राष्ट्रीय हिन्दी साहित्य मंच हमारीवाणी
साप्ताहिक प्रतियोगिता हेतु
मंहगाई - डां अनन्तराम चौबे अनन्त
नेता मंत्री उद्योगपतियों
अफसरों को मंहगाई से
इनको क्या लेना-देना है
इन सबके पास खजाना है।
सारा सच आम जनता पर
ही मंहगाई की मार पड़ी है ।
बाजार में देखो हर वस्तु के
दामों की कैसी होड़ मची है ।
स्कूलों में देखो बच्चों का
बस्ता किताब कितना भारी है ।
फीस तो इतनी बड़ी हुई है
स्कूलों की फीस बहुत भारी है।
मंहगाई की मार पड़ी है
फिर भी हम झेल रहे हैं ।
गरीब और मध्यम वर्ग तो
मुश्किल में ही जी रहे हैं ।
सारा सच मंहगाई का किस
प्रकार आंकलन किया जाय ।
गरीबी,अमीरी की तराजू पर
किस तरह से तौला जाय ।
सारी मंहगाई गरीबों
के आसपास रहती है ।
दाल रोटी खाना भी
आज मुश्किल पड़ती है ।
मंहगाई अमीरों के कभी
आसपास नही रहती है ।
अमीरों के पास मंहगाई
किस हक से जा सकती है ।
अमीरों के घर मंहगाई किसी
कोने में छुपी बैठी रहती है ।
अमीर के घर मंहगाई भी
रिश्ता कभी नही जोड़ती है ।
सारा सच पैसों की उनके
पा अहमियत ही नही होती है ।
पैसा से उनकी तिजोरी
भरी हुई हमेशा रहती हैं ।
गरीब खून पसीना बहाकर
भी पैसा नही कमा पाते हैं ।
अमीर होटल में बैठकर
शराब पीकर खर्च कर देते है ।
मंहगाई को सरेआम अपने
कदमों तले ही नचाते हैं ।
किस चिड़िया का नाम मंहगाई है
वो नही जानते समझते है ।
नेताओं से मंहगाई की
बात करो कहते हैं कुछ और
बड़ी जाने दो ले जाऊंगा ।
अगले चुनाव में बोट
लेने जब आऊंगा ।
अमीरों के घर सुबह शाम
ऐसे रोज बहुत काम होते है ।
मंहगाई क्या कैसी होती है
अमीर लोग नही समझते है ।
मंहगाई की मार पड़ी है
कमर तोड़ ये मंहगाई है ।
दाल रोटी खाना मुश्किल है
कैसे हो बच्चों की पढ़ाई है ।
मंहगाई गरीबों के यहां रहती है
जिनको दाल रोटी भी बहुत ही
मुश्किल से नसीब होती है ।
गरीब की किस्मत में होती है ।
महाकवि डां अनन्तराम चौबे अनन्त
जबलपुर म




.jpg)