Tuesday, 20 October 2026

लोकतंत्र - डॉ रूपाली दिलीप चौधरी

लोकतंत्र - डॉ  रूपाली दिलीप चौधरी 
 महाराष्ट्र 

लोकतंत्र केवल शासन करने की पद्धति नहीं, बल्कि स्वतंत्रता, समानता, न्याय और मानवीय गरिमा का सशक्त प्रतीक है। यह वह व्यवस्था है, जहाँ जनता ही सर्वोपरि होती है और जनता की आकांक्षाएँ ही राष्ट्र की दिशा निर्धारित करती हैं। लोकतंत्र का वास्तविक अर्थ है—जनता का शासन, जनता के द्वारा और जनता के लिए।
भारत विश्व का सबसे बड़ा लोकतांत्रिक राष्ट्र है। हमारा संविधान प्रत्येक नागरिक को समान अधिकार प्रदान करता है। यहाँ विविध भाषाओं, धर्मों, संस्कृतियों और परंपराओं के बीच एकता की भावना लोकतंत्र को अद्वितीय बनाती है। लोकतंत्र हमें केवल अधिकार ही नहीं देता, बल्कि अपने कर्तव्यों के प्रति सजग रहने की प्रेरणा भी देता है।
मित्रो! लोकतंत्र की सफलता केवल चुनावों तक सीमित नहीं है। इसकी वास्तविक शक्ति जागरूक नागरिकों, निष्पक्ष विचारों, ईमानदार नेतृत्व और संवैधानिक मूल्यों में निहित है। जब नागरिक बिना किसी भय, प्रलोभन अथवा भेदभाव के अपने मताधिकार का प्रयोग करते हैं, तब लोकतंत्र की नींव और अधिक मजबूत होती है।
आज आवश्यकता है कि हम लोकतंत्र को केवल एक व्यवस्था न मानें, बल्कि उसे अपने जीवन-मूल्यों का अभिन्न अंग बनाएँ। अन्याय के विरुद्ध आवाज उठाएँ, विविधताओं का सम्मान करें और राष्ट्रहित को सर्वोपरि रखें।
आइए, हम संकल्प लें कि अपने अधिकारों के प्रति जागरूक रहते हुए अपने कर्तव्यों का ईमानदारी से निर्वहन करेंगे , क्योंकि लोकतंत्र की असली ताकत सत्ता में नहीं, बल्कि जागरूक जनता के विश्वास, विवेक और सहभागिता में निहित होती है!
जय हिंद! जय भारत!

अनधिकृत - वरिष्ठ कवि सुरेश कंठ

अनधिकृत - वरिष्ठ कवि सुरेश कंठ
           —-------  × —-------
 अनधिकृत  कार्यों से सही में 
   समाज में अंधकार छा जाता है 
    नियमों   को    जो    तोड़ता   है 
     वह   संकटों    से    घिर जाता है 

बिना अनुमति कदम उठाना 
  उचित    नहीं   कहलाता  है 
   अधिकारों की  सीमा लांघना
      विवाद    नया    बनाता   है 

 कानून की मर्यादा में 
   हर व्यक्ति को रहना है 
     अपने कर्तव्य को निभाकर 
        सच्चाई  के  संग  चलना है 

अनधिकृत कब्जा हो या 
    पद का दुरुपयोग कहीं 
      ऐसे अनुचित कर्मों से 
         सुख शांति रहती नहीं 

बिना इजाजत प्रवेश करना 
   निजता   का   अपमान  है 
      दूसरों  के  हक को छिनना 
        मानवता   का   अपमान  है 

अनुमति लेकर काम करें 
   यही सभ्यता का शान  है 
      नियमों का जरूर सम्मान करें 
        इससे बढ़ता देश का अरमान है 

 अनधिकृत धन की चाह में 
    कभी   मत   खोना  इंसान 
       छानिक  लाभ  के  लोभ में 
          मत करना खुद का नुकसान 

 अधिकार वही उचित है 
   जो कर्तव्य से जुड़ जाता है
      न्याय    और   सदाचार‌   से 
         जीवन  सुंदर  बन  जाता  है

 आओ मिलकर शपथ करें 
    नियमों  का  मान   बढ़ाएं
      अनधिकृत  कार्य छोड़कर 
          सद्भाव  के  दीप  जलाएं 

कहते हैं “कवि सुरेश कंठ”
   गलत  कभी  नहीं  करना है 
       करना  है  सोच समझकर 
          जो  सही  मन  में आना है
    —-----    जयहिंद  —------
रचयिता :- काव्य शिरोमणि 
        वरिष्ठ कवि सुरेश कंठ 
           बथनाहा, अररिया 
                  बिहार।

