Friday, 7 August 2026

*तुझे ज़िन्दगी बुला रही है*


 *तुझे ज़िन्दगी बुला रही है* 


तुझे  ज़िन्दगी  बुला  रही है।
गीत  खुशी के  सुना रही है।
सुख - दुख  के  दो  पाटो में,
सबको  झूला - झूला रही है।
      तुझे  ज़िन्दगी  बुला  रही है..

हँसाती ये कभी रुलाती भी,
सपने -सुहाने  दिखा रही है।
देखो - देखो  आँखे  खोलो, 
भोर  सुनहरी  जगा  रही है।
     तुझे  ज़िन्दगी  बुला  रही है...

सूरज   की  धवल  रश्मियां,
दिवस  नया  सजा  रही  हैं।
नव   कीर्ति  नई  परिभाषा,
जीना सबको सीखा रही है।
      तुझे  ज़िन्दगी  बुला  रही है...

उठ  चल   बंदे  बढ़ता  चल,
किस्मत साँकल बजा रही है।
हर  द्वारे  हर  देहरी  आँगन, 
फूल कुसुमित खिला रही है।
      तुझे  ज़िन्दगी  बुला  रही है...

कर्मगति  समझाती  'चन्द्रेश'
तुझे  ज़िन्दगी  बुला  रही  है
गीत  खुशी  के  सुना रही  है
ज़िन्दगी तुझको बुला रही है
     तुझे  ज़िन्दगी  बुला  रही है

चन्द्रकान्ता सिवाल 'चन्द्रेश'
(दिल्ली)
चन्द्रकान्ता सिवाल 'चन्द्रेश' 

सफलता की दौड़ में पीछे छूटती ज़िन्दगी

 

 सफलता की दौड़ में पीछे छूटती ज़िन्दगी

“अन्या, आज स्कूल में क्या हुआ?” माँ ने मोबाइल पर रील बदलते हुए पूछा।
“मैडम ने कहा था कि अपने माता-पिता के बारे में कुछ पंक्तियाँ लिखो,” अन्या ने धीमे स्वर में कहा।
पिता लैपटॉप पर काम करते हुए बोले, “अच्छा! सुनाओ, क्या लिखा?”
अन्या ने कॉपी खोली और पढ़ा—
“काश! पापा लैपटॉप से नज़र उठाकर मेरी बातें सुन पाते और माँ मोबाइल से ज़्यादा मुझे देख पाती।”
कमरे में अचानक सन्नाटा छा गया।
आज के माता-पिता बच्चों को हर सुविधा देकर उन्हें सफल और कामयाब बनाना चाहते हैं। लेकिन बेहतर भविष्य
बनाने की कोशिश में वे कई बार उनका वर्तमान देखना भूल जाते हैं। पिता काम में व्यस्त रहते हैं और माँ कुछ
पल आराम पाने के लिए मोबाइल की दुनिया में खो जाती है। बच्चा पास होकर भी अकेला और निराश महसूस
करता है।
बच्चों को केवल खिलौने, महँगे कपड़े या बड़ा विद्यालय नहीं चाहिए। उन्हें माता-पिता का समय, स्नेह और ध्यान
चाहिए। वे चाहते हैं कि कोई उनकी छोटी-सी बात सुने और उनके मन के हालात समझे।
ज़िन्दगी की सबसे बड़ी सीख यही है कि रिश्तों को सँभाले बिना प्राप्त सफलता अधूरी होती है। मुश्किल
परिस्थितियों से लड़ना आवश्यक है, पर अपनों की भावनाओं को अनदेखा करना उचित नहीं।
उस शाम पिता ने लैपटॉप बंद किया, माँ ने मोबाइल एक ओर रखा और दोनों अन्या के पास बैठ गए। पहली बार
उन्होंने केवल उसकी बातें नहीं सुनीं, बल्कि उसके मन का अकेलापन भी समझा।

~ डॉ. रीटा अरोड़ा
हरियाणा 

Thursday, 6 August 2026

‘काव्य कदम’ के मासिक कवि सम्मेलन में सजी साहित्यिक संध्या


 

