Wednesday, 15 July 2026

चंदा चोरी - ललित कुमार शर्मा

 

चंदा चोरी - ललित कुमार शर्मा  

राम भक्तों ने हाथ जोड़कर, चंदा था दिया चढाए
मन में आस्था राम की, बस भव्य मंदिर बन जाए 

जोर शोर से कर निर्माण, राम मंदिर दिया बनाए
लगा सदियों बाद स्वयं, लौट रघुबर घर को आए

हुई धन्य अयोध्या  नगरी, हुआ शुरु नया अध्याय 
जन मानस उमड़ पड़ा, राम लला  मन में बिठाए 

आने लगे यही चाहत लिए, श्रीराम दर्शन हो जाए 
फिर गरीब हो या अमीर, खूब चढ़ावा रहे चढ़ाए 

दान पात्र से गिनने नोटों को, लोगों को दिया बिठाए
देखकर दान राम मंदिर का, कुछ अधर्मी थे ललचाए 

भरने को घर की तिजोरी, राम के घर में सेंध लगाई 
करने ऐसा पाप तो देखो , आत्मा ज़रा नहीं सकुचाई 

लाखों रुपए अपनों में बाँटे, लाखों को दिया छिपाए 
पाप के आए उन्हीं  पैसों से,गाड़ी और घर भी बनाए 

होती रही चोरी चंदे की, रहे मूक बैठे चंपत राय
चंपत के चतुर चेलों ने, मिलकर लाखों दिए उड़ाए

कह रहे अब चंपत जी सबको, कि वो तो हैं सीधे सादे
वो हैं निर्दोष, निष्पाप हमेशा, पहचान न पाए इरादे

चढ़ावा चोरी की जाँच हो रही, मचा रहे हैं सब शोर
कुछ बंदर हैं जेल के अंदर, बाहर नाच रहे कुछ मोर

कह रही सरकार ये सबसे, सख्त होगी कार्रवाई
देंगे सख्त सज़ा चोरों को, वसूलेंगे उनसे पाई-पाई 

सज़ा से गर डरता इंसान, न बनता बलात्कारी चोर
इंसानियत रहे ज़िन्दा धरती पर, हो ऐसी उजियारी भोर

स्वरचित एवं मौलिक रचना

ललित कुमार शर्मा 
नई दिल्ली

Tuesday, 14 July 2026

सेवा : मानवता का सर्वोच्च धर्म - उजमा तरनुम

 


सेवा : मानवता का सर्वोच्च धर्म - उजमा तरनुमा

सेवा मानव जीवन का एक महान गुण है। यह केवल किसी की सहायता करने का कार्य नहीं, बल्कि मानवता के प्रति हमारी संवेदनशीलता और उत्तरदायित्व का प्रतीक है। सेवा का भाव व्यक्ति को स्वार्थ से ऊपर उठाकर समाज और राष्ट्र के कल्याण के लिए प्रेरित करता है।

हमारे भारतीय संस्कारों में सेवा को सर्वोच्च धर्म माना गया है। माता-पिता की सेवा, गुरुजनों का सम्मान, रोगियों की सहायता तथा जरूरतमंदों की मदद करना सेवा के ही विभिन्न रूप हैं। सेवा के लिए धन का होना आवश्यक नहीं है। मधुर वचन, सहानुभूति, समय और श्रम का योगदान भी सेवा का महत्वपूर्ण रूप है।

आज के व्यस्त और प्रतिस्पर्धी युग में लोगों के पास एक-दूसरे के लिए समय कम होता जा रहा है। ऐसे समय में सेवा का महत्व और भी बढ़ जाता है। किसी भूखे को भोजन देना, वृद्ध व्यक्ति को सड़क पार कराने में मदद करना, रक्तदान करना, पर्यावरण संरक्षण के लिए वृक्षारोपण करना तथा शिक्षा से वंचित बच्चों को पढ़ाना समाज सेवा के उत्कृष्ट उदाहरण हैं।

सेवा का लाभ केवल समाज को ही नहीं मिलता, बल्कि सेवा करने वाले व्यक्ति को भी आत्मिक संतोष और मानसिक शांति प्राप्त होती है। सेवा मनुष्य के भीतर करुणा, दया और प्रेम जैसे गुणों का विकास करती है। यही गुण एक आदर्श समाज की नींव रखते हैं।

अतः प्रत्येक व्यक्ति को अपने जीवन में सेवा के भाव को अपनाना चाहिए। यदि हम सभी अपनी क्षमता के अनुसार दूसरों की सहायता करें, तो समाज में सुख, शांति और सद्भाव का वातावरण स्थापित हो सकता है। वास्तव में, निःस्वार्थ सेवा ही मानव जीवन को सार्थक और महान बनाती है।

Uzma Taranum 

Karnataka 

दान - अनीता चमोली "अनू"

