Friday, 14 August 2026

मन निर्मल ज्यों गंगाजल / रुपेश कुमार मिश्र

 

।। मन निर्मल ज्यों गंगाजल।।

बने मन निर्मल ज्यों गंगाजल,
हृदय दिव्य तीर्थ सा हो पावन।
कहे कवि रुप बोल अनमोल,
हमीं में  राम बसे हमीं में रावण।।

भक्ति हो मीरा रैदास सम,
प्रेम ज्यों ब्रजरानी राधा।
मित्रता ज्यों  कृष्ण सुदामा,
एक पान बंटे आधा आधा।।

मन कांवड़ में भर ले जल,
शुद्ध हृदय भाव निश्छल।
सुंदर तन होना मलिन एक दिन,
भाव शुद्धता स्वर्ण कमल।।

रुप कहे अनमोल वचन,
बनो शबरी सूरदास सम।
भक्ति का फैले आलोक ऐसा,
मिटे अज्ञान अंधकार तम।।

जीवन में हो सदाचार औ,
सत्य,करुणा,दया, धर्म।
करे सदा जग जयगान ,
रुप!देशहित हेतु हो कर्म।।

रचना: रुपेश कुमार मिश्र
बिहार 

Thursday, 13 August 2026

दादा गिरी / महाकवि डा अनन्तराम चौबे

अंतरराष्ट्रीय हिन्दी साहित्य मंच हमारी वाणी 

साप्ताहिक प्रतियोगिता हेतु 
विषय.. दादा गिरी 
दिनांक... 28/7/2026
नाम.. महाकवि डा अनन्तराम चौबे अनन्त जबलपुर 
कविता...

      दादागिरी 

अपने ही बच्चे घर में कहते हैं
अब तो अपने को बदल लो
बाहर न सही कम से कम 
मोहल्ले में पंगा मत लो ।

पहले युवावस्था और
नौकरी का सपोर्ट था
सच बोलना ही आज
के समय का खोट था ।

रिटायरमेंट की इस उम्र में
न जोश है न होश है ।
जोर से बोलने में हांफते हो
वी पी बढने से कांपते हो ।

खुद अपने आपको
संभाल  नही पाते
बोलने में आपा खो देते हो
रिटायर  हो गया तो क्या हुआ
कहने की हिम्मत तो रखते है ।

सच बोलना सच कहना
सच का साथ देना
आशा बादी रहना
आत्मसम्मान से जीना
क्या यही बुराई है
कोई भी घर के सामने
कचरा डाल दे
रोड पर पानी  बहाये
टंकी ओवर फ्लो हो जाय
पर बंद न की जाय ।

क्या यही
पानी का मोल है
समय वे समय बच्चे
रोड चौराहे पर खेलते है
हो हल्ला शोर मचाते है ।
राह चलते राहगीरों की
राह रोक देते है ।

रास्ता रोककर
किसी भी फक्शन का
कभी शादी की पार्टी
कभी जन्म दिन पार्टी के
बहाने टेंट लगा देते है ।
मना करने पर
दादागिरी दिखाते है ।

बुजुर्ग हूँ कह देता हूं
नोकरी भी बहुत ही 
ईमानदारी  से किया हूं 
भ्रष्टाचारियों चोरों
बेईमानों का कभी
साथ नही दिया हूं ।
चन्दा लेने देने के
खिलाफ रहा हूं ।

स्वच्छता  सफाई
प्रधानमंत्री जी की
एक अच्छी योजना है
बढ चढकर इसमें
अपना हाथ बटाओ
इसमें क्या  सोचना हैं ।

सच तो सच है
कभी नही बदलता है
अपने तो बस अपने है
उनका कहना  भी
अच्छा लगता है ।

दादागिरी करने बालों का
कोई ईमान धर्म नही होता है ।
सच बोलने बाला कुछ परेशान हो 
कभी किसी से डरता नही है ।

आरक्षण वाले भी आजकल 
अपनी दादागिरी दिखाते हैं।
जातिगत सम्बोधन करने पर 
एफ आई आर दर्ज कराते हैं ।

एस सी एक्ट की एफआईआर 
कराने में सरकार नगद राशि देती है।
आरक्षण वालों और पुलिस की
मिली भगत की बंदरबांट जो होती है ।

