Monday, 5 October 2026

मतदान - संजय वर्मा'दृष्टि'

मतदान - संजय वर्मा'दृष्टि'
 
मतदान करने सबको जाना है
सबके ये बातें समझाना है

मतदान हमारा मूल अधिकार है
लोकतंत्र को ये बडा त्यौहार है

पर्ची अन्य विकल्प साथ ले जाना है
मतदान करने का हक़ भी पाना है

उत्साह जागरूकता मन मे लाना है
शत प्रतिशत हो मतदान ये दिखाना है

मतदान से लोकतंत्र को मजबूत बनाना है
क्षेत्र को खुशहाली व उन्नतिशील बनाना है 

संजय वर्मा'दृष्टि'
मनावर(धार)मप्र

कसम की कसम - जौली अंकल

कसम की कसम - जौली अंकल

हमारे देश भारत में खानपान की अद्भुत विविधता है। कोई सुबह उठकर गरमा-गरम परोंठो, समोसों का शौकीन है, तो कोई दोपहर में कुरकुरे डोसे का दीवाना। लेकिन अगर थोड़ा गहराई से देखें, तो भारत में सुबह से लेकर रात तक सबसे ज़्यादा कोई चीज़ चाव से खाई जाती है, तो वह है 'कसम'। बचपन में बात-बात पर विद्या माता की कसम या मम्मी-पापा की कसम खाकर बड़े होने की यह आदत उम्र के साथ छूटती नहीं, बल्कि और ज़्यादा वीआईपी और राजसी हो जाती है। वार्ड पार्षद और विधायक से लेकर मुख्यमंत्री और प्रधानमंत्री तक, जब भी कोई नई कुर्सी संभालता है, तो सबसे पहले एक भव्य शपथ ग्रहण समारोह होता है। नए कड़क कपड़े पहनकर, ईश्वर और संविधान को साक्षी मानकर ऐसी कसम खाई जाती है मानो आज से ही जनता के बैंक खाते में खुशियों की लॉटरी लगने वाली है और नेता जी अपना हर पल जनहित में ही गुज़ारेंगे।

अफ़सोस की बात यह है कि कुछ नेता जी कसम का वह सरकारी कागज़ इतनी हड़बड़ी में पढ़ते हैं, मानो पीछे उनकी ट्रेन छूट रही हो। भारी-भरकम शब्दों को ठीक से बोल भी नहीं पाते। इसके बाद जो महारथी इसे शुद्ध-शुद्ध पढ़ भी लेते हैं, वे राजभवन के मुख्य द्वार से बाहर निकलते ही अपनी चमचमाती गाड़ी की एसी की ठंडी हवा खाते ही सब कुछ भूल जाते हैं। टीवी पर जो चेहरा अत्यंत मासूम और विनम्र लग रहा था, दफ़्तर पहुंचते ही बड़े और कड़क मालिक में तब्दील हो जाता है। ऐसा लगता है कि वह पवित्र कसम सिर्फ उस एक दिन मुफ्त की तालियां बटोरने के लिए थी, ज़िंदगी भर निभाने के लिए नहीं। चुनाव जीतने से पहले जो नेता जी जनता के सामने पूरी तरह झुककर हाथ जोड़ रहे थे, कुर्सी पर बैठते ही जनता को पहचानने से भी इंकार कर देते हैं। लोकतंत्र के इस रंगमंच पर कसम की गरिमा हर पाँच साल में टूटती है। जनता हर बार एक नई कसम पर भरोसा करती है और बदले में सिर्फ कोरे आश्वासन पाती है। कसम खाने को हमारे देश में ऐसा नुस्खा मान लिया गया है जिससे काम पूरा करना हो या घोटाला दबाना, हर मर्ज़ का इलाज मुमकिन है। विकसित देशों में नेताओं के वादे कानूनी दस्तावेज़ की तरह होते हैं जहाँ कसम तोड़ने पर सीधे कुर्सी गँवानी पड़ती है, लेकिन हमारे यहाँ कसम खाना एक ऐसी कला बन चुकी है जिसमें जितना बड़ा कलाकार, उसकी कुर्सी उतनी ही सुरक्षित।

