Sunday, 19 July 2026

समझौता - संगीता अहलावत

समझौता - संगीता अहलावत

जब व्यक्तियों के विचारों में भिन्नता होती है फिर संबंधों को निभाया जाता है तो उस व्यवहार को समझौता कहा जाता है l 
प्रत्येक व्यक्ति अपने में भिन्न होता है l उसकी पसंद, जरूरत, उसकी चाहत सब एक दूसरे से अलग होता है l परिवार हो चाहे या घर के बाहर का समाज, हर जगह जब आप एक ध्येय से चलते हैं तो कई बातों में भिन्नता होने पर भी एक राय या एक फैंसले पर आना पड़ता है l 
परिवार में अगर पाँच सदस्य हैं तो भी सभी पसंद उनकी खुशी, उनकी सोच सब अलग होता है लेकिन सभी लोग मिलजुलकर रहते हैं l ऐसे ही जब आप नौकरी करते हैं या व्यवसाय करते है आपको हर जगह दो बातें सुननी पड़ती है और उनकी बात चाहे अनचाहे  माननी पड़ जाती है l समझौते को केवल झुकना नहीं माना जा सकता है, बल्कि धैर्य, समझदारी से कुछ बातों को मानना और एक साथ मिलकर काम को भी कहा जा सकता है l कभी - कभी समझौता थोड़ा सा किसी के न्यायपूर्ण हो सकता है और किसी के लिए अन्यायपूर्ण भी हो सकता है और किसी के लिए अन्यायपूर्ण भी हो सकता है l समझौता तभी अच्छा होता है जब किसी को इसका नकारात्मक पहलू झेलना न पड़े l ये भी कहा जा सकता है कि समझौता जीवन का अनुपम पहलू है जिसकी वजह से कई समस्याओं का समाधान भी होता है l जैसे अगर कोई व्यक्ति आक्रामक प्रवृत्ति का होने के कारण जिद्दी भी हो और वह अनैतिक माँग या अनैतिक कार्यों में लग जाए तो समाज में अशांति और कुकृत्य भी हो सकता है l 
एक दूसरे का सहयोग करना भी समझौते की कड़ी है l घर हो या कार्यस्थल, शिक्षा क्षेत्र, स्वास्थ महकमा या सुरक्षा से संबंधित विभाग, कहीं पर भी बिना समझौते या सहयोग के काम सफल नहीं हो सकता है l कंपनी हो या व्यवसाय, राजनीति, सामाजिक कार्य बिना टीमवर्क कार्य सरलता से हो जाए ऐसी संभावना भी नहीं की जा सकती है l 
समझौते के देखे जाएं तो बहुत सारे 4फायदे भी हैं जैसे इसके कारण गलतफहमियां दूर होती हैं l संवाद से समाधान होता है l तनाव दूर होता है और इस वजह से सभी मिलजुल कर कार्य करते है, लेकिन यहाँ पर ये भी मानना होगा कि अगर समझौते में अपमान, अन्याय, झूठ और नैतिक मूल्यों का पतन हो तो ऐसे समझौतों को स्वीकार नहीं करना चाहिए l 
अंत में समझौता वही अच्छा होता है जिसमें सम्मान कायम रहता है, अन्याय नहीं होता है l जिसमें एक दूसरे के हित का ध्यान रखा जाता है और जिस समझौते से जीवन खुशहाल होता है l 
समझौते की सफलता का श्रेय छोटे- छोटे मतभेदों को दूर कर खुशियों को बटोर कर जीने में है l

          - संगीता अहलावत
उत्तर प्रदेश 

माँगें - डॉ० उषा पाण्डेय 'शुभांगी' स्वरचित

 