अमेरिका के राष्ट्रपति को देखो
बेवजह दादागिरी कर रहे है । 
युद्ध की कोई जरूरत नही है
टेरिफ लगा युद्ध कर रहे हैं ।

महाकवि डा अनन्तराम चौबे अनन्त
  जबलपुर म प्र /8326/
       28/7/2026
  लंदन यू एस ए गिनीज वर्ल्ड रिकॉर्ड

झुकना / कवि सुरेश कंठ

 शीर्षक —  “  झुकना “

  —------- ×××××  —-----------
 न झुकती है दुनिया, 
                    झुकाने वाला चाहिए
 समझतीं है दुनिया, 
                  समझाने वाला चाहिए

 विकसित है भारत, 
                   समझने वाला चाहिए
 दुनिया में बजती डंका, 
              औरों को समझना चाहिए

ऐसे नहीं हुआ विकसित, 
          इसका रहस्य जानना चाहिए
त्याग है इसके पीछे, 
          इसपर विश्वास करना चाहिए

इसके पीछे है सही  शासन
          इसे  हमें समझ लेना चाहिए
पाक भी अब समझ चुका है
    इसे गम्भीरता से समझना चाहिए

विश्व में बजता डंका, 
            जनता को समझना चाहिए
मजबूत सरकार है  सब मुम्किन है, 
         आश्चर्य नहीं समझना चाहिए

भारत विश्वगुरु बनेगा, 
        बंगलादेश को समझना चाहिए
पाक क्यों नहीं मानता, 
                उसे समझा देना चाहिए

भारतीय अब समझ गया है, 
               नित्य-दिन बढ़ना चाहिए
चमगादड़ चीन समझ गया, 
          बेमतलब लड़ना नहीं चाहिए

देश के अंदर भी दुसमन हैं, 
           उसे भी समझ लेना चाहिए
उसका भी अंत निश्चित है, 
                यह समझ लेना चाहिए

“ झुकना “ कभी सीखा नहीं 
       विपक्ष को समझ लेना चाहिए 
तीनों सेना मजबूत है काफी 
        दुश्मन को समझ लेना चाहिए

दुश्मनी भी शान से निभाते हैं 
      उन्हें भी यह समझ लेना चाहिए 
हमें एक मुस्कान ही काफी है 
       पल में उसे समझ लेना चाहिए 
                 जयहिंद 
                  *****
रचयिता - काव्य शिरोमणि वरिष्ठ
               “ कवि सुरेश कंठ “
                 अररिया, बिहार।

