Saturday, 26 September 2026

हाय! ये मुसीबत फिर लौट आई है - दीपिका पाल

हाय! ये मुसीबत फिर लौट आई है - दीपिका पाल 

UPI के चार्ज ने क्या महंगाई बढ़ाई हैं..

पहले हम तो बस UPI -UPI करते थे

अब तो पैसे निकालने पर चार्ज है इसके लिए डरते है...

देश में इन दिनों UPI चार्ज को लेकर मामला गर्म है। सरकार के ऐलान के बाद आम आदमी वर्ग से लेकर व्यापारियों में खासी नाराज़गी का माहौल है। होना भी तय है, सरकार ने 2000 रूपये के पेमेंट पर निर्धारित चार्ज लगाकर बड़ा झटका दिया है वहीं इसके पीछे एक तर्क भी दिया है। सरकार ने इस साहसी कदम को सरकारी सब्सिडी पर निर्भरता खत्म करने और देश में नवाचार को बढ़ाने का रास्ता बताया है।

जाहिर सी बात है, इस पेमेंट शुल्क से गुस्सा तो होगा ही, पहले जहां हम छोटे से बड़े खर्चे में बस फोन उठाकर UPI कर लेते थे लेकिन अब ज्यादा भुगतान का शुल्क भी देना पड़ेगा।

सरकार समय - समय पर बदलाव करती है ये तो जानते है लेकिन इस कदम से एक बात तो समझ आई है नगद पैसे पास में होना जरूरी है UPI जैसी आसान सुविधा भी धोखा दे सकती है।

अभी तो सिर्फ सरकार ने बस 2000रु के पेमेंट पर शुल्क लगाने की बात की है क्या पता आने वाले समय में नए नियम जोड़ न दे जिसका ख़ामियाजा दैनिक जीवन में उठाना पड़े।

तो अंत में एक मुहावरा याद आता है, ध्यान से सुनिएगा...

रामचंद्र कह गए सिया से, ऐसा कलयुग आएगा,

हंस चुगेगा दाना दुनका, कौवा मोती खाएगा।

यानी यहां कलयुग की बात है भाई.. जैसे UPI के आने से जनता के बीच में हाहाकार मच गया वही अब इसका अगला कदम क्या होगा और असर, ये सब सरकार के दिमाग पर निर्भर है।

दीपिका पाल 
मध्य प्रदेश 

तिरंगे की छांव - सुनीता बिश्नोई

तिरंगे की छांव - सुनीता बिश्नोई

 
तिरंगे कि छांव मुझे बहुत भाती हैं,
केसरिया में सुबह की लाली,
सफेद में माँ जैसी ठंडी छांव,हरे में खेतों की हरियाली।
 
बीच में चक्र घूमे गोल-गोल,
जैसे कहे बेटी आगे बढ़ो,
न रुकना है, न झुकना है,
बस देश का नाम रोशन करना है।
 
इस छांव में पले मेरे सपने,
इस छांव में मिली मुझे उड़ान,
जवान खड़े हैं सरहद पर,
तभी तो घर में है खुशी और सुकून।
 
तिरंगे कि छांव सबसे न्यारी,
इसी में बसा है मेरा संसार,
इसी छांव में जीना है मुझे,
इसी छांव में हैं मेरा, प्यार,
 
सुनीता बिश्नोई
जिला श्री गंगानगर (राजस्थान)
 
स्वरचित एवं मौलिक ओर अप्रकाशित हैं।।
 

मेरी कलम में बची हुई मैं - सोबिया राशिद

मेरी कलम में बची हुई मैं - सोबिया राशिद  
उत्तर  प्रदेश 

श्रेणी: नज़्म
शीर्षक: मेरी कलम में बची हुई मैं

मेरी कलम में बची हुई मैं

जब सब कुछ कहने को था,
तब शब्द कम पड़ गए थे।
और जब कहने को कुछ नहीं बचा,
तब मेरी कलम चल पड़ी।

