रक्त से नहीं, करुणा से होता है धर्म”
क़ुर्बान कहो, या कह लो बली,
क्या ईश्वर माँगें रक्त की कली?
क्या पूजा का पावन आँगन,
निर्दोषों के क्रंदन से हो वंदन?
जीव सभी तो प्राणधारी हैं,
धरती माँ की संतति प्यारी हैं।
यज्ञ, हवन, आहुति, अर्पण,
थे त्याग, दया, संयम के दर्पण।
पर मानव ने अर्थ बदल डाला,
करुणा का दीप स्वयं ही बुझा डाला।
ईद-उल-ज़ुहा का संदेश महान,
था लोभ, अहंकार का बलिदान।
कहाँ लिखा है पावन क़ुरान में,
निर्बल काँपे तेरे सम्मान में?
ईश्वर तो बस नीयत देखे,
किसके अंतर प्रेम सहेजे।
मौन खड़ा वह बछड़ा रोता,
ममता का आँचल खोजता होता।
“मुझे छोड़ दो हे मानव भाई,
मैंने किसका अपराध कमाई?”
काँप रही थीं उसकी आँखें,
टूट रही थीं जीवन शाखें।
करुण पुकारें नभ तक जातीं,
पत्थर आत्माएँ भी भरमातीं।
आदि मानव वनवासी था,
अज्ञान, अभाव का वासी था।
पर अब तो विज्ञान खड़ा है,
हर थाली में अन्न बड़ा है।
फिर क्यों मासूमों की गर्दन पर,
धर्म टिका है तलवारों पर?
क्या दया इतनी दुर्बल हो गई,
मानवता ही घायल हो गई?
पशुओं से ही वन जीवित हैं,
धरती के श्वास सुरक्षित हैं।
इनकी कमी से सूखेंगे वन,
रोएँगे नद, पर्वत, उपवन।
बलिदान वही जो स्वार्थ जलाए,
मन का पशु मानव से हटाए।
जो आँसू पोछे, प्राण बचाए,
वही खुदा के निकट कहलाए।
आओ ऐसी पूजा करें,
जहाँ किसी की चीख न भरें।
मंदिर, मस्जिद, गिरिजा, धाम—
सबसे ऊँचा हो “जीवों का प्राण”॥
डॉ। वै। कस्तूरी बाई
बेंगलूरु
कर्नाटक
Dr. Pro. Y. Kasturi Bai
Bengaluru
Karnataka
#HamariVani #हमारीवाणी #SaraSach #सारासच #writer #लेखक #Kavita #कविता #Sahitye #साहित्य #Poetry #काव्य

.jpg)


.jpg)