धर्मेंद्र प्रधान का इस्तीफा

 ...... धर्मेंद्र प्रधान का इस्तीफा

 सरकार के लिए चेतावनी, व्यवस्था के लिए सबक
            प्रदीप कुमार नायक
      स्वतंत्र लेखक एवं पत्रकार 
                   केंद्रीय शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान ने इस्तीफा देकर सिर्फ एक पद नहीं छोड़ा, उन्होंने पूरे सिस्टम को आईना दिखा दिया। युवाओं के नाम लिखे भावुक पत्र में उन्होंने कहा कि वे नहीं चाहते कि छात्रों का भविष्य कानूनी विवादों में उलझे। त्यागपत्र प्रधानमंत्री को सौंपते हुए उन्होंने यह भी कहा कि राष्ट्रसेवा उनकी सर्वोच्च प्राथमिकता रहेगी। ये शब्द साधारण नहीं हैं। ये उन लाखों छात्रों की पीड़ा की गूंज हैं जो पिछले एक साल से पेपर लीक, रिजल्ट में गड़बड़ी और जवाब न मिलने से तड़प रहे थे।
                            सच कहें तो ये इस्तीफा बहुत देर से आया। नीट-यूजी का पेपर लीक हुआ, CBSE की कॉपी चेकिंग पर सवाल उठे, UGC-NET रद्द करना पड़ा। हर बार सरकार ने कहा "जांच होगी", "कड़ी कार्रवाई होगी"। लेकिन जमीन पर कुछ नहीं बदला। छात्र सड़क पर उतरे, जंतर-मंतर पर धरना हुआ, सोनम वांगचुक भूख हड़ताल पर बैठे। कॉकरोच जनता पार्टी ने डेडलाइन दी, INDIA गठबंधन ने संसद में हंगामा किया। फिर भी मंत्रालय का रवैया था "सब ठीक है"। आखिरकार जब दबाव हद से बढ़ा तो एक मंत्री को आगे आकर नैतिक जिम्मेदारी लेनी पड़ी। सवाल ये है कि ये जिम्मेदारी सिर्फ एक व्यक्ति की थी या पूरी व्यवस्था की?
                      धर्मेंद्र प्रधान का पत्र पढ़कर लगता है कि उन्हें भीतर से तकलीफ थी। उन्होंने लिखा कि लोकतंत्र और युवाओं की शक्ति पर उनका भरोसा अटूट है। लेकिन भरोसा भाषणों से नहीं, फैसलों से बनता है। जब NTA बार-बार फेल हो रहा था, जब पेपर लीक के बाद भी जिम्मेदार अफसरों पर कार्रवाई नहीं हो रही थी, तब मंत्रालय ने आंख क्यों बंद रखी? नई शिक्षा नीति के बड़े-बड़े दावे किए गए, लेकिन नीति लागू करने वाली मशीनरी ही जंग खा गई। प्रधान ने अकेले इस्तीफा देकर कुर्सी की मर्यादा बचा ली, लेकिन सरकार को ये सोचना होगा कि पूरी शिक्षा व्यवस्था की मर्यादा कौन बचाएगा?
                 ये इस्तीफा सरकार के लिए सीधा सबक है। पहला सबक - युवाओं को हल्के में मत लीजिए। आज का छात्र सोशल मीडिया का छात्र है। उसे झूठे आश्वासन से बहलाया नहीं जा सकता। नीट में 24 लाख बच्चे बैठते हैं। उनके एक-एक नंबर के पीछे माता-पिता का कर्ज और सालों की मेहनत होती है। जब सिस्टम उनके साथ धोखा करता है तो गुस्सा फूटता ही है। दूसरा सबक - जवाबदेही तय कीजिए। पेपर लीक हुआ तो सिर्फ छात्रों को दोषी बताकर पल्ला नहीं झाड़ा जा सकता। NTA के चेयरमैन से लेकर सेंटर के इंचार्ज तक, सबकी जिम्मेदारी तय होनी चाहिए। तीसरा और सबसे बड़ा सबक - सुधार दिखावे के लिए नहीं, ईमानदारी से कीजिए। परीक्षा प्रणाली में टेक्नोलॉजी लाइए, पेपर की सुरक्षा बढ़ाइए, मूल्यांकन में पारदर्शिता लाइए। वरना हर साल कोई न कोई मंत्री इस्तीफा देता रहेगा और समस्या जस की तस रहेगी।
                      प्रधान ने पत्र के अंत में कहा कि राष्ट्रसेवा जारी रहेगी। ये अच्छी बात है। लेकिन अब गेंद सरकार के पाले में है। नए शिक्षा मंत्री को आते ही तीन काम करने होंगे। NTA का ढांचा बदलना होगा। पेपर लीक में शामिल माफिया पर शिकंजा कसना होगा। और सबसे जरूरी, छात्रों से सीधा संवाद करना होगा। बंद कमरे में नीति बनाकर ट्वीट कर देने से काम नहीं चलेगा। छात्रों को भरोसा दिलाना होगा कि अगली परीक्षा में उनके साथ धोखा नहीं होगा।
               राजनीति में इस्तीफे कम होते हैं। ज्यादातर लोग कुर्सी से चिपके रहते हैं। इसीलिए धर्मेंद्र प्रधान का ये कदम चर्चा में है। लेकिन इसे महिमामंडन का विषय न बनाया जाए। इसे आत्मचिंतन का मौका बनाया जाए। सरकार को सोचना होगा कि एक मंत्री के इस्तीफे से समस्या खत्म नहीं होती। समस्या तब खत्म होगी जब गांव का आखिरी छात्र भी ये कह सके कि "हां, अब परीक्षा में धांधली नहीं होगी"।
                            अंत में वही बात। लोकतंत्र पर भरोसा तभी रहता है जब लोकतंत्र जवाब देता है। छात्रों ने सवाल पूछा था। प्रधान ने इस्तीफे से जवाब दिया। अब सरकार को नीतियों से जवाब देना है। वरना अगला इस्तीफा किसी और का होगा, और अगला आंदोलन और बड़ा होगा।
                        "कुर्सी गई, पर सबक सरकार को मिला है। अब देखना है सरकार उस सबक को याद रखती है या फाइल में बंद कर देती है।"