माँगें - डॉ० उषा पाण्डेय 'शुभांगी' स्वरचित 

'हमारी माँगे पूरी हो, 
चाहे जो मजबूरी हो।'
यह पंक्ति हमें अक्सर सुनने को मिलती है।
कुछ माँगे सही होतीं, कुछ गलत भी हो सकती हैं।
किसी से कुछ तभी मांगो, 
जब मांगना हो अनिवार्य।
माँगे बिना जब काम न चले, स्थितियां हो अपरिहार्य।
'रहिमन वे नर मर चुके, जो कछु मांँगन जाहि।
उनते पहिले वे मुए, जिन मुख निकसत नाहि।।'
रहीम जी के कथन।
जरूरतमंद की सहायता करना, लगाना अपना तन,मन,धन।
'हमारी माँगें पूरी हो,'
समाज की भलाई के लिए यह नारा लगाना। 
गलत मांग के लिए जिद न करना, वरना पड़ेगा पछताना।
मांगना और देना, एक दूसरे के पूरक हैं।
कुछ मांगना, मानव की आवश्यकता का सूचक है।
'बिन माँगे मोती मिले, माँगे मिले न‌ भीख।'
कबीर दास जी की यह पंक्ति, देती हमको सीख।
कहते हैं,
'भगवान जब देते हैं, 
देतेँ छप्पर फाड़।'
बिन मांगे प्रभु समझ जाते,
करते जो वे अपने भक्तों से लाड़।
दहेज लोलुप दहेज माँगते,
देतें अपनी बहुओं को कष्ट।
मानवता के दुश्मन होते ये, 
बुद्धि इनकी होती भ्रष्ट। 
कोई भूखा दिखे जब, 
बिन माँगे उसको भोजन देना।
पेट जब उसका भरेगा, उसकी
दुआएँ लेना।
घर से बाहर निकलो, माँगने वाले दिखेंगे।
माँगने वाले हर मोड़ पर, खड़े मिलेंगे। 
कुछ लोगों की मांँगने की, आदत बन जाती है।
बिना माँगे इन्हें, चैन की नींद नहीं आती है। 
'देनहार कोई और है, भेंजत जो दिन रैन।
लोग भरम हम पर करैं, तासो नीचे नैन।'
उपरोक्त पंक्तियाँ हमने पढ़ा है। 
मांगना छोड़ जो अर्जित किया, वही इतिहास गढ़ा है।
उपर वाले से,
सब की भलाई मांँगना। 
जहां तक हो सके, 
माँगने की आदत से बचना।
माँगना यदि पड़े, शालीनता  से माँगना चाहिए।
दाता याचक का संबंध मधुर होना चाहिए।
मांगने के साथ-साथ देना भी पड़ता है। 
जीतता वही है, जो अंत तक लड़ता है।
औरों से मांगना क्यों, खुद सुयोग्य बनना होगा।
जो देंगे वही पायेंगे, 
हमें समझना होगा।
मांगने से बचो, देने की आदत डालो, 
अगली पीढ़ी को समझाना होगा।
समाज में बदलाव, 
हमें ही तो लाना होगा।


डॉ० उषा पाण्डेय 'शुभांगी' 
स्वरचित
West Bengal 

धरना प्रदर्शन - महाकवि डा अनन्तराम चौबे अनन्त जबलपुर

 

अंतरराष्ट्रीय हिन्दी साहित्य मंच हमारीवाणी 
साप्ताहिक प्रतियोगिता हेतु 
विषय... धरना प्रदर्शन - महाकवि डा अनन्तराम चौबे अनन्त जबलपुर 

कविता... धरना प्रदर्शन 

धरना प्रदर्शन आन्दोलन 
करना मौलिक अधिकार है ।
मौलिक अधिकार का दुरुपयोग 
करना कैसे मौलिक अधिकार है 

आन्दोलन हड़ताल करके
तोड़ फोड़ नुकसान करते हैं ।
सरकारी और आमजनता की 
सम्पत्ति की तोड़फोड़ करते हैं

धरना प्रदर्शन आन्दोलन रैली 
हड़ताल करके गलत करते है।
देश में ऐसे कई उदाहरण है
जाति धर्म को बदनाम करते हैं ।

सारा सच आन्दोलन करके
बसों ट्रकों में आग लगाते हैं ।
सम्पत्ति को तोड़फोड़ कर
राजनीति अपनी करते हैं ।

अपने स्वार्थ को सिद्ध करने में
आम जनता को परेशान करते हैं।
कुछ स्वार्थी लोग अपने स्वार्थ से
बूढ़े बच्चे महिलाओं को धोखा देते हैं।

आम जनता की परेशानी 
इनको समझ में नही आती हैं ।
किसी मरीज की बीमारी भी 
इनको समझ में नही आती है ।

मजबूरी का फायदा उठाकर
गंदी राजनीति का खेल करते हैं ।
जाति धर्म  को बीच में लाकर
कानून से भी खिलवाड़ करते हैं ।

आवागमन बंद कर देते हैं
शासन को बदनाम करते हैं ।
आन्दोलन का नाम  रहता है
तोड़फोड़ कर उल्लू सीधा करते हैं ।

आन्दोलन धरना प्रर्दशन रैली
हड़ताल से तोड़फोड़ करते हैं ।
बसों ट्रकों में आग लगाकर
सम्पत्ति का नुक़सान करते हैं ।

संविधान से मिले अधिकारों का
आन्दोलन करके प्रदर्शन करते है ।
सारा सच है आन्दोलन कर कानून,
की मजबूरी का फायदा उठाते हैं ।

कानून व्यवस्था न्याय को ठेंगा,
ये आन्दोलन कारी दिखाते हैं ।
बड़ी अदालतें संज्ञान न लेकर
अपनी आंख बंद किए रहते हैं ।

सारा सच यही है धरना प्रदर्शन
आन्दोलन रैली हड़ताल झूठे हैं ।
कानूनी कड़े कदम उठाए तब फिर
जाति धर्म  पर पक्षपात बताते हैं ।

विरोधी दल के कुछ नेताओं का
आन्दोलन रैली में साथ होता है ।
सत्ता पक्ष को बदनाम करने में
विरोधियों का मकसद हल होता है।

  महाकवि डा अनन्तराम चौबे अनन्त
    जबलपुर म प्र/

अर्थ व्यवस्था - संजय जैन "बीना"

