Saturday, 13 June 2026

प्रकृति - महाकवि डा अनन्तराम चौबे अनन्त


अंतरराष्ट्रीय हिन्दी साहित्य मंच हमारीवाणी की 
साप्ताहिक प्रतियोगिता हेतु 

प्रकृति - महाकवि डा अनन्तराम चौबे अनन्त

प्रकृति की सुन्दर लीला है
शाम सवेरा होता रहता है ।
अंधकार जब रात का छंटता
एक नई सुबह सवेरा होता है ।

समय गति से अपना चलता
समय के साथ दौर बदलता ।
बदलता दौर कभी न रूकता
समय के साथ ही चलना पड़ता ।

सुबह सवेरे सूर्यदेव निकलते
दिन भर आसमान में रहते ।
शाम हुई अस्ताचल में जाते
रात भर वो विश्राम  करते ।

समय का चक्र हमेशा चलता
धूप छांव सा बदलता रहता है ।
घनघोर अंधेरी रात का छटता
एक नई सुबह सवेरा हो जाता है ।

प्रकृति की सुन्दरता रचने
मौसम भी बदलते रहते हैं ।
ठंड गर्मी बरसात के मौसम
समय के साथ बदलते रहते हैं ।

बसंत का मौसम भी आता है
सबसे सुहाना मौसम  होता है ।
सुन्दर मौसम का सवेरा होता
पेड़ पौधों में पतझड़ होता है ।

एक नई सुबह की सुन्दरता
सभी के मन को भाती है ।
नित्य कर्म सुबह से होते हैं
जीवन में खुशियां मिलती है ।

प्रकृति न कुछ भूलती है
न कुछ भी भूल करती है ।
प्रकृति नियम समय पर चलता
समय लौटकर फिर नहीं आता ।

प्रकृति के गर्भ में क्या छुपा है
किसी को कुछ भी पता नहीं है ।
प्रकृति ने  हमको जो दिया है
जीवन उससे खुश हाल हुआ है ।

प्रकृति की लीला न्यारी है
प्रकृति कितनी सुन्दर प्यारी है ।
प्रकृति को देख खुशी मिलती है
हरदम हमको खुशियां देती है ।

वायु प्रकाश जल मिलता है
पर्वत नदियों सूर्य से मिलता है ।
पेड़ पौधे सब प्रकृति की देन है
मीठे फल पेड़ों की ही देन है ।

सुख दुख भी प्रकृति की देन है।
समय पर आते-जाते रहते हैं ।
कभी भूकंप कभी सुनामी
प्रकृति के ही हिस्से होते हैं ।

प्रकृति के आंचल में रहकर 
जीवन हमने सफल बनाया है ।
प्रकृति की अदभुत लीला से
सुन्दर संसार जो पाया है ।

  महाकवि डा अनन्तराम चौबे अनन्त
     जबलपुर म प्र

ये पर्यावरण नहीं - शकुंतला खंडेलवाल

ये पर्यावरण नहीं - शकुंतला खंडेलवाल

माँ है हमारी,
प्राकृतिक संपदाओं से,जो
निःस्वार्थ पालती है,हमे।
आसमां तले,धरती पर
संभालती है हमें ।
मूर्ख इंसान,पग,पग
करता है उसे अपमानित
पेड़,पौधे नोचता है,रौंदता है
और करता है,मनमानी।
सीने पर रख कर पत्थर,
फिर भी दुलारती है हमें।

कोरी बातों,भाषणों के
क्या मायने,
कोसते हो ,सरकार को
सोचो,समझो
ये देश है अपना
याद दिलाकर फर्ज तुम्हारा
माँ भारती पुकारती है तुम्हे

      शकुंतला खंडेलवाल 
दिल्ली 

प्रकृति - प्रा.रोहिणी डावरे


   प्रकृति - प्रा.रोहिणी डावरे              

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प्रकृति से जो करे सच्चा प्यार
दुनिया उसकी रहे सदा बहार
प्रकृति से नां करे दुर्व्यवहार
देती हमें वह शुद्ध आहार।१।

हरी वादियाँ प्यारा समा
निर्मल गंगा,नीला आसमां
धरती ओढे हरी घास की चादर
मोर पपीहा पत्तों की सरसर।२।

प्रकृति की गोद में जो ले लेता शरण
दर्द मन का हो जाए हरण
शांति सुंदरता प्रकृति का गहना
सारा सच सबको सहते रहना
।३।

पर्वतों की बाँहों में मिलता चैन
बरसेंगे बादल तरसे हैं नैन
नदियों संग भरे ताल तलैया
मस्त बहार बहे पुरवैया।४।

 ऊँचे पहाड,सागर है गहरा
देश की रक्षा पर दे रहे पहरा
सारा सच की प्रकृति निराली
हरदम सबकी भर दे झोली।५।

 पाठ पढाए त्याग बलिदान
देती सदा दूसरों को दान
देकर नां कभी इठलाती
सहनशीलता का धर्म निभाती।६।

प्रकृति से जो करे खिलवाड
टूट जाएगा उसपर पहाड
खुल जाए अगर तीसरी आँख
पलभर में होगा सबकुछ राख ।७।