‘काव्य कदम’ के मासिक कवि सम्मेलन में सजी साहित्यिक संध्या


सारा सच (चंडीगढ़) 25 जुलाई। हरियाणा की साहित्यिक संस्था ‘काव्य कदम’ द्वारा आयोजित मासिक कवि सम्मेलन सेक्टर-17 स्थित टी.एस. सेंट्रल स्टेट लाइब्रेरी, चंडीगढ़ में संस्था के अध्यक्ष बलवान सिंह ‘मानव’ की अध्यक्षता में गरिमापूर्ण वातावरण में संपन्न हुआ। कार्यक्रम के मुख्य अतिथि राष्ट्रीय एवं अंतरराष्ट्रीय स्तर पर सम्मानित वरिष्ठ साहित्यकार प्रेम विज तथा विशिष्ट अतिथि डॉ. हर्ष शर्मा (ढकोली) रहीं। मंच संचालन शायर संदीप भगवाड़िया ‘संवेदी’ ने प्रभावशाली एवं रोचक शैली में किया। कार्यक्रम का शुभारंभ दीप प्रज्ज्वलन तथा कवयित्रियों द्वारा गाए गए मधुर स्वागत गीत से हुआ।

काव्यपाठ का श्रीगणेश राजीव गुप्ता जी ने अपनी गज़ल “ज़िंदगी में नहीं कुछ तुम्हारे बिना, हर शै बेमानी तुम्हारे बिना” सुनाकर किया। अध्यक्ष बलवान सिंह ‘मानव’ ने “आज के इंसान को क्या हो गया, जगने से ज़्यादा देखो ये सो गया” सुनाकर वर्तमान सामाजिक विसंगतियों पर तीखा व्यंग्य किया। वरिष्ठ कवि वीरेंद्र राय ने “माना कि लबों से वो इज़हार नहीं करता, ये झूठ सरासर है वो प्यार नहीं करता” सुनाकर महफ़िल को ग़ज़लों की ख़ुशबू से सराबोर कर दिया। ग़ज़लकार राजन तेजी ‘सुदामा’ ने अपनी ग़ज़ल “बस बहारों का क्या पता पूछा, मुस्कुरा कर गुज़र गया मौसम” कही जिसे श्रोताओं ने खूब सराहा।
युवा कवयित्री करिश्मा वर्मा ने देशभक्ति से ओतप्रोत रचना “बलिदान तुम्हारा कोई मिटा नहीं सकता, धरती माँ पर कोई नज़र उठा नहीं सकता” सुनाकर राष्ट्रप्रेम का भाव जगाया। प्रभात पाण्डेय ने “मौन हुई है नीति विदुर की, भीष्म हुए हैं फिर निर्बल, लाज लुटी है द्रोपदी की, फिर फलित हुआ दुर्योधन का छल” के माध्यम से समकालीन सामाजिक परिस्थितियों पर सशक्त प्रहार किया। हास्य कवि अश्वनी मल्होत्रा ‘भीम’ ने “पत्नी में आधा अक्षर कम होता है, पर उसमें पुलिस से ज़्यादा दम होता है” सुनाकर श्रोताओं को ठहाके लगाने पर मजबूर कर दिया।
ममता ग्रोवर ने “जब कच्ची संकरी गलियाँ थीं मेरे गाँव की, महफ़िलें बाकमाल थीं पीपल की छाँव की” के माध्यम से गाँव की स्मृतियों को जीवंत किया। कीर्ति सोनी ने “मैं सुखनवर तो नहीं, मगर कुछ लिख-कह लेती हूँ…” में अपने भावों को सहज अभिव्यक्ति दी। रवि कटारिया ने “नाम तेरा यह जपते हैं, फिर भी पाप यह करते हैं” सुनाकर श्रोताओं को आत्ममंथन के लिए प्रेरित किया।
राम कुमार वर्मा ‘राम’ ने “जब से उसने लिया पता मेरा, मुझमें बाकी न कुछ बचा मेरा” ग़ज़ल प्रस्तुत कर श्रोताओं का खूब स्नेह प्राप्त किया। जया सूद ने “मेरी कलम ने ली आज खुलकर अंगड़ाई, दिल के उत्सव से करेगी रोशन आज यह अंगनाई” तथा मीना जागलान ने “तुम पास होते हो दिल को सुकून-सा मिलता है, तुम्हारी एक मुस्कान से मेरा हर ग़म खिलता है” सुनाकर श्रोताओं को भाव-विभोर कर दिया। डॉ. मेजर मंजु चावला ने अपनी नज़्म “कोई भी पहला प्यार आख़िरी प्यार नहीं होता, उसी से या किसी और से प्यार बार-बार होता है” प्रस्तुत की। राकेश कुमार ‘रसिक’ ने “अजब-सा हाल हो गया है यार अब तो ज़माने का, सिलसिला थम नहीं रहा किसी को नीचा दिखाने का” के माध्यम से सामाजिक मानसिकता पर करारा व्यंग्य किया।
स्मृति शर्मा ने “उजालों में भी मुझको तीरगी महसूस होती है, कि दिल को जब तुम्हारी तिश्नगी महसूस होती है” ग़ज़ल से श्रोताओं का मन मोह लिया। सुरेंद्र पाल सोनी ‘काकड़ौद’ ने “हर रोज़ किसी को लील रहा है, न जाने कितनों को निगलेगा, नशा कलयुग का बकासुर घर-घर से भोजन निकलेगा” के माध्यम से नशे के विरुद्ध प्रभावशाली संदेश दिया। मंच संचालक संदीप भगवाड़िया ‘संवेदी’ ने “कभी मुस्कुरा कर इधर देखते हो, नज़र क्यों चुरा कर मगर देखते हो” सुनाकर भरपूर दाद बटोरी।
अनीता नरवाल ने “देखा हमने मैदाँ में ऐसा इक नज़ारा है, जीत जिसकी पक्की थी बस वही तो हारा है” ग़ज़ल सुनाई। निशा गर्ग ‘दीपक्षम’ ने युवाओं की पीड़ा को स्वर देते हुए “क्यों ये नौजवान रातों की नींद हराम करते हैं…” प्रस्तुत की। निर्मल सूद ने “दहलीज़ केवल घर और बाहर की संधि रेखा नहीं, घर के संस्कार-व्यवहार का पूरा संसार है” जैसी विचारोत्तेजक रचना सुनाई। सीमा चहल पुष्प ने पतियों पर हास्य रचना सुनाकर पूरे सभागार को ठहाकों से गूँजा दिया।
कार्यक्रम का विशेष आकर्षण चाँदनी शर्मा की लघुकथा ‘वेटिंग रूम की रात’ रही, जिसमें उन्होंने संवेदनशीलता के साथ यह संदेश दिया कि कई बार कुछ मुलाकातें मंज़िल तक साथ निभाने के लिए नहीं, बल्कि हमें स्वयं तक वापस पहुँचाने के लिए होती हैं। सुरिन्द्र कुमार सोइन ने “हम हैं भारत की वीर बेटियाँ, हम बढ़ रही हैं आगे ही आगे” प्रस्तुत कर नारी शक्ति का प्रभावशाली चित्रण किया। डॉ अनुपमा हेमा जी ने बहुत सुंदर रचना सुनायी - कोई लौटा दे मेरे बीते हुए दिन।

