योग — आत्मज्योति का अमृतपथ - डॉ। वै। कस्तूरी बाई - कर्नाटक
योग केवल आसनों का सीमित अभ्यास नहीं,
यह आत्मा का परमात्मा से दिव्य संवाद है।
जहाँ श्वास मंत्र बनती है,
और मौन स्वयं वेदों का उद्घोष बन जाता है।
रोग जब शरीर पर अपना अधिकार जताता है,
तब योग अमृत-औषधि बनकर
प्राणों में नवजीवन का संचार करता है।
यह केवल अंगों का व्यायाम नहीं,
अपितु चेतना का जागरण है।
ध्यान वह पावन दीप है,
जो चंचल मन के अंधकार को हर लेता है।
जहाँ विचारों का कोलाहल शांत होता है,
वहीं आत्मा का मधुर स्वर सुनाई देता है।
आसन शरीर की स्थिरता का आधार हैं,
किन्तु उनका लक्ष्य केवल लचीलापन नहीं;
वे संयम, संतुलन और साधना के
दिव्य सोपान हैं।
शरीर जब अनुशासन का मंदिर बनता है,
तभी आत्मा उसमें प्रकाशमान देवता की भाँति विराजती है।
स्वास्थ्य केवल रोगों का अभाव नहीं,
बल्कि तन, मन और प्राण की समरसता है।
ऊर्जा वही दिव्य अग्नि है,
जो निराशा की रात्रि को
आशा के प्रभात में परिवर्तित कर देती है।
शांति बाहर के संसार में नहीं,
वह अपने ही अंतःकरण की निस्तब्ध सरिता में प्रवाहित होती है।
योग उसी सरिता तक पहुँचने का
ऋषियों द्वारा प्रदत्त अमूल्य सेतु है।
आइए,
प्रतिदिन योग को जीवन का यज्ञ बनाएँ,
ध्यान को आत्मा का उत्सव बनाएँ,
आसन को अनुशासन का अलंकार बनाएँ।
रोग को पराजित कर स्वास्थ्य का वरण करें,
ऊर्जा को करुणा से,
और शक्ति को विनम्रता से अलंकृत करें।
तभी मानव जीवन
केवल जीने की प्रक्रिया नहीं रहेगा,
वरन् सत्य, शिव और सुंदर की
अविराम साधना बन जाएगा;
जहाँ शरीर पवित्र साधन होगा,
आत्मा दिव्य पथप्रदर्शक होगी,
और योग मानवता के कल्याण का
सनातन महामंत्र बनकर
युग-युगांतर तक आलोक बिखेरता रहेगा।
डॉ। वै। कस्तूरी बाई - कर्नाटक
बेंगलुरु
कर्नाटक

.jpg)