  अगम्य अद्भूत प्रकृति का ज्ञान
सत्व रज तम गुणों की खाण
प्रकृति में ये गुण है भारी
संयम नियम से संतुलन जारी
।८।

  किताब नहीं, है किताबों का ज्ञान
अब तक पढ न सका इन्सान
गाए झरना मधुरतम गीत
प्रकृति की सुंदरता से लगाओ प्रीत।९।
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     🙏🏻सकृतज्ञ धन्यवाद🙏🏻

पर्यावरण संरक्षण - सुमन सोनी

पर्यावरण संरक्षण - सुमन सोनी
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    सृष्टि के रखवाले आओ ओ सज्जन ,
    कर जोड़े सबको करती विनती सुमन।
    पर्यावरण की रक्षा कर हम सब मिल,
    चेतना भाव जग मे खूब जगायेंगे ।।
      
      
    जो हुई गलती चलो उसे भूल जायेगे,
    माफ करेगी प्रकृति देगे उसका साथ हम।
    आगे सदा याद रखेगे कर्तव्य हमारे हम ,
    सब मिल शपथ ले आज रक्षा करेंगे हम।।

    अन्धे ,भूले,स्वार्थ के हम मानव,
    भूल गए हम जीवन के अहसासों को ।
    भौतिक सुख सजा जीवन में 
    सजीवो की हत्या करते चले गए हम।।

     जकड़ा, देखो हमारी ही साँसों को 
     कितना बेबस और लाचार हुए हम।।
     जिंदा है पेड़ हमारे सृष्टि हमे बताती है,
     फिर क्यों काट इनका देह जलाते है।।

      देखो उठती आज वेदना सब के मन में,
      देख धरा के तड़पते,बिलखते,सीने को ।
      उजड़ते,बिरान जंगल को बचा ले हम ,
      लालायित हैं ये भी जीवन जीने को ।।

      हम न सुधरे,और हाल रहा,यदि यही तो ,
      सच मानो प्रकृति ऐसा नाच दिखाएगी।
      हम भोग रहे जो भौतिकवादी सत्ता को,
      वो पल में ,तहस- नहस हो जायेगी ।।

      सदियों पुरखो से सुनते आये हम,
      है सजीव, ये पेड भी जो हमे बुलाते है ।
      फिर भी इन्हें दर्द दे काट- छाट कर हम,
      इनकी देह को दे तकलीफ जलाते है ।।
   
    नित प्रहार, धुआं,शोर, शराबा से ,
    हमको मिल इन सजीव को बचना होगा ।
    प्रदुषण,जल,ऑक्सीजन जग की कमी ,
    सबको मिल अब दूर दूर भगाना होगा ।।
    
    आज 5 जून विश्व पर्यावरण दिवस पर,
    हम सब जन मिल करे ये प्रण आज।
    जन जीवन जैव संरक्षण हम सदा करेंगे,
    फिर भविष्य में प्रकृति का प्रहार हम न सहेंगे  ।।
     
          जी हाँ हम सब मिल प्रकृति की रक्षा कर भारत माता की मान बढाएंगे......
          
🙏जय गुरु

स्वरचिय :----
सुमन सोनी
 बिहार

हरियाली - सुरेश कंठ

हरियाली - सुरेश कंठ

है पवित्र देखने में 
यह मुझे अब आया 
अति सुंदर तो जरूर है 
मुझे तो यह मन से भाया 
       ( 1 )
प्रकृति की रीति यही है 
छटा दिखती है निराली 
मनमोहक है दिखने में 
लगता है  “ हरियाली “
       ( 2 )
यही है परम सत्य अभी
सौभाग्य है इसमें हमारी 
स्पष्ट है कितना भला 
देखने  में  है  न्यारी 
         ( 3 )
 भारत की यह अनुपम छटा 
 धरती की सुंदरता भाया
 दिखने में सुंदर  होगी 
किसान को सभी ने बताया 
         ( 4 )
 हमने बहुत देखा है, सुना है 
 आकाश में  चहुं ओर 
  लगता बहुत अनंत है
  देखकर यह सब विभोर 
           ( 5 )
 कवि की कल्पना है अपरंपार
 होती है बड़ी विशाल 
 नहीं इसका कोई जवाब है 
 रह जाता है मन में मलाल 
            ( 6 )
 थोड़ा सा धैर्य रखें 
 समय को पनपने दें 
 निकलेगी कुछ निष्कर्ष 
आगे पीछे समझने दें 
             ( 7 )
 प्रकृति को रहने दें, समतुल्य 
       इसे समझना चाहिए 
पेड़ - पौधे अत्यधिक लगाएं 
इसे नहीं भूलना चाहिए 
            ( 8 )
इससे वर्षाजल समय पर होगी 
धरती पर “ हरियाली “ रहेगी 
तभी पैदावार अनुकूल होगी 
किसान खुशी से शांति मनाएगी 
             ( 9 )
कहते हैं “ कवि सुरेश कंठ “
जनता जनार्दन को परखने  दें 
मामला समझो अति गंभीर है 
 हमें भी कुछ संभलने दें 
             ( 10 )
            जयहिंद 
            “ सुरेश कंठ “
 Bihar