मुख्य अतिथि प्रेम विज ने खूबसूरत ग़ज़ल ‘मन मंदिर में आकर देखो, अपना मुझे बनाकर देखो’ पेश की और संबोधन में कहा कि साहित्य समाज की चेतना का दर्पण है और ऐसे आयोजन नई प्रतिभाओं को निरंतर प्रोत्साहित करते हैं। विशिष्ट अतिथि डॉ. हर्ष शर्मा ने सभी रचनाकारों की सराहना करते हुए संस्था के सतत साहित्यिक प्रयासों की प्रशंसा की। अध्यक्षीय उद्बोधन में बलवान सिंह ‘मानव’ ने कहा कि ‘काव्य कदम’ साहित्य, संस्कृति और मानवीय मूल्यों के संवर्धन के लिए निरंतर सक्रिय है तथा भविष्य में भी ऐसे आयोजन नियमित रूप से आयोजित करता रहेगा। इसके अलावा अंजू बरवड़, राजगुणपाल बालकीया, एम. एल.  अरोड़ा ‘आजाद’, प्रवीण सुधाकर, आर. के.  सुखन, शिवाजी चौहान बुन्देलखंडी, प्रतिभा सिंह, हरेन्द्र सिन्हा, कृष्णा मैक्स, पवन शर्मा ‘मुसाफिर’, नवल भदौरिया आदि ने भी अपनी सुंदर प्रस्तुति देकर चार चांँद लगा दिए।

कार्यक्रम के अंत में सभी अतिथियों, रचनाकारों, साहित्यप्रेमियों एवं श्रोताओं का आभार व्यक्त किया गया। विविध रसों—श्रृंगार, वीर, करुण, हास्य, व्यंग्य, सामाजिक सरोकार और आध्यात्मिक भावों—से सजी इस साहित्यिक संध्या ने उपस्थित श्रोताओं को देर तक मंत्रमुग्ध रखा।