भ्रष्ट पथ पर चलते युवा: एक गंभीर सामाजिक चुनौती / Uzmataranum

 भ्रष्ट पथ पर चलते युवा: एक गंभीर सामाजिक चुनौती

भूमिका

युवा किसी भी राष्ट्र की सबसे बड़ी शक्ति और भविष्य की आशा होते हैं। उनके विचार, चरित्र और कर्म ही समाज तथा देश की दिशा निर्धारित करते हैं। किंतु वर्तमान समय में कुछ युवा भ्रष्ट मार्ग की ओर आकर्षित हो रहे हैं। यह केवल व्यक्तिगत पतन का नहीं, बल्कि पूरे समाज और राष्ट्र के भविष्य के लिए चिंता का विषय है।

मुख्य भाग

आज के दौर में सफलता को अक्सर धन और दिखावे से जोड़ा जाने लगा है। शीघ्र अमीर बनने की चाह, सामाजिक दबाव, बेरोज़गारी, नैतिक मूल्यों का ह्रास तथा गलत संगति जैसे कारण युवाओं को भ्रष्ट आचरण की ओर धकेल रहे हैं। कुछ लोग रिश्वत, धोखाधड़ी, फर्जी दस्तावेज़, ऑनलाइन ठगी और अनुचित तरीकों से सफलता प्राप्त करने का प्रयास करते हैं। उन्हें यह मार्ग आसान तो लगता है, लेकिन अंततः यह उनके व्यक्तित्व, सम्मान और भविष्य को नष्ट कर देता है।

भ्रष्टाचार का प्रभाव केवल व्यक्ति तक सीमित नहीं रहता। जब युवा गलत रास्ता अपनाते हैं, तो समाज में ईमानदारी और विश्वास कमज़ोर पड़ने लगते हैं। योग्य और मेहनती लोगों के अवसर छिन जाते हैं, न्याय व्यवस्था प्रभावित होती है और विकास की गति धीमी पड़ जाती है। इससे समाज में असमानता और निराशा का वातावरण बनता है।

इस समस्या का समाधान केवल कठोर कानूनों से संभव नहीं है। इसके लिए परिवार, विद्यालय और समाज की संयुक्त भूमिका आवश्यक है। बचपन से ही बच्चों में ईमानदारी, अनुशासन, जिम्मेदारी और नैतिक मूल्यों का विकास किया जाना चाहिए। शिक्षा का उद्देश्य केवल रोजगार प्राप्त करना नहीं, बल्कि एक जिम्मेदार और आदर्श नागरिक बनाना भी होना चाहिए। युवाओं को यह समझना होगा कि सच्ची सफलता मेहनत, प्रतिभा और ईमानदारी से प्राप्त होती है, न कि भ्रष्टाचार से।

सरकार को भी पारदर्शी व्यवस्था, रोजगार के बेहतर अवसर और भ्रष्टाचार के विरुद्ध सख्त कार्रवाई सुनिश्चित करनी चाहिए। साथ ही, समाज में ऐसे व्यक्तियों को सम्मान दिया जाना चाहिए जो कठिन परिस्थितियों में भी सत्य और ईमानदारी का मार्ग नहीं छोड़ते।

उपसंहार

भ्रष्ट पथ पर चलना क्षणिक लाभ तो दे सकता है, लेकिन यह जीवनभर की बदनामी और सामाजिक हानि का कारण बनता है। यदि युवा ईमानदारी, परिश्रम और नैतिकता को अपना आदर्श बनाएँ, तो वे न केवल अपना उज्ज्वल भविष्य बना सकते हैं, बल्कि राष्ट्र को भी प्रगति और समृद्धि के मार्ग पर अग्रसर कर सकते हैं। इसलिए प्रत्येक युवा का कर्तव्य है कि वह भ्रष्टाचार से दूर रहकर सत्य, न्याय और नैतिक मूल्यों का पालन करे।

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