Monday, 26 October 2026

विजयादशमी — बुराई पर अच्छाई की विजय

विजयादशमी — बुराई पर अच्छाई की विजय 

जब-जब धरती पर पाप बढ़ा,
जब-जब सत्य का दीप बुझा,
तब-तब धर्म ने राह दिखाई,
श्रीराम ने मर्यादा सिखलाई।

विजयादशमी का पावन त्योहार,
लाता है खुशियों की बहार,
रावण के दस सिर जलते हैं,
पर प्रश्न हृदय में पलते हैं।

क्या केवल पुतला जलाने से,
मुक्ति मिलेगी बुरे विचारों से?
जब मन में अहंकार समाया है,
तो किस रावण को जलाया है?

रावण तो हर मन में रहता है,
क्रोध, लोभ बनकर वह बहता है,
ईर्ष्या, छल और अभिमान मिटाएँ,
मन में प्रेम का दीप जलाएँ।

सीता के सम्मान की रक्षा हो,
हर नारी को सुरक्षित पथ मिले,
सत्य, दया और धर्म के आगे,
अन्याय का हर बंधन खुले।

राम केवल एक नाम नहीं हैं,
वे आदर्शों का पैगाम हैं,
सत्य, त्याग, करुणा, मर्यादा,
उनके जीवन के अनुपम धाम हैं।

विजय तभी सच्ची कहलाएगी,
जब मानवता मुस्कुराएगी,
जब निर्धन को अधिकार मिलेगा,
हर बेटी को सम्मान मिलेगा।

नफरत की दीवारें तोड़ें,
प्रेम के रिश्ते सबसे जोड़ें,
जाति-धर्म के भेद मिटाकर,
मानवता से नाता जोड़ें।

आओ, इस दशहरे प्रण लें हम,
सदाचार के पथ पर चलें हम,
अपने भीतर के रावण को,
सच्चाई की शक्ति से हरें हम।

न झूठ का साथ निभाएँगे,
न अन्याय के आगे झुक पाएँगे,
सत्य और न्याय की राहों पर,
नवभारत का दीप जलाएँगे।

जब मन से अहंकार मिटेगा,
जब हर हृदय प्रेम से खिलेगा,
तभी रामराज्य आएगा,
हर घर सुख-शांति पाएगा।

आओ, ऐसा पर्व मनाएँ,
मन के विकारों को दूर भगाएँ,
केवल पुतले नहीं, बुराइयाँ जलाएँ,
सच्चे अर्थों में विजयादशमी मनाएँ।

बुराई पर अच्छाई की विजय का,
यही संदेश अमर हो जाए,
हर हृदय में राम विराजें,
हर जीवन मंगलमय हो जाए।

🏹 जय श्रीराम! जय विजयादशमी! 🏹

डॉ अनुपमा वर्मा "हेमा "
Punjab 

रामायण ऐसी ना होती - ज़रिया डॉ. मंजु चावला

रामायण ऐसी ना होती - ज़रिया डॉ. मंजु चावला

युगों तक कहानी सुनाई ना जाती
रघुकुल रीत जो निभाई ना होती
सौतेली मां कैकई और पिता दशरथ की 
शर्त बेटे राम ने पुराई ना होती
मंथरा को बस ज़रिया माना ना होता
कर्म फल स्वीकार्य जताई ना होती 
सौतेले भाई भरत को राजगद्दी देने पर
खुशी भरी हामी दिखाई ना होती
चौदह साल जंगलों में पत्नी सीता ने भी
अपनी जवानी रुलाई ना होती
सौतेले भाई लक्ष्मण ने मां पत्नी छोड़कर
अपनी हर इच्छा दबाई ना होती
भरत ने सादा जीवन जी राजगद्दी पर
राम की चरणपादुका बिठाई ना होती
सौतेले भाई शत्रुघ्न ने प्रतिनिधि बनकर
बिना छल राजनीति चलाई ना होती
कौशल्या सुमित्रा कैकई ने साथ रहकर
माफ करने की रीत चलाई ना होती
राजा जनक ने अपनी बेटियों को
पत्नीधर्म की शिक्षा दिलाई ना होती
निषाद ,शबरी, वानर सेना , विभीषण
के कुल की अनदेखी कराई ना होती
एक पत्नी व्रत निभाया ना होता
श्रुपणखा की जिद्द ठुकराई ना होती 
सबने अपनी जान, दांव पर लगाकर
सीता की इज़्ज़त बचाई ना होती 
हर एक किरदार में रिश्तों की खातिर
भ्रम होता, विश्वास और सच्चाई ना होती
सब स्वार्थी होकर जो बस अपनी सोचते
कुछ और ही होता रामायण ऐसी ना होती 
ये गाथा भी महाभारत जैसी होती
रामायण का अर्थ प्रेम व अच्छाई ना होती
हर युग में हर घर में सुख शांति वास करती
सबने रघुकुल प्रथा चलाई जो होती
हर लड़का राम और हर लड़की सीता होती
हर घर में रामायण जीनी सिखाई जो होती
अपने जीवन में शांति चाहिए तो
रामायण जीनी सीखनी सिखानी ही होगी

                         ज़रिया डॉ. मंजु चावला
Chandigarh 

रावण - यशपाल निर्मल

रावण - यशपाल निर्मल 

समय की काली दीवार पर किसने टाँग दिया है 
दस चेहरों वाला एक सूरज, 
जिसकी हर किरण से अँधेरा और गहरा होता है!