GenZ प्रोटेस्ट


 युवा प्रदर्शनकारियों के पक्ष और विपक्ष में हमने बहुत कुछ कह लिया. आइए अब कुछ सार्थक कर लें. समस्या हमें पता चल गई शिक्षा व्यवस्था की बदहाली. समाधान क्या है? आइए अब इस पर भी हम भागीदारी निभाएं. कैसे हमारे देश का शिक्षा तंत्र ठीक हो सकता है? कैसे अच्छी और समान शिक्षा तक अमीरों और गरीबों की पहुंच के अंतर को पाटा जा सकता है? मैं यहां अपने कुछ सुझाव रख रहा हूं. आप भी शिक्षा व्यवस्था को सुधारने के लिए जो सोचते हैं, वो सार्वजनिक करें. सत्ता पक्ष, विपक्ष, आम नागरिक और सबसे ऊपर GenZ, सभी को इस महायज्ञ में अपनी और से आहुति देनी है. मेरा मानना है, ऐसे विचार मंथनों से ही अमृत निकलेगा...


GenZ के प्रोटेस्ट पर विराम लग गया है. जंतर मंतर पर युवाओं का मेला उठ चुका है. छात्र डटे तो प्रधान हटे. एक तीर से कई निशाने सध गए हैं...

सत्ता पक्ष जान गया अहंकार से युवा नहीं हांके जा सकते. विपक्ष को पता चल गया, लोगों से जुड़ना है तो जनहित के लिए सड़क पर संघर्ष करना ही होगा. मीडिया को कड़ा संदेश मिल गया है, अपना ढर्रा नहीं बदला, लोगों के असल मुद्दे नहीं उठाए तो शटर गिरना तय है...

आइए, अब देश की शिक्षा व्यवस्था को लेकर मैं क्या सोचता हूं, वो आपसे साझा करता हूं. मेरी नज़र में भारत की हर समस्या (गरीबी, भूख, भ्रष्टाचार, स्वास्थ्य) का मूल शिक्षा तंत्र की खामियां हैं. मेरी समझ से अगर इस मुद्दे पर अब ठीक से ध्यान दिया जाए तो उसका फल 15-20 साल बाद मिलना शुरू होगा. लेकिन कभी न कभी तो पहल करनी ही होगी...

देश में शिक्षा पर सबसे ज़्यादा निवेश किया जाना चाहिए. इस निवेश का फायदा आज नहीं तो कल ज़रूर मिलेगा. देश के हर बच्चे को शिक्षा दिलाने की ज़िम्मेदारी सरकार ले. इसके लिए व्यावहारिक दृष्टिकोण अपनाया जाए. किसी हकीम ने थोड़े ही कहा है कि हर बच्चा ग्रेजुएट बनने के बाद ही सम्मान का हकदार हो सकता है. ओलिम्पिक्स में वो अगर गोल्ड ले आता है तो क्या 1.40 अरब भारतवासियों का सीना गर्व से चौड़ा नहीं होगा?...

देश में ऐसी व्यवस्था क्यों नहीं अपनाई जाती जिसमें बिना जाति, मजहब, देखे छोटी उम्र में ही बच्चों की स्क्रीनिंग कर ली जाए. ये क्यों नहीं तय कर लिया जाता कि आखिर बच्चे में कितनी प्रतिभा है और वो किस फील्ड में ज़्यादा बेहतर कर सकता है. मान लीजिए ये तय हो गया कि किसी बच्चे में एथलीट बनने के लिए अच्छा पोटेंशियल है. तो फिर उसे क्यों नहीं दिन रात उसके खेल की ही प्रैक्टिस कराई जाती. किताबी शिक्षा उसे उतनी ही दी जाए जितने में वो अपना रोज़मर्रा का काम चला सके. उसका मुख्य ध्येय अपने खेल में ही अव्वल बनने का होना चाहिए. रोज़गार के लिए इसी तरह बच्चे को किसी न किसी हाथ के हुनर में भी दक्ष बनाने पर ज़ोर दिया जाना चाहिए. जिससे कि नौकरी न भी मिले तो वो खुद का काम करके आत्मनिर्भर बन सके...