जौली अंकल के अनुसार इस भयंकर भूलने की बीमारी का एक बड़ा जादुई इलाज मौजूद है। जैसे हम अपने घरों में शादी या अवॉर्ड्स की तस्वीरें फ्रेम करवाकर लगाते हैं, वैसे ही हर मंत्री और नेता को अपने शपथ पत्र की प्रतिलिपि को एक शानदार फोटो फ्रेम में जड़वाना चाहिए। इस फ्रेम को उनके सरकारी दफ़्तर की मुख्य दीवार पर और घर के ड्राइंग रूम में सोफे के ठीक सामने टांग दिया जाए। जब भी वे मखमली सोफे पर बैठकर चाय की चुस्की लें या किसी फाइल पर दस्तखत करने के लिए पेन उठाएं, तो वह कसम सीधे उनकी आँखों में आँखें डालकर उन्हें घूर रही हो। यह चमचमाता फ्रेम उन्हें हमेशा याद दिलाता रहेगा कि कुर्सी की असली गरिमा क्या है और करोड़ों उम्मीदों से भरे वादों की वास्तविक कीमत क्या है।

इस फ्रेम के लगने से नेताओं की अंतरात्मा रोज़ सुबह एक बार ज़रूर जागेगी और उन्हें याद दिलाएगी कि वे जनता के मालिक नहीं, बल्कि चुने गए सेवक हैं। जब भी कोई वीआईपी मेहमान दफ़्तर आएगा, तो सबसे पहले उस कसम के फ्रेम को देखेगा, जिससे नेता जी पर नैतिक दबाव बना रहेगा। यह लोकतंत्र का ऐसा आईना होगा जो नेता जी को उनकी असलियत दिखाता रहेगा। राजनीति में जब तक ऐसा कड़ा और रचनात्मक बदलाव नहीं आएगा, तब तक कसम सिर्फ एक रस्म बनी रहेगी और जनता खुद को ठगा हुआ महसूस करती रहेगी।

आखिर में देश के सभी नेताओं से विनती है कि आज तक जो हुआ उसे भूलकर आज यह कसम खाओ कि पद संभालते समय जो कसम खाई थी, उस कसम की कसम कि उस कसम को आज के बाद कभी नहीं भूलेंगे। जब आप अपनी खाई हुई कसम के हर एक शब्द को अपनी मेहनत से सच करके दिखाएंगे और ईमानदारी से काम करेंगे, तभी इस देश की आम जनता के चेहरे पर सच्ची मुस्कान वापस आएगी।

- जौली अंकल

Sunday, 4 October 2026

पोषण दिवस — आइए मिलकर खुशियाँ बाँटें

पोषण दिवस — आइए, मिलकर खुशियाँ बाँटें 🌸

इस बुधवार को बादशाहपुर आंगनवाड़ी में पोषण दिवस के अवसर पर लगभग 200 महिलाओं के लिए गुड़-चना एवं केले वितरित करने की एक छोटी-सी पहल की जा रही है।

हमारा उद्देश्य केवल भोजन बाँटना नहीं, बल्कि पोषण, स्वास्थ्य और जागरूकता का संदेश हर परिवार तक पहुँचाना है।

हमारा विश्वास है कि समाज में बदलाव हमेशा बड़ी चीज़ों से नहीं, बल्कि छोटे-छोटे सहयोग और नेक प्रयासों से शुरू होता है। 🙏

यदि आप भी इस पहल का हिस्सा बनना चाहते हैं और गुड़-चना, केले या किसी अन्य रूप में सहयोग करना चाहते हैं, तो कृपया संपर्क करें:

आपका छोटा-सा सहयोग किसी के लिए
पोषण, सम्मान और मुस्कान का कारण बन सकता है। 

आइए, इस पोषण दिवस पर मिलकर एक ऐसा संदेश दें—
“हर महिला स्वस्थ, हर परिवार सशक्त।” 

मतदान का महत्व - उजमा तरनुम

मतदान का महत्व - उजमा तरनुम 

लोकतंत्र किसी भी देश की शासन-व्यवस्था का आधार है और मतदान लोकतंत्र को मजबूत बनाने का सबसे महत्वपूर्ण माध्यम है। मतदान के द्वारा नागरिक अपने प्रतिनिधियों का चुनाव करते हैं और देश के विकास तथा शासन की दिशा निर्धारित करने में अपनी भूमिका निभाते हैं। इसलिए मतदान केवल हमारा अधिकार ही नहीं, बल्कि एक महत्वपूर्ण नागरिक जिम्मेदारी भी है।