अर्थ व्यवस्था - संजय जैन "बीना" 

माली हालत तुम देखो तो
कैसे सबकी बुरी हो गई। 
कर्जा के बोझ तले देखो
कैसे लोग अब फस गये।। 

आये के साधन सीमित है
इसलिए तो बेरोजगारी है। 
शिक्षा का स्तर तो ऊँचा है
पर उनको रोजगार नही।। 

मंहगाई की मार से देखो
सब की हालत पतली है। 
रुपये का अवमूल्यन है
इसलिए मंहगाई चुभ रही।। 

कामगारों को काम नहीं है
क्योंकि लघु उधोग बंद पड़े। 
अर्थ व्यवस्था जो चलाते थे
वो छोटे-छोटे धन्धे बंद हुए।। 

मध्यमवर्गी लोग ही देखो
बाजारों को चलाते है। 
इनके पैसों से ही देखो
बाजारों में रोनक रहती है।। 

एक सेठ दस लोगों को
जो रोजगार देता था। 
बड़े-बड़े माल खुल जाने से
सेठों का व्यपार बंद हुआ।। 

जय जिनेंद्र
संजय जैन "बीना" मुंबई 

प्रदर्शन : अभिव्यक्ति का सशक्त माध्यम - उजमा

 

प्रदर्शन : अभिव्यक्ति का सशक्त माध्यम - उजमा 

लोकतांत्रिक व्यवस्था में प्रदर्शन नागरिकों के अधिकारों और विचारों की अभिव्यक्ति का एक महत्वपूर्ण माध्यम है। जब किसी व्यक्ति, समूह या समाज की समस्याओं, मांगों अथवा असंतोष को उचित महत्व नहीं मिलता, तब लोग शांतिपूर्ण ढंग से प्रदर्शन का सहारा लेते हैं। प्रदर्शन केवल विरोध का प्रतीक नहीं है, बल्कि यह समाज और शासन के बीच संवाद स्थापित करने का एक प्रभावी माध्यम भी है।

भारत जैसे लोकतांत्रिक देश में प्रत्येक नागरिक को संविधान द्वारा शांतिपूर्ण ढंग से अपनी बात रखने का अधिकार प्राप्त है। प्रदर्शन इसी अधिकार का एक स्वरूप है। इतिहास इस बात का साक्षी है कि अनेक सामाजिक और राजनीतिक परिवर्तन शांतिपूर्ण आंदोलनों एवं प्रदर्शनों के माध्यम से ही संभव हुए हैं। स्वतंत्रता संग्राम से लेकर वर्तमान समय तक अनेक जनआंदोलनों ने समाज में सकारात्मक परिवर्तन लाने का कार्य किया है।

हालाँकि प्रदर्शन तभी सार्थक माना जाता है जब वह अनुशासित, शांतिपूर्ण और जनहित को ध्यान में रखकर किया जाए। यदि प्रदर्शन हिंसक हो जाए, सार्वजनिक संपत्ति को नुकसान पहुँचाए या आम नागरिकों के जीवन को बाधित करे, तो उसका उद्देश्य कमजोर पड़ जाता है। ऐसे प्रदर्शनों से समाज में भय, अव्यवस्था और आर्थिक हानि उत्पन्न होती है। इसलिए प्रदर्शन करते समय नैतिकता, कानून और सामाजिक उत्तरदायित्व का पालन करना आवश्यक है।

वर्तमान डिजिटल युग में प्रदर्शन का स्वरूप भी बदल गया है। अब लोग सोशल मीडिया अभियानों, ऑनलाइन याचिकाओं और डिजिटल हस्ताक्षर अभियानों के माध्यम से भी अपनी आवाज़ बुलंद कर रहे हैं। इससे लोगों की भागीदारी बढ़ी है और अनेक मुद्दों को राष्ट्रीय तथा अंतरराष्ट्रीय स्तर पर पहचान मिली है। किंतु डिजिटल माध्यमों का उपयोग करते समय सत्य, संयम और जिम्मेदारी का पालन करना भी उतना ही आवश्यक है, ताकि अफवाहों और भ्रामक सूचनाओं से बचा जा सके।

अंततः कहा जा सकता है कि प्रदर्शन लोकतंत्र की जीवंतता का प्रतीक है। यह केवल विरोध का माध्यम नहीं, बल्कि समाज में जागरूकता, उत्तरदायित्व और परिवर्तन का प्रेरक भी है। यदि प्रदर्शन शांतिपूर्ण, रचनात्मक और जनकल्याण की भावना से किया जाए, तो वह लोकतंत्र को मजबूत बनाता है तथा शासन और जनता के बीच विश्वास को बढ़ाता है। इसलिए प्रत्येक नागरिक का दायित्व है कि वह अपने अधिकारों के साथ-साथ अपने कर्तव्यों का भी सम्मान करे और प्रदर्शन को सकारात्मक परिवर्तन का माध्यम बनाए।

Uzma Taranum