Monday, 26 October 2026

रावण - यशपाल निर्मल

रावण - यशपाल निर्मल 

समय की काली दीवार पर किसने टाँग दिया है 
दस चेहरों वाला एक सूरज, 
जिसकी हर किरण से अँधेरा और गहरा होता है!

लंका 
अब समुद्र के उस पार नहीं, 
हमारी आँखों के भीतर उगती है। 
सोने की ईंटों के नीचे कराहती हैं 
असंख्य इच्छाएँ, 
और सिंहासन के पायों से बंधी हैं 
कितनी ही मौन जिह्वाएँ।

रावण! 
तुम्हारी नाभि में अमृत था, हमारी नाभियों में 
भूख का जलता हुआ कुआँ है। 
तुम्हारे दस सिर थे, 
हमने एक ही सिर में 
सौ मुखौटे उगा लिए हैं।

एक मुख पर वेदों की ऋचाएँ, 
दूसरे पर न्याय का उजला चंदन, 
तीसरे पर धर्म की ध्वजा, चौथे पर जनसेवा की मुस्कान— 
भीतर मगर लोभ का काला नाग 
कुंडली मारकर बैठा है।

अशोक-वाटिका 
आज भी हरी है, 
पर उसकी डालियों पर सीताएँ नहीं, 
टँगे हुए हैं असंख्य प्रश्न। हवा उनके आँचल छूकर लौट जाती है चुपचाप,  और पहरेदारों की आँखों में सोया रहता है राजधर्म।

राम का धनुष 
किसी संग्रहालय की दीवार पर ।
धूल ओढ़े पड़ा है। 
प्रत्यंचा की जगह समझौतों का महीन धागा है, 
और तीरों की नोक पर सत्ता की मुहर लगी है।

हर वर्ष मैदान में 
एक काग़ज़ी रावण जलता है, 
लपटें उठती हैं, 
बच्चे तालियाँ बजाते हैं, राख हवा में उड़ती है— मगर उसी राख से 
अगली सुबह 
एक नया मुकुट उग आता है।

रावण! 
तुम्हारी मृत्यु का रहस्य किसी बाण में नहीं छिपा,  वह उस क्षण में सोया है  जब मनुष्य 
अपने भीतर के अँधेरे को  अँधेरा कहने का साहस करेगा।

तब कोई अग्नि 
पुतले को नहीं, 
अहंकार की जड़ों को छुएगी; 
तब विजयादशमी के आकाश में 
धुआँ नहीं, 
एक निर्मल सूर्योदय खिलेगा।

(जम्मू - कश्मीर)

Sunday, 25 October 2026

अहंकार का अंत - डा गंगा शरण पासी

अहंकार का अंत - डा गंगा शरण पासी 

महा ज्ञानी रावण था अहंकारी, वेदों का ज्ञाता होकर भी, किया पाप भारी, पर स्त्री का किया हरण, और बन बैठा महा अहंकारी, अपना ही विनाश कर बैठा, यमराज को दे डाली चुनौती, मंदोदरी को किया अपमान, माता सीता का हरण करके, पाप का घड़ा भर डाला, वरदान का किया गलत उपयोग, वेदों का ज्ञाता होकर भी, किया अधर्म काम, विजयदशमी यह सिख देती, कभी न बनना जीवन में अहंकारी, सत्य की राह पर चलते जाना, करना धर्म का काम भारी, मिट जाती है अहंकार में, सोने की लंका, बच जाती केवल राख, दशहरा हमें यही सिखाता, करो धर्म का काम हमेशा, नारी का न कभी करो अपमान।

डा गंगा शरण पासी 
कवयित्री लेखिका समाज-सुधारक रायपुर 
छत्तीसगढ़

सीता - डॉ० उषा पाण्डेय 'शुभांगी'

सीता - डॉ० उषा पाण्डेय 'शुभांगी'

