परिवर्तन - डॉ० उषा पाण्डेय 'शुभांगी'
इस जग में कुछ भी स्थाई नहीं है, परिवर्तन होता रहता है।
परिवर्तन जरूरी है मानव के विकास के लिए, हर व्यक्ति यह कहता है।
'परिवर्तन संसार का नियम है' भगवान श्री कृष्ण ने भागवत गीता में बताया।
जिसने परिवर्तन को स्वीकार कर आगे बढ़ा, वही जीवन में सफलता पाया।
परिवर्तन अपरिहार्य है, जो उत्पन्न होता है उसका अंत भी होता है।
मौसम बदलता है, तभी तो किसान मौसम के अनुसार बीज बोता है।
ऋतु परिवर्तन होता है, नये फूल खिलते हैं।
बीज अंकुरित होते, पौधों से हमें फल मिलते हैं।
परिस्थितियाँ बदलती हैंं, अपना नजरिया भी भी बदलना होगा।
बेहतर जिंदगी के लिए, बदलाव स्वीकार करना होगा।
याद रखिए हर परिवर्तन का अपना महत्व होता है।
मनुष्य खुद को लचीला रखता, उसका जीवन आनंदित होता है।
उम्र के साथ शरीर में बदलाव आता है।
शिशु किशोर होता, फिर वृद्धावस्था की ओर जाता है।
परिवर्तन जिंदगी में आएगी, हमें उसके अनुसार खुद को तैयार करना होगा।
हर परिवर्तन हमारे मन के अनुसार नहीं होता, यह याद रखना होगा।
परिवर्तन जीवन की एकरसता को तोड़ता है, नया उमंग लाता है।
जो परिवर्तन स्वीकार नहीं करता, वह जिंदगी के दौड़ में पीछे रह जाता है।
दिन और रात बदलते हैं, रात में शशि नभ में दिखते, दिन में सूर्य दिखते हैं।
पृथ्वी के अंदर कुछ परिवर्तन के कारण, ज्वालामुखी फटते हैं।
सुख के बाद दुख और दुख के बाद सुख, एक चक्र की तरह चलता है।
परिवर्तन से हम नई तकनीक पातें, कार्य क्षमता बढ़ता है।
अनुभव के अनुसार, हमारे विचार बदलते हैं।
वातावरण के अनुसार,
हम बदलाव स्वीकार करते हैं।
परिवर्तन स्वीकार करो बंधु,
आनंद की आंधी बहेगी।
आंतरिक खुशी मिलेगी,
जीवन की बगिया महकेगी।
डॉ० उषा पाण्डेय 'शुभांगी'
स्वरचित
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