भारत एक विशाल लोकतांत्रिक देश है, जहाँ प्रत्येक योग्य नागरिक को अपने मत का प्रयोग करने का अधिकार प्राप्त है। हमारा एक मत भी देश के भविष्य को प्रभावित कर सकता है। मतदान के माध्यम से नागरिक अपनी पसंद के प्रतिनिधि का चुनाव करते हैं और अपनी अपेक्षाओं, समस्याओं तथा विचारों को लोकतांत्रिक प्रक्रिया के सामने रखते हैं।

आज के समय में युवाओं की मतदान में भागीदारी विशेष रूप से महत्वपूर्ण है। युवा देश की सबसे बड़ी शक्ति हैं। यदि युवा जागरूक होकर मतदान करें, तो वे शिक्षा, रोजगार, स्वास्थ्य, विकास और सामाजिक सुधार जैसे महत्वपूर्ण विषयों पर लोकतांत्रिक प्रक्रिया को मजबूत कर सकते हैं। इसलिए प्रत्येक युवा को मतदान के महत्व को समझना और चुनाव के समय अपने मताधिकार का जिम्मेदारीपूर्वक प्रयोग करना चाहिए।

मतदान करते समय जाति, धर्म, भाषा, व्यक्तिगत संबंध या किसी प्रकार के दबाव के बजाय उम्मीदवारों के कार्य, नीतियों और सार्वजनिक मुद्दों पर विचार करना आवश्यक है। एक जागरूक मतदाता सही जानकारी प्राप्त करके स्वतंत्र रूप से अपना निर्णय लेता है।

मतदान का प्रतिशत बढ़ना लोकतंत्र में नागरिकों की सक्रिय भागीदारी को दर्शाता है। हमें मतदान के दिन अपने मताधिकार का प्रयोग करने के साथ-साथ अपने परिवार और समाज के अन्य योग्य नागरिकों को भी मतदान के लिए जागरूक करना चाहिए।

अंततः कहा जा सकता है कि मतदान लोकतंत्र की शक्ति है और जागरूक मतदाता लोकतंत्र की नींव। हमारा एक मत केवल एक बटन दबाना नहीं, बल्कि देश के भविष्य के निर्माण में हमारी भागीदारी है। इसलिए प्रत्येक नागरिक को अपने मताधिकार का सम्मान करते हुए निष्पक्ष, स्वतंत्र और जिम्मेदारीपूर्ण मतदान करना चाहिए।

उजमा तरनुम 
कर्नाटका 

लोकतंत्र का प्रहरी - डॉ. प्रो. वै. कस्तूरी बाई


 
लोकतंत्र का प्रहरी - डॉ. प्रो. वै. कस्तूरी बाई 

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चुनाव आयोग बने प्रहरी, लोकतंत्र की शान,
 निष्पक्षता की राह दिखाए, रखे देश का मान।
 मुख्य निर्वाचन आयुक्त की दृष्टि रहे सजग-साकार,
 हर मतदाता के अधिकारों का हो पूर्ण सत्कार।
मतदाता सूची शुद्ध रहे, हर योग्य नाम का मान,
 नामांकन की हर प्रक्रिया में हो स्पष्ट विधान।
 न धन का दबाव, न छल-कपट, न कोई धांधली,
 मत की कीमत समझे जनता—यही लोकतंत्र की लाली।
पारदर्शिता की उजली किरण हर चरण में साथ रहे,
 मतदान-कक्ष में निर्भय होकर मतदाता अपना मत दे।
 न भय किसी का, न प्रलोभन हो, न दबाव की दीवार,
 एक-एक मत में छिपा हुआ है जनादेश अपार।
आदर्श आचार-संहिता बने मर्यादा की रेखा,
 सत्ता हो या विपक्ष—नियमों का हो लेखा।
 जाति-धर्म की दीवारों से ऊपर उठे विचार,
 नीति, कर्म और जनहित पर हो मतदाता का अधिकार।
मतगणना हो निष्पक्ष, स्पष्ट, विश्वसनीय,
 हर चरण का सत्य रहे जनता के लिए दृश्यनीय।
 शंका यदि उठे कहीं, तो तथ्य बने आधार,
 विश्वास और पारदर्शिता से सुदृढ़ हो लोकतंत्र का द्वार।
न मेरा मत बिके कभी, न मेरा अधिकार झुके,
 मेरी उँगली की स्याही से भविष्य के दीप जले।
 मत केवल निशान नहीं—जनता की आवाज़ है,
हर जागरूक मतदाता ही लोकतंत्र का प्रहरी आज है।

डॉ. प्रो. वै. कस्तूरी बाई 
बेंगलूरु 
कर्नाटक