Thursday, 12 March 2026

स्वयंसिद्धा हो तुम - गोरक्ष जाधव

स्वयंसिद्धा हो तुम

नारी स्वयंसिद्धा हो तुम,

तुम शक्ति हो जीवन की,
चेतना,स्फूर्ति हर तन की,
अद्भुत है तेरी माया
संजीविनी हो मन-मन की।

नारी स्वयंसिद्धा हो तुम...

जगत जननी महामाया,
हर दृश्य की हो काया,
तुम निरंतर परिवर्तित रूप हो
परमपुरुष की हो तुम छाया।

नारी स्वयंसिद्धा हो तुम...

हर सजीव की संवेदना हो,
हर संघर्ष की प्रेरणा हो,
उसके बगैर कल्पना नहीं जीवन की,
तुम हर जीत की उत्तेजना हो।

नारी स्वयंसिद्धा हो तुम...

साहस हो,ओज हो,
हर कला की खोज हो ,
जीवन सरिता में उठती,
सुख-दुख की मौज हो।

नारी स्वयंसिद्धा हो तुम....

तुम शक्ति ही , तुम भक्ति हो,
शिव की अनन्य अभिव्यक्ति हो,
तुम काल की भी हो महाकाल,
जीवन संघर्ष की मुक्ति हो।

नारी स्वयंसिद्धा हो तुम,
शक्ति हो अभिव्यक्ति हो तुम।

गोरक्ष जाधव©®
मंगलवेढा, महाराष्ट्र

हे नारी हे नारी - यज्ञसेनी साहू

हे नारी हे नारी।
कुदरत ने तुझको बनाकर की दिखाई अपनी अद्भुत कलाकारि ।

त्रेतायुग मे जनकराजा की बेटी बन गयी  नाम था  सियाकुमारी ।
दुआपर युग मे राधा बन के जिनसे प्रेम किया वो थे श्री कृष्ण मुरारी ।
हे नारी ।।

दुर्गा बनके तुने असुरो का संहार किया जो थे दानव अत्याचारी ।
लक्ष्मी बन के तुने जग को अनाज का भंडार दिया और जग को उद्धारी।
हे नारी। ।

सावित्री बन के तुने सत्यवान को यमराज से बचाया धन्य है तेरी हिम्मत और बहादुरी ।
 घर मे बहू बेटी की भूमिका निभाई दिल से सारी ।
हे नारी ।

तु जीवन मे शिक्षा का प्रचार प्रसार कर तु
 कर रही है काम बहुत समझदारी ।
अब तो जज महिला और बन रही हर कर्मचारी ।
हे नारी।।

अब तो शमशान भी जाने लगी है और निभा रही अपनी
 जिम्मेदारी।य
आज हर क्षेत्र मे निभा रही है अपनी भागीदारी।
हे नारी ।।
रचना  - कवयित्री यज्ञसेनी साहू ✍✍
जय हिन्द जय भारत 🙏
Chattisgarh 

ममता - Dr CHANDRASEKHAR J

ममता *

ममता सभी महिलाओं में झलकती है,
सब कुछ सहिष्णुता में महिला अपनाती है।
सहन शक्ति धरती में सदैव उमड़ती है,
प्राकृतिक सुन्दरता से ही यह धरा भरी है ।।

 अत्याचार की मूल स्थिति असहन है,
 केवल नारी मात्र अधिक इसमें तड़पती है ।
 फिर भी इनमें समता भाव झलकता है,
 व्यभिचार का टप्पा सदा स्त्री को ही लगता है ।।

ममता, सहन भाव का उगम वात्सल्य से है,
वात्सल्य का उद्गम श्रृंगार भाव से ही होता है ।
श्रृंगार रस का भाव सच्चे प्यार में निहित है,
प्यार ही भरता शांति — सद्भाव जीवन में है ।।

क्यों प्यार फेर लिया मूँह, श्रृंगार से हैं ?
ममता का आस धरती में अब अगोचर है। 
भ्रूण को भी अपने के से काट फ़ेंक रहे हैं, 
क्या सद्भाव की मूर्ति छिपी हुई दानवता में हैं ?