पिता जनक जी की लाड़ली, मात सुनैना जी की दुलारी।
मिथिला की थीं राजकुमारी, थीं सीता जी बड़ी प्यारी। 
सूखा पड़ा था मिथिला में, जनक जी ने हल चलाया।
हल चलाते खेत में, एक सुंदर कन्या पाया।
पति-पत्नी ने बच्ची को अपनाया, नाम दिया सीता।
अपने गुणों से बालिका सीता ने, सबका दिल जीता।
जनक जी ने सीता स्वयंवर रचाया, मुनि विश्वामित्र संग राघव जी देखने आएं।
प्रत्यंचा चढ़ाई, शिव धनुष टूटा, जानकी
जी संग रघुवर व्याह रचाएं।
अयोध्या की बहू सीता जी बनी, थीं सबके नैनों की तारा।
बहू का कर्तव्य निभाने को, उन्होंने अपना तन मन वारा।
पिता की आजा से, दशरथ नंदन चले वन को, वैदेही भी साथ चलीं।
संयासिनी का रूप धरीं, जनक की लली।
विनम्रता भरा था उनमें, नारी की मर्यादा जानती थीं।
अपने कर्तव्य का पालन करती थीं, बड़ों का आज्ञा मानती थीं।
धर्म परायण थीं, पतिव्रता धर्म निभाया‌।
कभी नहीं घबराई,
सच का साथ सदा निभाया।
पति को आने में देरी होते देख, दशरथ जी का पिंडदान किया।
कठिन परिस्थितियों में डिगी नहीं, धीरज से सामना किया।
पति ने त्याग दिया, वाल्मीकि आश्रम में शरण लिया।
माता का फर्ज निभाया, लव-कुश को अच्छा संस्कार दिया।
धैर्य, त्याग की 
प्रतिमूर्ति, सहनशीलता की मूरत।
माता सीता के गुणों का अपनाने की, आज हर नारी को है जरूरत।
धरती से उत्पन्न हुईं, धरती में ही समा गईं।
नारी का कर्तव्य क्या हो, नारियों को बता गईं।
माता सीता का चरित्र, हमें मुश्किलों से लड़ना सीखाता है।
अहंकार न करो, गरिमा बनाए रखो, 
यह बतलाता है।

डॉ० उषा पाण्डेय 'शुभांगी'
वैस्ट बंगाल 

Tuesday, 20 October 2026

कानून - विरोध - महाकवि डा अनन्तराम चौबे अनन्त

अंतरराष्ट्रीय हिन्दी साहित्य मंच हमारीवाणी साप्ताहिक प्रतियोगिता हेतु 
कानून - विरोध . महाकवि डा अनन्तराम चौबे अनन्त जबलपुर 

कानून कागजों की
किताबों में लिखे हुए हैं ।
थानों कोर्ट कचहरी में 
इनसे न्याय मिलता है ।

देश की संसद में भी 
कानून बनते बदलते हैं 
कानून जनता को न्याय 
दिलाने को बनाये जाते हैं।

आरक्षण एस सी एस टी एक्ट 
यू जी सी कानून विरोध का पूरे देश में आन्दोलन हो रहा है ।
कानून का दुरूपयोग हो रहा है ।

झूठी एफ आई आर लिखाओ
सरकार से लाखों रुपया पाओ ।
बिना जांच गिरफ्तार कर लेते 
जमानत प्रवधान नहीं जेल भेजते।

सारा सच है कानून 
अंधा है लंगड़ा भी है।
वैशाली के सहारे चले
देख भी  नही सकता है ।

ये बात सिर्फ में नहीं
सभी जानते हैं ।
जो भुक्त भोगी है
वह तो जानते ही है ।

हर कोई कहता है ।
देश का कानून अंधा है ।
अंधा तो है ही बहरा भी 
कानून लंगड़ा भी है ।

न देख सकता है 
न सुन सकता है 
न कह सकता है 
न चल सकता है ।

वैसाखी के सहारे
धीरे धीरे से चलता है ।
न्याय मिले न मिले साक्ष्य 
गवाहों पर ही चलता है ।

फैसले में ही दस बीस
तीस साल भी लग जाते है ।
फैसले से जो संतुष्ट नहीं है ।
बडी अदालतों में अपील करते है ।