शायद लिखना
काग़ज़ पर शब्द उतारना नहीं होता,
शायद लिखना वह रास्ता है
जिस पर चलते-चलते
इंसान एक दिन
अपने ही भीतर पहुँच जाता है।

मैंने भी कभी
बहुत यक़ीन से मोहब्बत लिखी थी—
कुछ नामों को
अपनी दुआओं में रखा,
कुछ चेहरों को
अपनी कविताओं में,
और कुछ ख़्वाबों को
इतना अपना समझ लिया
कि उनके टूटने का ख़याल भी
अजनबी लगता था।

फिर वक़्त आया।

वह किसी तूफ़ान की तरह नहीं आया था,
न उसने कोई शोर किया,
न कोई दरवाज़ा ज़ोर से बंद किया।

बस धीरे-धीरे
कुछ आवाज़ें दूर होती गईं,
कुछ लोग बदलते गए,
कुछ रिश्तों के बीच
ख़ामोशी बढ़ती गई,
और कुछ ऐसे सवाल
मेरे भीतर रह गए
जिनके जवाब
किसी के पास नहीं थे।

मैंने बहुत दिनों तक
वक़्त से नाराज़ रहना चाहा।

मुझे लगता था
उसने मुझसे बहुत कुछ छीन लिया है।

फिर एक रात
बहुत देर तक जागने के बाद
मैंने अपनी पुरानी डायरी खोली।

कुछ पन्नों पर
स्याही धुँधली थी,
कुछ पर आँसुओं के निशान थे,
और कुछ पन्ने ऐसे थे
जिन पर मैंने बहुत कुछ लिखकर भी
कुछ नहीं कहा था।

मैं उन्हें पढ़ती रही।

और पहली बार
मुझे अपने पुराने शब्दों पर
तरस नहीं आया।

मुझे अपनी ही आवाज़ सुनाई दी।

एक ऐसी लड़की की आवाज़
जो हर रिश्ते को बचाना चाहती थी,
हर दूरी को मिटाना चाहती थी,
हर ख़ामोशी का मतलब जानना चाहती थी—
और इस कोशिश में
धीरे-धीरे
ख़ुद से दूर होती जा रही थी।

उस रात
मुझे समझ आया—

कुछ लोग
हमारी ज़िंदगी में रुकने के लिए नहीं आते,
वे हमारे भीतर
एक दरवाज़ा खोलकर चले जाते हैं।

कुछ रिश्ते
पूरा होने के लिए नहीं,
हमें पूरा करने के लिए आते हैं।

और कुछ बिछड़ने
हमें किसी और से नहीं,
हमसे मिलाने आते हैं।

मैंने उस दिन
अपना दर्द मिटाया नहीं।

बस उसे
एक जगह दे दी।

काग़ज़ पर।

फिर मैंने लिखना शुरू किया।

पहले किसी के लौट आने की उम्मीद में नहीं—
बस इसलिए कि
मेरे भीतर जो कुछ जमा था,
वह साँस ले सके।

कभी एक अधूरी कविता बनी,
कभी दो पंक्तियाँ,
कभी पूरा पन्ना
सिर्फ़ ख़ामोशी से भर गया।

कई बार
मैंने लिखकर पन्ना फाड़ दिया।

कई बार
एक ही वाक्य के सामने
घंटों बैठी रही।

और कई बार
जो कहना चाहती थी,
उसके लिए शब्द ही नहीं मिले।

तब जाना—
हर भावना को
नाम देना ज़रूरी नहीं होता।

कुछ दर्द
बस महसूस किए जाते हैं।

कुछ रिश्ते
बस याद किए जाते हैं।

और कुछ अध्याय
बस बंद कर दिए जाते हैं।

वक़्त ने मुझे
सब कुछ वापस नहीं दिया।

उसने मुझे
वह इंसान भी वापस नहीं दिया
जिसे मैं खो चुकी थी।

उसने कोई बीता हुआ दिन
मेरे लिए नहीं रोका।

लेकिन उसने एक और चीज़ दी—

नज़र।

चीज़ों को
पहले जैसा नहीं,
थोड़ा गहरा देखने की नज़र।

अब मैं जानती हूँ
कि हर ख़ामोशी नाराज़गी नहीं होती,
हर दूरी बेवफ़ाई नहीं होती,
हर अंत हार नहीं होता
और हर अधूरापन
अर्थहीन नहीं होता।

