Thursday, 28 May 2026

रक्त से नहीं, करुणा से होता है धर्म - Dr. Pro. Y. Kasturi Bai

रक्त से नहीं, करुणा से होता है धर्म”
क़ुर्बान कहो, या कह लो बली,
 क्या ईश्वर माँगें रक्त की कली?
 क्या पूजा का पावन आँगन,
 निर्दोषों के क्रंदन से हो वंदन?
जीव सभी तो प्राणधारी हैं,
 धरती माँ की संतति प्यारी हैं।
 यज्ञ, हवन, आहुति, अर्पण,
 थे त्याग, दया, संयम के दर्पण।
पर मानव ने अर्थ बदल डाला,
 करुणा का दीप स्वयं ही बुझा डाला।
 ईद-उल-ज़ुहा का संदेश महान,
 था लोभ, अहंकार का बलिदान।
कहाँ लिखा है पावन क़ुरान में,
 निर्बल काँपे तेरे सम्मान में?
 ईश्वर तो बस नीयत देखे,
 किसके अंतर प्रेम सहेजे।
मौन खड़ा वह बछड़ा रोता,
 ममता का आँचल खोजता होता।
 “मुझे छोड़ दो हे मानव भाई,
 मैंने किसका अपराध कमाई?”
काँप रही थीं उसकी आँखें,
 टूट रही थीं जीवन शाखें।
 करुण पुकारें नभ तक जातीं,
 पत्थर आत्माएँ भी भरमातीं।
आदि मानव वनवासी था,
 अज्ञान, अभाव का वासी था।
 पर अब तो विज्ञान खड़ा है,
 हर थाली में अन्न बड़ा है।
फिर क्यों मासूमों की गर्दन पर,
 धर्म टिका है तलवारों पर?
 क्या दया इतनी दुर्बल हो गई,
 मानवता ही घायल हो गई?
पशुओं से ही वन जीवित हैं,
 धरती के श्वास सुरक्षित हैं।
 इनकी कमी से सूखेंगे वन,
 रोएँगे नद, पर्वत, उपवन।
बलिदान वही जो स्वार्थ जलाए,
 मन का पशु मानव से हटाए।
 जो आँसू पोछे, प्राण बचाए,
 वही खुदा के निकट कहलाए।
आओ ऐसी पूजा करें,
 जहाँ किसी की चीख न भरें।
 मंदिर, मस्जिद, गिरिजा, धाम—
 सबसे ऊँचा हो “जीवों का प्राण”॥

डॉ। वै। कस्तूरी बाई 
बेंगलूरु 
कर्नाटक 
Dr. Pro. Y. Kasturi Bai 
Bengaluru 
Karnataka
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त्याग - कमल धमीजा

त्याग -  कमल धमीजा

दिल किसी का कभी, न दुखाया करो। 
 हो सके तो मरहम तुम, लगाया करो। 
 त्याग जरूरी है, इंसानियत के लिए-
छोड़ो शिकवे -गिले मुस्कुराया करो।

तृप्ति त्याग में है छुपी, प्राप्ति बढ़ाती प्यास।
तृप्ति भोग में है नही , करता भोग उदास।
पाने की इच्छा सुखद , दुर्लभ की हो चाह-
मिल जाने पर मूल्य कम, घटे हास परिहास।

मेरा वादा है, जल्दी से लौट आऊॅंगा। 
अपने वादे पर, कभी न खोट खाऊॅंगा। 
त्याग करता हूँ करता रहूॅंगा सारी उमर-
"कमल" दावा है मेरा, कभी न चोट खाऊॅंगा।

स्वरचित मौलिक अधिकार रचना
कमल धमीजा
फरीदाबाद- हरियाणा
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सच्ची आहुति - डॉ अनुपमा वर्मा 'हेमा '

सच्ची आहुति - डॉ अनुपमा वर्मा 'हेमा '

आहुति या करुणा
किसे चढ़ाओगे वेदी पर,
जब हर प्राणी में प्राण बसे हैं,
जिस धरती ने जीवन बाँटा,
उसके भी कुछ अरमान बसे हैं।
मंदिर, मस्जिद, गिरजा, गुरुद्वारे,
सब प्रेम का पाठ पढ़ाते हैं,
फिर क्यों निर्दोष जीवों के
अश्रु चुपचाप बह जाते हैं?
कहते हो यह आस्था है,
यह पूजा, यज्ञ, बलिदान है,
पर क्या सच में ईश्वर को
किसी जीव की ही जान है?
त्याग अगर करना ही है तो
अहंकार की बलि दे डालो,
मन के भीतर बैठे क्रोध को
करुणा की अग्नि में जला डालो।
सच्ची आहुति वही बनेगी
जो मानवता को जीवित रखे,
जिससे किसी निरीह हृदय में
पीड़ा का काँटा ना चुभे।
ईद हो या कोई हवन,
संदेश सभी का एक रहे —
प्रेम, दया और त्याग से ही
मानव का अस्तित्व बचे।
चलो आज यह प्रण कर लें,
हर जीवन का मान करेंगे,
धरती के हर छोटे जीव को
अपने जैसा प्राण कहेंगे।
बलिदान वही सबसे ऊँचा
जो स्वार्थ का अंत करा दे,
और करुणा की एक किरण
हर दिल में उजियारा दे।