 

दान - अनीता चमोली "अनू"
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मंदिर मस्जिद गुरूद्वारे मे देते है सब दान।
खंबो पर अपना नाम लिखाकर बन जाते है छोटे भी महान।
लेकिन जो है दिल के बडे उनको है सच्चा ज्ञान। 
रोटी कपडा और औषधि से  बडा न कोई दान।
पैसे मत दो मंदिर मस्जिद ईश्वर ने दिये दो हाथ।
थोडा समय का दान मिलाकर करो नयी शुरुआत।
गरीब बच्चों को पढा लिखा कर उनका जीवन सवांर दो।
गरीब बिटियो की शादी मे पहुंच कर  आशीर्वाद और प्यार दो।
वन्य जीवों पर दया करो तुम उनको जीवन दान दो।
धरती को रखो हरा भरा अर प्रकृति को सौन्दर्य दान दो।
दान नही जो धन से होता लूट उसकी हो जाती है।
चोर लूटेरे भरे पडे है हकदार को कब रोटी मिल पाती है।
नही मुझे सम्मान की लालसा नही मेरा कोई नाम हो।
इतनी सी है इच्छा मेरी इन हाथो से कर्म सारे मेरे निष्काम हो।

       अनीता चमोली "अनू"
        उत्तराखंड
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दान का धर्म - डॉ. वै. कस्तूरी बाई

 


दान का धर्म - डॉ. वै. कस्तूरी बाई 

चंदा यदि छल की चादर ओढ़े, तो वह धर्म नहीं, व्यापार बने,
 योगदान तभी पावन होता, जब निस्वार्थ भाव का द्वार खुले।
मदद वही, जो मौन करुणा बन, पीड़ित के आँसू पी जाए,
 भेंट वही, जो अहंकार त्यागकर, मानवता के चरण चढ़ जाए।
सेवा केवल कर्म नहीं है, यह जीवन का दिव्य विधान,
 जहाँ परहित ही परम आराध्य, वहीं बसता सच्चा भगवान।
पुण्य कभी सिक्कों से नहीं, निर्मल अंतःकरण से मिलता है,
 जो भूखे के अधरों पर मुस्कान धर दे, वही अमृतफल खिलता है।
पर जहाँ चोरी विश्वास चुराए, और घोटाला जनधन हर ले,
 वहाँ सभ्यता की आँखें रोतीं, न्याय स्वयं भी मौन ठहर ले।
धन का वैभव क्षणभंगुर होता, चरित्र सदा अमर कहलाता,
 लोभ की ज्वाला अंततः मानव का ही अस्तित्व जलाती जाती।
सहयोग वह दीपक है, जो अनेक हृदयों को आलोकित करता है,
 एकता का प्रत्येक संकल्प राष्ट्र का भाग्य प्रकाशित करता है।
दान न केवल वस्तु का अर्पण, अपितु मन का पावन विस्तार है,
 जहाँ समर्पण की गंगा बहती, वहीं सच्चा जीवन साकार है।
आओ ऐसा युग फिर रचें, जहाँ सत्य ही सर्वोच्च प्रमाण बने,
 न छल, न प्रपंच, न लोभ का विष, केवल मानवता का गान बने।
करुणा हो पूँजी, सेवा हो साधना, सहयोग हमारा सम्मान बने,
 और प्रत्येक दान, प्रत्येक योगदान, भारत की उज्ज्वल पहचान बने।

डॉ. वै. कस्तूरी बाई 
कर्नाटक

दान की ओट - डॉ अनुपमा वर्मा "हेमा"

 


दान की ओट - डॉ अनुपमा वर्मा "हेमा"

चंदे की थाली लेकर जब,

कुछ चेहरे मुस्काते हैं,

सेवा के मीठे नारों से,

सपनों को बहलाते हैं।

दान समझकर जो सौंपा था,

वह विश्वास का अंश था,

पर चोरी की काली छाया में,

टूट गया हर हर्ष था।

योगदान था जनता का,

आशा की हर साँस थी,

घोटालों की आग लगी तो,

जल उठी हर आस थी।

भेंट अगर ईमान की हो,

तो मंदिर भी मुस्काता है,

पुण्य तभी फलता जग में,

जब मन निर्मल हो जाता है।

सेवा का अर्थ दिखावा नहीं,

न सत्ता का व्यापार बने,

मानवता की हर धड़कन में,

करुणा का संसार बने।

आओ ऐसा युग रचें,

जहाँ विश्वास न बिक पाए,

चंदा पहुँचे ज़रूरतमंद तक,

कोई अधिकार न लुट पाए।

दान नहीं है धन का केवल,

मन का उजला व्यवहार है,

सहयोग ही वह शक्ति है,

जिससे रोशन हर परिवार है।


डॉ अनुपमा वर्मा "हेमा"

पंजाब