कुछ अधूरी चीज़ें
हमारे भीतर
पूरी उम्र बोलती रहती हैं।

शायद इसीलिए
मेरी कविताओं में
आज भी मोहब्बत है।

मगर अब मोहब्बत के साथ
उसकी परछाईं भी है।

अब मैं सिर्फ़
किसी के आने की कहानी नहीं लिखती,
उसके जाने के बाद
बची हुई ख़ामोशी भी लिखती हूँ।

मैं सिर्फ़
इंतज़ार नहीं लिखती,
उस दिन को भी लिखती हूँ
जब इंसान
इंतज़ार करना छोड़कर
खिड़की खोल देता है।

मैं सिर्फ़
टूटना नहीं लिखती,
उन हाथों को भी लिखती हूँ
जो बिखरे हुए टुकड़ों को
धीरे-धीरे समेटना सीखते हैं।

और शायद
वही हाथ मेरे थे।

आज जब मैं पीछे मुड़कर देखती हूँ,
तो लगता है—
मैं जितनी बार टूटी,
उतनी बार लिखी गई।

हर चोट ने
मेरी भाषा में एक शब्द जोड़ा।

हर विदाई ने
एक विराम।

हर इंतज़ार ने
एक गहरी साँस।

और हर बार
जब मुझे लगा कि
मेरी कहानी यहीं ख़त्म हो गई,
मेरी कलम ने
अगला पन्ना खोल दिया।

अब मेरी कलम
किसी को पाने के लिए नहीं लिखती।

किसी को भूलने के लिए भी नहीं।

वह बस उन बातों को
जगह देती है
जो बोलते-बोलते
हमारे भीतर रह जाती हैं।

उन आँखों को
जिन्होंने रोना छुपाकर
मुस्कुराना सीखा।

उन लोगों को
जो सबके लिए मज़बूत रहे
और रात में
चुपचाप अपने तकिए से
कमज़ोर होने की इजाज़त माँगते रहे।

उन दिलों को
जो किसी के जाने के बाद
यह सोचते रहे—

“क्या मेरे भीतर अब भी
कुछ बचा है?”

हाँ।

बहुत कुछ बचा है।

एक सुबह बची है।

एक अधूरी कविता बची है।

एक ख़ाली पन्ना बचा है।

एक ऐसी हँसी बची है
जो अभी लौटनी बाकी है।

और सबसे बढ़कर—

ख़ुद से मिलने की
एक और कोशिश बची है।

मेरे लिए लिखना
यही कोशिश है।

जब दुनिया ने पूछा—
“तुम्हें क्या मिला?”

मेरी कलम ने पूछा—
“तुमने ख़ुद को कितना समझा?”

जब लोगों ने मेरी कहानी में
मोहब्बत ढूँढ़ी,
मुझे उसमें अपना सफ़र मिला।

जब किसी ने मेरे शब्दों में
बिछड़ना पढ़ा,
मैंने उनमें लौटना पढ़ा।

और जब किसी ने कहा—
“ये तो मेरी कहानी है,”
तब मुझे पहली बार लगा
कि शायद लेखक होना
अपनी कहानी कहना भर नहीं है।

शायद लेखक होना
अपने भीतर की सच्चाई को
इतनी ईमानदारी से लिख देना है
कि कोई अनजान इंसान भी
उसमें अपना चेहरा देख सके।

