवे में दबे जिन्दा बच जाते हैं ।

सुनामी लहर कब आ जाए
किस पर कैसे कहर बरसाए ।
कोई कुछ समझ नहीं पाता है 
रोता बिलखता  छोड़ जाता है ।

मूसलाधार बारिश जब होती
नदियां भी तबाही मचाती है ।
सारा सच प्रकृति की विनाश 
कारी लीलाएं तबाही मचाती हैं।

प्राकृति कब क्या खेल खिलाती
सारा सच कोई समझ नहीं पाते है ।
कुछ स्वार्थी लोग हो हल्ला करके
अपना उल्लू भी सीधा करते हैं ।

कोरोना भूकंप सुनामी की तबाही के
मंजर को देख मन विचलित होता है ।
हाहाकार शोकाकुल के मंजर में सारा 
सच जीवन कितना मुश्किल होता है


महाकवि डा अनन्तराम चौबे अनन्त 
     जबलपुर म प्र

गाथा - ख़ुशी झा