डॉ अनुपमा वर्मा 'हेमा '
 पंजाब
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ना भुख लगे - हेमलता ओझा

ना भुख लगे - हेमलता ओझा 

ना भुख लगे ना प्यास लगे
ना नींद ही आये आंखों में
 जब तुम चैन से सोते हो
 हम आंस लगाये बैठे हैं
कोइ छु सके ना सरहद को
अपने नापाक इरादों से
हम गोली भरकर बैठे हैं
हम सीनाताने बैठे है
जब तुम
 ना आधीका ग़म हमको है
तुफां भी ना हिला सकता है
ये फौलादी इरादे हैं
जो बर्फ पर भी सो सकता है
तुम दिये जलाते हो रातों को
हम सरहद पर जुगनू बन जाते हैं
 गुलशन हो मांका आंचल
 हम रातों को भी जग जाते हैं
 नही पता हमको है
ये जीवन कितने दिन का है
नही पता हम सबको है
 कब आये कहां से गोली
 हम मौत लपेटे बैठे है
 हर पल हर क्षण तत्पर रहते
 मां की रखवाली को
रहे सलामत हिंद मेरा
लहराता रहे तिरंगा मेरा
 नमनभारत देश को है
बस आरज़ू एक हम सबकी है
जब जब भी जन्म मिले
बस प्रहरी मां का बन जाये
हर जनम कुर्बान करके जीवन धन्य बना जाये
कैसे कोइ कर पाता है
त्याग हंसते हंसते
जीवन देकर भी 
दे जाते हैं आंसू हम सबको
धन्य लाल तु धन्य है
है सलाम देश करता है
 तू तो फौजी हो 
बस तु ही ये कर सकता है
सलाम वन मैन आर्मी को जयहिंद

हेमलता ओझा
उत्तर प्रदेश 
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Wednesday, 27 May 2026

त्याग - डॉ० उषा पाण्डेय 'शुभांगी'

त्याग - डॉ० उषा पाण्डेय 'शुभांगी'

नास्ति विद्या समं चक्षु:, नास्ति सत्य समं तप:।
नास्ति राग समं दु:खं, नास्ति त्याग समं सुखं।
विद्या समान आँख नहीं, सत्य सामान तप‌ नहीं। 
राग समान दुख नहीं, त्याग समान सुख नहीं। 
यह श्लोक हमें त्याग का महत्व समझाता है।
त्याग जीवन में कितना जरूरी है, यह हमें बताता है।
त्याग मन का भाव है, 
त्याग समर्पण है, त्याग है एक कर्म। 
त्याग करना चाहिए, कहता अपना धर्म। 
त्याग की कहानियों से, इतिहास भरा पड़ा है। 
जिसने जीवन में त्याग किया, वही आगे बढ़ा है। 
हर युग ने हमें, त्याग करना सिखलाया।
त्याग से मन निर्मल रहता, यही हमको बतलाया।
अपने अंदर की बुराइयों का, पहले त्याग करो।
गलत काम कभी मत करना,
ईश्वर से डरो।
क्रोध और अहंकार का, नर तुम त्याग करो।
ईमानदारी, सहनशीलता,  
खुद के अंदर भरो।
निर्मल मन से, राम नाम भजो।
माया रोकती त्याग को, पहले इसे तजो।
त्रेता युग में प्रभु राम जी, चौदह वर्ष वन में बिताये।
राज-पाट का त्याग किये,
मर्यादा पुरुषोत्तम कहलाए। 
कौरवों ने पांडवों को, पांच गाँव नहीं दिया।
परिणाम दुनिया जानती, महाभारत हुआ।
त्याग से आनंद मिलता, मन को होता संतोष।
सद्मार्ग पर चलना मानव, 
करना कभी न रोष।
सुखी जीवन जीने के लिए, त्याग करना है पड़ता। 
दुनिया उसको मानती, 
जो औरों के दुख में साथ खड़ा रहता।
महात्मा गांधी ने, 'कैसर ए हिंद' की उपाधि त्याग दिया।
रविंद्र नाथ ठाकुर जी ने, 
नाइटहुड उपाधि का, नहीं मोह किया।
सूखा पत्ता झड़ता, तभी तो नया पत्ता है आता। 
लालच दुख का कारण है, 
मानव समझ नहीं पाता।
उसके मन को शांति मिलती, 
जो त्याग कर पाता। 
जैसा मनुष्य कर्म करता, वैसा ही फल पाता।
'काक चेष्टा, बको ध्यानं, स्वान निद्रा तथैव च।
अल्पाहारी गृह त्यागी, विद्यार्थी पंच लक्षणम्।।'
कहां गया है विद्यार्थी को, घर का त्याग करना चाहिये।
छात्रों‌ के मेहनत कर, आगे बढ़ना चाहिए।
बहुत कुछ हमें मिला है, थोड़ा सा बस त्याग करें।
औरों के चेहरे पर मुस्कान लाये़ं,
उनकी जिंदगी खुशियों से भरें।

डॉ० उषा पाण्डेय 'शुभांगी'
स्वरचित
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