आज मेरी पहचान
किसी नाम से बड़ी नहीं,
किसी रिश्ते से छोटी नहीं।

मेरी पहचान
उन शब्दों में है
जिन्हें मैंने अपने हिस्से की ख़ामोशी से जन्म दिया।

मैंने वक़्त को लिखा,
तो उसने मुझे धैर्य दिया।

मैंने दर्द को लिखा,
तो उसने मुझे संवेदना दी।

मैंने मोहब्बत को लिखा,
तो उसने मुझे ख़ुद से मिलना सिखाया।

और मैंने ख़ुद को लिखा—
तो जाना,

जिसे मैं इतने वर्षों से
दुनिया में ढूँढ़ रही थी,
वह कहीं गया ही नहीं था।

वह यहीं था—

मेरी आवाज़ में,
मेरी ख़ामोशी में,
मेरी अधूरी पंक्तियों में,
मेरी उस कलम में
जिसे मैंने जाने कितनी बार
रख देना चाहा,
मगर हर बार
उठा लिया।

इसलिए आज
मैं अपनी कलम से
कोई वादा नहीं करती।

बस उसे चलने देती हूँ।

कभी मोहब्बत की तरफ़,
कभी वक़्त की तरफ़,
कभी दर्द की तरफ़,
और कभी
सीधे अपने भीतर।

क्योंकि अब मैं जानती हूँ—

कुछ कहानियाँ
किसी और के लौटने पर पूरी नहीं होतीं।

वे उस दिन पूरी होती हैं
जब हम ख़ुद से
दोबारा मिलते हैं।

और मेरी कहानी भी
शायद वहीं से शुरू हुई थी—

जहाँ मुझे लगा था
कि सब ख़त्म हो गया।

मैंने उस ख़ामोशी को
एक पन्ना दिया।

पन्ने को शब्द।

शब्दों को आवाज़।

और आवाज़ ने
मुझे मेरी पहचान लौटा दी।

अब मेरी कलम में
बहुत-सी कहानियाँ हैं—

कुछ मेरी,
कुछ तुम्हारी,
कुछ उन लोगों की
जिनसे मैं कभी मिली भी नहीं।

लेकिन उन सबके बीच
एक चीज़ हमेशा रहेगी—

मैं।

वह मैं
जो बहुत कुछ खोकर भी बची रही।

वह मैं
जिसने रोते हुए भी लिखा।

वह मैं
जिसने टूटकर भी
शब्दों को टूटने नहीं दिया।

और शायद
एक लेखक की सबसे सच्ची पहचान
यही होती है—

कि वह अपने बिखरे हुए हिस्सों को
स्याही में मिला दे,

और फिर
जब कोई दूसरा
उसकी रचना पढ़े,

तो उसे
अपने भीतर का कोई खोया हुआ हिस्सा
वापस मिल जाए।

मैंने बहुत कुछ लिखा है।
मगर सच यह है—
हर बार जब मेरी कलम चली,
उसने किसी और की कहानी नहीं,
मुझे ही थोड़ा-थोड़ा लिखा।

यही मेरी कलम है।
यही मेरी आवाज़ है।
और जो कुछ मेरी कलम में बचा रह गया—
वही मेरी पहचान है।

नीरव नभ में चाँद खिला - निवेदिता शुक्ला

नीरव नभ में चाँद खिला -  निवेदिता शुक्ला

नीरव नभ में चाँद खिला 
झरती रजनी उजियारी ,
वन पथ पर चुपचाप चली 
जैसे सपनों की सुकुमारी ।

मंद पवन ने चुरा लिया 
फूलों के अधरों का मधुर गान ,
ओस कणों में मुस्काया फिर 
भोर का कोमल अरुणिम प्राण ।

दूर क्षितिज के पार कहीं 
मन का दीपक जलता है,
अनजाने किसी मधुर मिलन को 
हृदय निरंतर चलता है।

कौन पुकारे नीरवता में 
ये कौन छुए मन के सुप्त तार ,
चांँद उतर कर पूछ रहा 
किसका है ये मधुर इंतज़ार?