लंका 
अब समुद्र के उस पार नहीं, 
हमारी आँखों के भीतर उगती है। 
सोने की ईंटों के नीचे कराहती हैं 
असंख्य इच्छाएँ, 
और सिंहासन के पायों से बंधी हैं 
कितनी ही मौन जिह्वाएँ।

रावण! 
तुम्हारी नाभि में अमृत था, हमारी नाभियों में 
भूख का जलता हुआ कुआँ है। 
तुम्हारे दस सिर थे, 
हमने एक ही सिर में 
सौ मुखौटे उगा लिए हैं।

एक मुख पर वेदों की ऋचाएँ, 
दूसरे पर न्याय का उजला चंदन, 
तीसरे पर धर्म की ध्वजा, चौथे पर जनसेवा की मुस्कान— 
भीतर मगर लोभ का काला नाग 
कुंडली मारकर बैठा है।

अशोक-वाटिका 
आज भी हरी है, 
पर उसकी डालियों पर सीताएँ नहीं, 
टँगे हुए हैं असंख्य प्रश्न। हवा उनके आँचल छूकर लौट जाती है चुपचाप,  और पहरेदारों की आँखों में सोया रहता है राजधर्म।

राम का धनुष 
किसी संग्रहालय की दीवार पर ।
धूल ओढ़े पड़ा है। 
प्रत्यंचा की जगह समझौतों का महीन धागा है, 
और तीरों की नोक पर सत्ता की मुहर लगी है।

हर वर्ष मैदान में 
एक काग़ज़ी रावण जलता है, 
लपटें उठती हैं, 
बच्चे तालियाँ बजाते हैं, राख हवा में उड़ती है— मगर उसी राख से 
अगली सुबह 
एक नया मुकुट उग आता है।

रावण! 
तुम्हारी मृत्यु का रहस्य किसी बाण में नहीं छिपा,  वह उस क्षण में सोया है  जब मनुष्य 
अपने भीतर के अँधेरे को  अँधेरा कहने का साहस करेगा।

तब कोई अग्नि 
पुतले को नहीं, 
अहंकार की जड़ों को छुएगी; 
तब विजयादशमी के आकाश में 
धुआँ नहीं, 
एक निर्मल सूर्योदय खिलेगा।

(जम्मू - कश्मीर)

Sunday, 25 October 2026

अहंकार का अंत - डा गंगा शरण पासी

अहंकार का अंत - डा गंगा शरण पासी 

महा ज्ञानी रावण था अहंकारी, वेदों का ज्ञाता होकर भी, किया पाप भारी, पर स्त्री का किया हरण, और बन बैठा महा अहंकारी, अपना ही विनाश कर बैठा, यमराज को दे डाली चुनौती, मंदोदरी को किया अपमान, माता सीता का हरण करके, पाप का घड़ा भर डाला, वरदान का किया गलत उपयोग, वेदों का ज्ञाता होकर भी, किया अधर्म काम, विजयदशमी यह सिख देती, कभी न बनना जीवन में अहंकारी, सत्य की राह पर चलते जाना, करना धर्म का काम भारी, मिट जाती है अहंकार में, सोने की लंका, बच जाती केवल राख, दशहरा हमें यही सिखाता, करो धर्म का काम हमेशा, नारी का न कभी करो अपमान।

डा गंगा शरण पासी 
कवयित्री लेखिका समाज-सुधारक रायपुर 
छत्तीसगढ़

सीता - डॉ० उषा पाण्डेय 'शुभांगी'

सीता - डॉ० उषा पाण्डेय 'शुभांगी'

पिता जनक जी की लाड़ली, मात सुनैना जी की दुलारी।
मिथिला की थीं राजकुमारी, थीं सीता जी बड़ी प्यारी। 
सूखा पड़ा था मिथिला में, जनक जी ने हल चलाया।
हल चलाते खेत में, एक सुंदर कन्या पाया।
पति-पत्नी ने बच्ची को अपनाया, नाम दिया सीता।
अपने गुणों से बालिका सीता ने, सबका दिल जीता।
जनक जी ने सीता स्वयंवर रचाया, मुनि विश्वामित्र संग राघव जी देखने आएं।
प्रत्यंचा चढ़ाई, शिव धनुष टूटा, जानकी
जी संग रघुवर व्याह रचाएं।
अयोध्या की बहू सीता जी बनी, थीं सबके नैनों की तारा।
बहू का कर्तव्य निभाने को, उन्होंने अपना तन मन वारा।
पिता की आजा से, दशरथ नंदन चले वन को, वैदेही भी साथ चलीं।
संयासिनी का रूप धरीं, जनक की लली।
विनम्रता भरा था उनमें, नारी की मर्यादा जानती थीं।
अपने कर्तव्य का पालन करती थीं, बड़ों का आज्ञा मानती थीं।
धर्म परायण थीं, पतिव्रता धर्म निभाया‌।
कभी नहीं घबराई,
सच का साथ सदा निभाया।
पति को आने में देरी होते देख, दशरथ जी का पिंडदान किया।
कठिन परिस्थितियों में डिगी नहीं, धीरज से सामना किया।
पति ने त्याग दिया, वाल्मीकि आश्रम में शरण लिया।
माता का फर्ज निभाया, लव-कुश को अच्छा संस्कार दिया।
धैर्य, त्याग की 
प्रतिमूर्ति, सहनशीलता की मूरत।
माता सीता के गुणों का अपनाने की, आज हर नारी को है जरूरत।
धरती से उत्पन्न हुईं, धरती में ही समा गईं।
नारी का कर्तव्य क्या हो, नारियों को बता गईं।
माता सीता का चरित्र, हमें मुश्किलों से लड़ना सीखाता है।
अहंकार न करो, गरिमा बनाए रखो, 
यह बतलाता है।

डॉ० उषा पाण्डेय 'शुभांगी'
वैस्ट बंगाल