फैसला होने के वाद
भी न्याय नहीं मिलता है ।
सबूतों गवाहों वकीलों की
जिरह  पर फैसले होते हैं ।
 
सारा सच तारीख पर तारीख
अदालतों में मिलती रहती है  ।
कुछ सबूत मिट जाते है कुछ 
गवाहों की मृत्यु हो जाती है ।

कुछ गवाह खरीद 
भी लिये जाते है ।
कुछ धमकियों से
भी डर जाते है ।

कुछ गवाही देकर भी
बाद में पलट जाते है ।
कुछ गुनाहगार संदेह
की हालत में छूट जाते है ।

कुछ नाबालिग होने 
का फायदा उठाते है । 
कुछ वाद में जमानत 
पाकर छूट जाते है ।

न्याय की ऐसी लम्बी
लड़ाई से कुछ गुनाह गारों
की, न्याय पाने बालों की
मौत भी हो जाती है ।

सारा सच अंधे कानून 
की इस लड़ाई में वकील
पुलिस, बाबूओं को
पैसा देते देते ज़मीन
जाय जाद विक जाती है ।

कुछ लोग  कोर्ट और
वकीलों की महंगी फीस
से हिम्मत हार कर
केश ही नहीं लगाते है ।

या लगाकर भी फिर
वापिस ले लेते है ।
कानून के अंधेपन 
से ही डर जाते है ।

वकील दोनों पक्ष के होते 
पर जीत एक पक्ष की होती है  ।
कोई जीतता कोई हारता है
फीस वकीलों को मिलती है।

 महाकवि डा अनन्तराम चौबे अनन्त 
   जबलपुर म प्र 

लोकतंत्र - डॉ रूपाली दिलीप चौधरी

लोकतंत्र - डॉ  रूपाली दिलीप चौधरी 
 महाराष्ट्र 

लोकतंत्र केवल शासन करने की पद्धति नहीं, बल्कि स्वतंत्रता, समानता, न्याय और मानवीय गरिमा का सशक्त प्रतीक है। यह वह व्यवस्था है, जहाँ जनता ही सर्वोपरि होती है और जनता की आकांक्षाएँ ही राष्ट्र की दिशा निर्धारित करती हैं। लोकतंत्र का वास्तविक अर्थ है—जनता का शासन, जनता के द्वारा और जनता के लिए।
भारत विश्व का सबसे बड़ा लोकतांत्रिक राष्ट्र है। हमारा संविधान प्रत्येक नागरिक को समान अधिकार प्रदान करता है। यहाँ विविध भाषाओं, धर्मों, संस्कृतियों और परंपराओं के बीच एकता की भावना लोकतंत्र को अद्वितीय बनाती है। लोकतंत्र हमें केवल अधिकार ही नहीं देता, बल्कि अपने कर्तव्यों के प्रति सजग रहने की प्रेरणा भी देता है।
मित्रो! लोकतंत्र की सफलता केवल चुनावों तक सीमित नहीं है। इसकी वास्तविक शक्ति जागरूक नागरिकों, निष्पक्ष विचारों, ईमानदार नेतृत्व और संवैधानिक मूल्यों में निहित है। जब नागरिक बिना किसी भय, प्रलोभन अथवा भेदभाव के अपने मताधिकार का प्रयोग करते हैं, तब लोकतंत्र की नींव और अधिक मजबूत होती है।
आज आवश्यकता है कि हम लोकतंत्र को केवल एक व्यवस्था न मानें, बल्कि उसे अपने जीवन-मूल्यों का अभिन्न अंग बनाएँ। अन्याय के विरुद्ध आवाज उठाएँ, विविधताओं का सम्मान करें और राष्ट्रहित को सर्वोपरि रखें।
आइए, हम संकल्प लें कि अपने अधिकारों के प्रति जागरूक रहते हुए अपने कर्तव्यों का ईमानदारी से निर्वहन करेंगे , क्योंकि लोकतंत्र की असली ताकत सत्ता में नहीं, बल्कि जागरूक जनता के विश्वास, विवेक और सहभागिता में निहित होती है!
जय हिंद! जय भारत!