निवेदिता शुक्ला
इटावा, उत्तर प्रदेश

Monday, 21 September 2026

आशीर्वाद : जीवन की अमूल्य पूँजी - उज़मा तरन्नुम

आशीर्वाद : जीवन की अमूल्य पूँजी - उज़मा तरन्नुम

भारतीय संस्कृति में आशीर्वाद का विशेष महत्व है। यह केवल कुछ शुभ शब्दों का उच्चारण नहीं, बल्कि किसी व्यक्ति के प्रति प्रेम, स्नेह, शुभकामना और मंगलभावना की अभिव्यक्ति है। हमारे संस्कारों में बड़ों के चरण स्पर्श करके उनका आशीर्वाद लेना सम्मान और विनम्रता का प्रतीक माना जाता है। माता-पिता, गुरुजनों और बुजुर्गों का आशीर्वाद व्यक्ति के जीवन में आत्मविश्वास और सकारात्मक ऊर्जा का संचार करता है।

आशीर्वाद का सबसे सुंदर रूप हमें माता-पिता के स्नेह में देखने को मिलता है। माता-पिता अपने बच्चों की सफलता, सुख और उज्ज्वल भविष्य की कामना करते हैं। उनके मुख से निकले हुए शुभ शब्द बच्चे के लिए प्रेरणा बन जाते हैं। जीवन में जब कठिन परिस्थितियाँ आती हैं, तब यही आशीर्वाद व्यक्ति को आगे बढ़ने का साहस देता है। इसलिए कहा जाता है कि माता-पिता का आशीर्वाद जीवन की सबसे बड़ी संपत्ति है।

भारतीय परंपरा में गुरु का आशीर्वाद भी अत्यंत महत्वपूर्ण माना गया है। गुरु केवल ज्ञान ही नहीं देते, बल्कि जीवन को सही दिशा भी प्रदान करते हैं। विद्यार्थी जब गुरु का आशीर्वाद प्राप्त करता है, तो उसमें अपने लक्ष्य को प्राप्त करने का विश्वास मजबूत होता है। गुरु का आशीर्वाद ज्ञान, अनुशासन और संस्कारों के मार्ग पर चलने की प्रेरणा देता है।

आशीर्वाद का संबंध केवल बड़ों से ही नहीं है। जब हम किसी छोटे या अपने प्रिय व्यक्ति को सफलता, सुख और अच्छे भविष्य की शुभकामना देते हैं, तब वह भी आशीर्वाद का ही एक रूप है। सच्चे आशीर्वाद में किसी स्वार्थ की भावना नहीं होती। इसमें केवल दूसरे के कल्याण की कामना निहित रहती है।

आज के आधुनिक और व्यस्त जीवन में पारिवारिक संबंधों में दूरी बढ़ती जा रही है। ऐसे समय में आशीर्वाद जैसी परंपराएँ हमें अपनी संस्कृति और मूल्यों से जोड़ती हैं। यह हमें सिखाता है कि जीवन में ज्ञान, सफलता और धन के साथ-साथ प्रेम, सम्मान और संस्कार भी आवश्यक हैं।

अंततः कहा जा सकता है कि आशीर्वाद जीवन की वह अमूल्य पूँजी है, जो दिखाई नहीं देती, लेकिन व्यक्ति को भीतर से मजबूत बनाती है। बड़ों का आशीर्वाद हमें कठिनाइयों से लड़ने की शक्ति देता है और हमारे जीवन-पथ को आशा तथा विश्वास से भर देता है। इसलिए हमें सदैव अपने माता-पिता, गुरुजनों और बुजुर्गों का सम्मान करना चाहिए और उनका आशीर्वाद प्राप्त करना चाहिए।

Uzma taranum
Karnataka