Dr CHANDRASEKHAR J
LECTURER, DEPT OF LANGUAGES,
CHRIST JUNIOR COLLEGE
BANGALORE

नारी - आभा सिंह

#राष्ट्रीय हिन्दी साहित्य प्रतियोगिता मंच 
#हमारी_वाणी 
#मेरी कलम मेरी पहचान 
#विषय -नारी   
#शब्द सीमा -250

मैं गर्व गरिमा,मैं देव प्रतिमा,
मैं  ही  कृष्णा  का  मान  हूँ.. 
मैं ही रक्त अरूण अरूणिमा,
मैं  ही मीरा  का विषपान  हूँ..

मैं  ही अवनि और मैं ही अंबर,
मैं  ही सकल सम्पूर्ण विस्तार हूँ..
मैं ही माली और मैं ही उपवन,
मैं  ही  इस  सृष्टि  का  सार हूँ..

मैं ही भूत,भविष्य,वर्तमान हूँ,
मैं ही उपमेय और उपमान हूँ..
करुणा,धैर्य,शौर्य की परिभाषा,
मैं ही माँ अन्नपूर्णा की खान हूँ..

मैं त्याग व बलिदान की मूरत,
मैं नारी जीवन  का आधार हूँ..
ममता व प्रेम की पराकाष्ठा मैं,
मैं  ही  प्रीत  का  पारावार  हूँ..

मैं नारी कोमल हूँ कमजोर नहीं,
मैं भी नभ में उड़ान भरना चाहूँ..
पुरूष  प्रधान  इस  समाज  में,
मैं भी नया इतिहास गढ़ना चाहूँ..

शक्ति स्वरूपा नारी हूँ,अभिसारी हूँ,
मैं  ही  श्रद्धा  वात्सल्य की बहार हूँ..
लक्ष्मी,सरस्वती,दुर्गा और रणचंडी,
मैं  ही  माँ  कालिका का अवतार  हूँ..

नारी के शृंगार की अपनी स्वर्णिम गाथा है,
वैरागी शिव भी जिसके आगे सांसरिक हो 
जाता है !! 

आभा सिंह 
वाराणसी

सफर घूंघट से अंतरिक्ष तक - भगवती सक्सेना गौड़

सफर घूंघट से अंतरिक्ष तक - भगवती सक्सेना गौड़

पुरानी सदी थी, स्त्री घूंघट में थी। पर पर्दे में भी उसकी नजरें सदा खुली थी। समाज के बंदिशों का आदर सम्मान करते हुए सब सह लेती थी। हर ओर मतलब का संसार था।
चूल्हे की तपिश से जूझने के कशमकश के अलावा कोई चारा न था। वर्तमान सदी तक उसके ज्ञान चक्षु खुले और उसने अपने चारों ओर निगाहें डाली। 
एकाएक शिक्षा का प्रसार महिलाओं में हुआ, उसने जाना समझा, स्त्री को स्वतंत्रता तब ही मिलेगी जब वह भी शिक्षित होगी और सिर्फ शिक्षित ही नहीं, हर विद्या में पारंगत होगी। और उसे ईश्वर का और घर के पुरुषों का भी सहयोग मिला...। वह उन्नति के पायदानों पर शनैः शनैः बढ़ती चली गयी। आज *नारी* अपनी मंजिल के करीब ही है... डॉक्टर, इंजीनियर, वैज्ञानिक, स्पेस इंजीनियर, मार्केटिंग हेड, आईटी मैनेजर, प्रोफेसर, राइटर और बहुत कुछ बन चुकी है। कहाँ तक गिनाए, कोई भी क्षेत्र अछूता नहीं रहा वह तो आकाश तक पहुँच पायलट भी बन चुकी है। इसके बावजूद *नारी* पास ममता का आँचल भी है, बुजुर्गों के लिए सहानुभूति भी है। अब वह पन्नों पर तो लिखती ही है, पर उसकी रचनाएं आकाश तक गुंजायमान होती हैं। आज की *नारी* सृजन और शक्ति का बेजोड़ नमूना है, मेरा भी शत शत प्रणाम है !!

स्वरचित
भगवती सक्सेना गौड़
Karnataka