जर्मनी में बच्चों की औपचारिक शिक्षा शुरू होने से पहले ही उन्हें साइकिल में पंचर, फ्यूज़ लगाना, नल ठीक करना जैसे व्यावहारिक कार्य भी सिखाए जाते हैं. जर्मनी में एक और अच्छी बात भी है. अगर वहां अभिभावक बच्चे की शिक्षा का खर्च उठाने में समर्थ नहीं हैं तो सरकार उसकी जिम्मेदारी लेती है. जब वो बच्चा बड़ा होकर कुछ बन जाता है, अच्छा कमाने लगता है तो फिर वो पे—बैक करता है. उस पैसे से फिर किसी ज़रूरतमंद बच्चे की मदद होती है. ऐसा ही कुछ देश में भी किया जा सकता है...

एक देश, एक सिलेबस का मुद्दा देश में पहले भी उठता रहा है. कहा ये भी जाता है कि देश के हर बच्चे का शिक्षा पर समान अधिकार हो. लेकिन क्या प्रैक्टिकली यह मुमकिन है. गांव-देहात या छोटे शहर का बच्चा भले ही दिमाग से कितना तेज़ हो लेकिन क्या अंग्रेज़ी बोलने में महानगरों के पांचसितारा स्कूलों के बच्चों के सामने टिक सकता है. एक तरफ़ पांच पांच लाख रुपए फीस लेने वाले भव्य स्कूल हैं, दूसरी तरफ़ बदहाल सरकारी स्कूल हैं. मेडिकल और इंजीनियरिंग जैसे प्रोफेशनल कोर्सेज में एडमिशन के लिए नामी गिरामी कोचिंग सेंटर हैं जो लाखों में मोटी फीस वसूलते हैं. ज़ाहिर है अंग्रेज़ीदां होने का हर जगह एडवांटेज है...

मेरी राय में हर बड़ी प्रतियोगी परीक्षा में अंग्रेज़ी जितना वेटेज ही देश की दूसरी भाषाओं को दिया जाए. अंग्रेजी जानने के महत्व को मैं नकार नहीं रहा हूं. लेकिन इसके लिए SAME PLAYING FIELD  बनाना ज़रूरी है. आज ऑनलाइन टूल्स के ज़रिए बहुत कुछ किया जा सकता है. अगर गांव-देहात में अच्छे शिक्षक उपलब्ध नहीं हैं तो महानगरों से ही वीडियो प्रोजेक्शन के ज़रिए पढ़ाई कराई जाए. छात्रों के साथ बस एक समन्वयक मौजूद रहे. बच्चों को मनोवैज्ञानिक तरीके से दिल्ली-मुंबई जैसे महानगरों में बैठे एक्सपर्ट्स ही बढ़िया तरीके से पढ़ा सकते हैं. इसके लिए देश के कोने-कोने में मज़बूत कनेक्टिवटी का होना जरूरी है. डिजिटल क्रांति के इस युग में सब कुछ किया जा सकता है. बस इसके लिए दृढ़ इच्छाशक्ति चाहिए...  

मेरा एक सवाल ये भी है कि क्या हर बच्चे को कथित ग्रेजुएट बनाना ज़रूरी है? देश के चप्पे-चप्पे पर विश्वविद्यालय मौजूद हैं लेकिन वहां पढ़ाई का स्तर कैसा है किसी से छुपा नहीं है. ऐसा नहीं होता तो देश के दूर-दराज से बच्चे हर साल दिल्ली यूनिवर्सिटी में दाखिले के लिए दौड़ नहीं लगाते. गुणवत्ता वाले उच्च शिक्षा संस्थानों तक बिना किसी भेदभाव पहुंचने का अधिकार उन्हीं छात्र-छात्राओं को मिले जो वाकई इसके लिए काबिलियत रखते हो. Quantity की जगह Quality को तरजीह दी जाए. बेशक कम उच्च शिक्षा संस्थान हों लेकिन वो गुणवत्ता के मामले में विश्व स्तरीय होने चाहिए...

