जीवन - डॉ० उषा पाण्डेय 'शुभांगी'
चौरासी लाख योनि में, मानव जीवन हमको मिला।
कभी अपने जीवन से हम खुश रहते, कभी होती हमें अपने जीवन से गिला।
जीवन की राह केवल फूलों से सजी नहीं होती, काँटें भी सामने आते हैं।
विवेकशील मनुष्य काँटों से बचते हुए, आगे बढ़ते जाते हैं।
जीवन एक अमूल्य यात्रा है, इस यात्रा को अच्छा या बुरा बनाना है हमारे हाथ।
सत्कर्म करने वालों के साथ, सदा रहतें प्रभु श्री नाथ।
जीवन में
उतार- चढ़ाव आते रहते हैं,
राहें समतल नहीं मिलतीं।
कभी छोटी-छोटी समस्याएँ आतीं, कभी स्थितियाँ विकट दिखतीं।
जन्म से लेकर मृत्यु तक हम अपनी, जिम्मेदारियां निभाने की कोशिश करते हैं।
जिम्मेदारियां निभाने की कोशिश में, कभी कष्ट सहते, कभी खुश रहते हैं।
चलते-चलते पांँव में छाले पड़े तो क्या हुआ, सोचो मंजिल
अब पास ही है।
अपने से कम सुविधा वालों को देखो, लगेगा सबसे सुखी तो हम ही हैं।
कुंदन बनने के लिए, सोना को भी तपना पड़ता है।
कठिन परिस्थितियों में धैर्य जो रखता, जीवन में वही निरंतर आगे बढ़ता है।
"उठो, जागो और तब तक मत रुको जब तक लक्ष्य प्राप्त न हो जाए," विवेकानंद जी के वचन।
"जीवन साइकिल चलाने जैसा है। अपना संतुलन बनाए रखने के लिए आपको आगे बढ़ते रहना चाहिए" अल्बर्ट आइंस्टीन जी के कथन।
इरादा यदि नेक हो,
कभी भी झुकना नहीं।
दूसरों के जीवन को खुशियों से भरो, वही रास्ता चुनो जो हो सही।
औरों की बात सुनो ज्यादा, खुद बोलो कम।
परोपकार में अपना जीवन लगाओ, बाँटो सबके गम।
अपनी शिक्षा, अपनी प्रतिभा, इसे अपने जीवन की पूंजी बनाओ।
सकारात्मक सोच रखो, वर्तमान को सुखमय बनाओ।
"अस्थि चर्म मय देह यह, ता सों ऐसी प्रीति।
नेकु जो होती राम से, तो काहे भव - भीत?" पत्नी रत्नावली जी के इस वाक्य ने तुलसीदास जी का जीवन बदल दिया।
वृद्धावस्था, बीमारी, मृत्यु और संन्यासी का दृश्य,
राजकुमार सिद्धार्थ को भगवान बुद्ध बना दिया।
एक घटना ही काफी होता, जीवन बदलने के लिए।
खुद के लिए जिए तो क्या जिए, अपना जीवन अर्पण कर दो औरों के हित के लिए।
अपने अनुभव से सीखो, अपनी अच्छाइयों को पूंजी बनाओ।
निरंतर आगे बढ़ते रहो, अपने जीवन की बगिया महकाओ।
डॉ० उषा पाण्डेय 'शुभांगी'
स्वरचित
वैस्ट बंगाल