सरकार सत्ता का सत्यार्थ - नन्दलाल मणि त्रिपाठी पीताम्बर

सरकार सत्ता का सत्यार्थ - नन्दलाल मणि त्रिपाठी पीताम्बर

सरकार का स्पष्ट अर्थ है आम जनता से सरोकार सरकार मे सत्ता शक्ति भाव नहीं बल्कि सेवा भाव निहित होता है!
शासन शासक कि अवधरणा का मतलब  यह नहीं होता कि प्राप्त शासकीय संवैधानिक अधिकारों का प्रयोग उपयोग दुरपयोग सिर्फ व्यक्तिगत पारिवारिक या सामयिक संतुष्टि के लिए करना!
#भगवान राम से अनुज लक्ष्मण ने प्रश्न किया ज़ब आप स्वंय भिज्ञ है कि माता सीता निर्मल गंगा कि तरह पवित्र है तो,तो फिर राज्य के धोबी कि बात पर माता सीता को वन क्यों भेज दिया!#
#तब मर्यादा पुरुषोत्तम भगवान श्री राम ने अनुज को राज धर्म बताते हुए कहा था कि राजा या शासक का अपना कुछ नहीं होता उसके पास जो भी उपलब्ध है वह सिर्फ और सिर्फ जनता का है जनता के लिए है उसकी अपनी कोई इच्छा नहीं होती जनता कि इच्छा ही उसकी इच्छा होती है!#
सरकार का मुखिया ईश्वर का प्रतिनिधि एवं आम जनता कि आकांक्षाओं का यथार्थ होता है शासन का पहला सिद्धांत है 
सर्वें भवन्तु सुखिनः शासन सत्ता के अंतर्गत आने वाले सभी जीव जंन्तु मनुष्य अर्थात प्राणी मात्र संतुष्ट रहे! 
दूसरा सिद्धांत है अनुशासन अर्थात किसी सक्षम शक्तिमान द्वारा किसी भी अबला, दुर्बल, पर अत्याचार ना किया जाय यह सुनिश्चित करना सरकार का दायित्व है!
सरकार को भेद भाव से परे निरपेक्ष भाव से सर्वहिताय सर्व सुखाय अपने दायित्व का निर्वहन करे सभी मत विचार धमो का सम्मान एवं सम भाव सत्ता सरकार शासन का प्राण है!

राजशाही प्रथा मे पारंपरिक पारिवारिक सत्ता सरकार के कारण राज परिवारों मे ही बगावत के स्वर फूटने लगते और सत्ता के लिए छल,छद्म,धोखा, फरेब,झूठ आदि का खेल शुरू होता और पारिवारिक कलह से बाहर निकल एक नव सरकार सत्ता जन्म लेती तब बुर्जआ वर्ग को शांति मीलती!
लोकतंत्र मे ऐसी स्थिति नहीं आती फिर भी बुर्जुआ वर्ग कभी कभी शासन कि अराजकता भ्रष्टाचार आतंक से अब जाता है लोक तंत्र मे यह स्थिति तब आती है ज़ब चुनी सरकार का मुखिया 
अहंकारी मदांध हो तानाशाह हो अनैतिक, अमर्यादित होकर विचार व्यवहार से अंधा हो जाता है तब स्थिति और बिगड जाती है ज़ब सरकार का हर अवयव अपने भ्रष्ट आतंक के पर्याय मुखिया कि भाषा बोलने लगता है 
तब जन्म लेती है बगावत सड़को पर आम जनता का आक्रोश

अतः सरकार को संतुलित, सांयमित, पारदर्शी, निरपेक्ष, सम्भाव, नैतिकता बोध एवं मर्यादित सौम्य विनम्र शासन सरकार कि वैधानिक व्यवहारिक लोक प्रिय सरकार कि वास्तविकता है!!

नन्दलाल मणि त्रिपाठी पीताम्बर 
गोरखपुर 
उत्तर प्रदेश!!

सरकार - संजय वर्मा "दृष्टि"

सरकार - संजय वर्मा "दृष्टि"

बंद करवाओ ये मुफ्त की रेवड़ी बाटने की राजनीति

ये सहायता गरीबपन को दर्शाती

देश-विदेश में छवि पिछड़ापन लाती है।

राजनीति मुफ्त का माल देती

कर वृद्धि  से बह जाती गरीब की नाव

उत्पादन कोख उजाड़ती जाती राजनीति

इसमें उलझने आए भूखे मरने की नोबत आती

राजनीति मेहनती इन्सान को आलसी बनाती

इससे ही से तो विकास की गाड़ी पिछड़ जाती

खुद और सरकारों को कर्ज में दफ़नाती है।

अर्थव्यवस्था में सुधार के सपने देखना हो तो

मुफ्तखोरी की राजनीति बंद करो

मुपतखोरी की लत लग जाए तो

विकास पर लग जायेगा जंग

कल्याणकारी योजनाएं तमाशा देख कर

सरकार की  योजना लोगो को कर जाएगी दंग।

संजय वर्मा "दृष्टि"

Monday, 19 October 2026

सरकार - ख़ुशी झा

सरकार - ख़ुशी झा

कुर्सी बदली, चेहरे बदले,
बदले कितने नारे हैं,
फिर भी जनता पूछ रही है—
कब दिन होंगे हमारे हैं?

वादों की बारिश खूब हुई,
पर प्यास अभी भी बाकी है,
किसी के घर में चूल्हा बुझता,
किसी की जेब में खनक नहीं है।

कहीं युवा रोज़गार को तरसे,
कहीं किसान कर्ज़ में डूबा है,
कहीं किताबें हाथ में लेकर
बच्चा मंज़िल को ढूँढता है।

सड़कें, पुल और भवन बने हैं,
देश विकास की ओर चले,
पर विकास की इस दौड़ में
क्या सबके हिस्से फूल खिले?

सरकारें आती-जाती रहेंगी,
जनता यहीं रह जाएगी,
जिस दिन सत्ता जन की सुन ले,
सच्ची खुशहाली आएगी।

सवाल हमारा बैर नहीं है,
सवाल लोकतंत्र की आवाज़ है,
जनता जब अपने हक़ पूछे,
तभी तो शासन का अंदाज़ है।

न हम केवल दोष लगाएँ,
न आँखें मूँदकर साथ चलें,
जो अच्छा हो, उसका मान करें,
जो गलत हो, उस पर बात करें।

कुर्सी चाहे जिसकी हो लेकिन,
जनता सबसे ऊपर हो,
सरकार वही सार्थक कहलाए,
जिसमें जनहित सबसे ऊपर हो।


ख़ुशी झा 
महाराष्ट्र