मैं आपको मेरठ में पढ़ाई के अपने दिनों का अनुभव बताता हूं. आसपास कृषि प्रधान भूमि होने की वजह से गांव-कस्बों से बच्चे बड़ी संख्या में यहां कॉलेज की पढ़ाई के लिए आते हैैं. मुझे अच्छी तरह याद है कि कुछ लड़के उस भले वक्त में अपने घरों पर कहते थे कि ब्लॉटिंग पेपर की ज़रूरत है, इसलिए पांच सौ रुपये भेज दो. अब बेचारा किसान पिता किसी तरह भी पेट काटकर बेटे को पैसे का इंतज़़ाम कर भेजता. शहर में कॉलेज की पढ़ाई कर लेने वाला बच्चा फिर गांव लौटकर फार्मिंग की नहीं सोचता. उसे ग्रेजुएट या पोस्टग्रेजुएट होने के बाद शहर में ही कोई बढ़िया नौकरी चाहिए. देश में नौकरियां आखिर कितनी हैं, जो ढंग की नौकरियां हैं वो ढंग के विश्वविद्यालयों से ढंग की पढ़ाई करने वाले कुछ ही छात्र पाते हैं. फिर थोक के भाव से निकलने वाले अन्य विश्वविद्यालयों के छात्र कहां जाएं...

देश में बेरोज़गारों की फौज में हर साल तेजी से इज़ाफ़ा हो रहा है तो ये सरकार, सिस्टम के साथ हम सब की भी हार है. हम सब भी सिस्टम से अलग नहीं है. आइए सब इस सूरत-ए-हाल को बदलने के लिए हाथ बढ़ाएं. ये मेरे और आपके बच्चों के साथ देश के हर नौनिहाल के भविष्य का सवाल है...

Wednesday, 5 August 2026

कमिश्नर ने कैंसर पीड़ित बच्ची के लिए अपना सिर मुंडवाया - खुशदीप सहगल

कमिश्नर ने कैंसर पीड़ित बच्ची के लिए अपना सिर मुंडवाया 
 -खुशदीप सहगल

मध्य प्रदेश पीएससी की सीनियर अफसर और सिंगरौली नगर निगम कमिश्नर सविता प्रधान ने एक मासूम के चेहरे पर मुस्कान लाने के लिए अपनी सुंदरता का मोह त्याग दिया. उन्होंने कैंसर की आख़िरी स्टेज से जूझ रही एक बच्ची के लिए अपना सिर  मुंडवा दिया. दो दिन पहले बच्ची से इनकी मुलाकात हुई तो उस बच्ची ने इनसे कहा कि "मैम मुझे आपके बाल बहुत पसंद है..." सविता प्रधान इसे सुनकर भावुक हो गईं और उन्होंने दो दिन बाद अपना सिर मुड़वा दिया और बच्ची को अपने बालों का विग बनवाकर गिफ्ट किया...

सिर मुंडवाने के बाद जब उन्होंने सोशल मीडिया पर अपनी नई तस्वीरें साझा कीं, तो उनके इस रूप और खूबसूरत संदेश ने हर किसी का दिल जीत लिया है...

सविता प्रधान ने बताया कि उनकी खुद की मां ने तीन बार कैंसर का दर्द झेला है, इसलिए वे कीमोथेरेपी के दौरान बाल झड़ने की तकलीफ को भली-भांति जानती हैं...

बाल कटवाने के बाद उन्होंने इंस्टाग्राम पर तस्वीरें शेयर करते हुए एक सशक्त संदेश लिखा कि सुंदरता लंबे बालों या गहनों से नहीं, बल्कि आत्मविश्वास से झलकती है. उन्होंने यह भी साफ किया कि वे बिना किसी झिझक या स्कार्फ के इसी 'बाल्ड लुक' में अपने दफ्तर जाकर कामकाज संभालेंगी...

नर्मदापुरम जिले के मड़ई गांव की रहने वाली सविता प्रधान का संघर्ष प्रेरणादायक है. एक गरीब आदिवासी परिवार में जन्मी सविता की शादी महज 16 साल की उम्र में उनसे 11 साल बड़े व्यक्ति से कर दी गई थी, जहां उन्हें भीषण घरेलू हिंसा और प्रताड़ना का सामना करना पड़ा. तंग आकर वे अपने दो बेटों (अथर्व और यजूस) के साथ ससुराल छोड़कर अलग हो गईं और रिश्तेदारों के सहारे ब्यूटी पार्लर में काम करके बच्चों का पालन-पोषण किया...

इसके बाद उन्होंने किताबों को अपना हथियार बनाया और साल 2005 में पहले ही प्रयास में MPPSC पास कर डीएसपी चुनी गईं. इसके बाद साल 2006 में 83वीं रैंक हासिल कर वे मध्य प्रदेश प्रशासनिक सेवा की अधिकारी बनीं...

सविता प्रधान के जज़्बे को सैल्यूट...