लोकतंत्र का लहू - Dr. Pro. Y. Kasturi Bai
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दल बदलू दरबारों में,
वफ़ा की कीमत लगती है रोज़,
जहाँ आत्मा गिरवी रखी जाती है,
और सौदे होते हैं बंद कमरों में, बेआवाज़।
धोखेबाज़ मुस्कानों का यह मेला,
जहाँ हर चेहरा मुखौटा है,
जनता को सपनों का झुनझुना देकर,
पीछे से सत्ता का पूरा खेल होता है।
चालबाज़ी इनके खून में है,
साज़िश इनकी साँसों में,
हर वादा एक जाल है,
हर भाषण एक धोखा।
ग़द्दार अब दुश्मन नहीं कहलाते,
वे “माननीय” बन जाते हैं,
जो देश को बेचकर भी,
देशभक्ति के गीत गाते हैं।
पलटू इरादों की यह राजनीति,
जहाँ सिद्धांत रोज़ मरते हैं,
कल जो गालियाँ देते थे एक-दूसरे को,
आज साथ बैठकर सत्ता की रोटियाँ सेंकते हैं।
बेईमानी अब शर्म नहीं,
बल्कि योग्यता का प्रमाण बन गई है,
जो जितना बड़ा झूठ बोले,
वही सबसे बड़ा नेता बन गया है।
मौक़ापरस्तों की यह भीड़,
हर लहर के साथ बहती है,
जहाँ न विचार हैं, न आदर्श,
बस कुर्सी की भूख ही सब कुछ कहती है।
विश्वासघात अब रिवाज़ है,
जनता सिर्फ एक सीढ़ी है,
जिस पर चढ़कर ये लोग,
फिर उसी सीढ़ी को तोड़ देते हैं।
धन का लालच, पद की प्यास,
इनकी नसों में ज़हर बन बहती है,
देश की मिट्टी, माँ की ममता,
सब इनकी नज़रों में सस्ती है।
कुटुंब-वारसत्व का यह खेल,
लोकतंत्र का गला घोंट रहा है,
जहाँ बेटा, बेटी, दामाद—
सब कुर्सी के वारिस बनते जा रहे हैं।
अत्याचार की आंधी में,
गरीब की चीख दब जाती है,
और मीडिया—जो सच का प्रहरी था,
अब सत्ता का ढोलकिया बन जाता है।
चुनाव अब त्योहार नहीं,
एक व्यापार बन चुका है,
जहाँ वोट बिकते हैं नोटों में,
और जनमत का सौदा खुलेआम होता है।
प्रजा की पीड़ा अब चीख बन चुकी है,
पर सुनने वाला कोई नहीं,
हर गली में सवाल खड़े हैं,
पर जवाब देने वाला कोई नहीं।
देश की तरक्की रो रही है,
विकास दम तोड़ रहा है,
क्योंकि जिन हाथों में बागडोर है,
वही जड़ें काटने में लगे हैं।
ये नेता नहीं—
यह व्यवस्था के दलाल हैं,
जो भविष्य को गिरवी रखकर,
वर्तमान में ऐश कर रहे हैं।
पर सुन लो, ऐ सत्ता के सौदागरों—
इतिहास तुम्हें माफ़ नहीं करेगा,
जब जनता का सब्र टूटेगा,
तो हर सिंहासन राख में बदल जाएगा।
वह दिन आएगा—
जब झूठ के महल गिरेंगे,
और सच की एक चिंगारी,
तुम्हारे साम्राज्य को जला देगी।
Dr. Pro. Y. Kasturi Bai
Bengaluru
Karnataka