Thursday, 27 August 2026

आदेश / उषा पांडे शुभांगी

 आदेश / उषा पांडे शुभांगी

( दोहे )


चलो सत्य के मार्ग पर, मानो पितु आदेश।
कृपा करेंगे देवता, मिट जाएगा क्लेश।।

जग के पालक तीन हैं, ब्रह्मा विष्णु महेश।
वेदों के हर वाक्य को, मानो तुम आदेश।।

गुरु जी देते ज्ञान हैं, दो उनको सम्मान।
देते वे आदेश जो, 
देना उस पर ध्यान।।

दशरथ नंदन राम ने, माना गुरु आदेश। 
सबका तुम इज्जत करो,
दिया हमें संदेश।।

 माता की हर बात को, मानो तुम आदेश।
विजयी होंगे तुम सदा, करें भला सर्वेश।।

करो नहीं अवहेलना, जो माँ  दे आदेश।
मात-पिता सेवा करो, दें आशीष गणेश।।

कष्ट बड़ों को जो दिया, मान
नहीं आदेश। 
भला नहीं उसका हुआ, कहते हैं शैलेश।।

नहीं फैसला लो कभी, जब आवे आवेश।
शांत चित्त आगे बढ़ो, रहे साथ देवेश।।

गौरा जी ने तप किया,  मिले उन्हें महेश।
माना जो आदेश प्रभु, कृपा किये योगेश।।

हरिश्चंद्र ने त्याग दी, सब ऐशो आराम।
माने हर आदेश ऋषि, लिए ईश
निज धाम।।

रहना माता संग ही, जाना नहीं विदेश। 
मान मात आदेश तुम, करना सदा निवेश।।

वेदों का है सार यह, मानो गुरु आदेश। 
पूरे होंगे काम तव, दया करें अखिलेश।।

डॉ० उषा पांडे शुभांगी 
स्वरचित
वैस्ट बंगाल 

राजनीति / संजय वर्मा

 राजनीति / संजय वर्मा

ओ ऊपर वाले

बंद करवाओ ये मुफ्त की रेवड़ी बाटने की राजनीति

ये सहायता गरीबपन को दर्शाती

देश-विदेश में छवि पिछड़ापन लाती है।

राजनीति मुफ्त का माल देती

कर वृद्धि  से बह जाती गरीब की नाव

उत्पादन कोख उजाड़ती जाती राजनीति

इसमें उलझने आए भूखे मरने की नोबत आती

राजनीति मेहनती इन्सान को आलसी बनाती

इससे ही से तो विकास की गाड़ी पिछड़ जाती

खुद और सरकारों को कर्ज में दफ़नाती है।

अर्थव्यवस्था में सुधार के सपने देखना हो तो

मुफ्तखोरी की राजनीति बंद करो

मुपतखोरी की लत लग जाए तो

विकास पर लग जायेगा जंग

कल्याणकारी योजनाएं तमाशा देख कर

राजनीति के संग हो जाएगी दंग।

संजय वर्मा "दृष्टि"

राजनीति / गोरक्ष जाधव

 राजनीति / गोरक्ष जाधव


कहीं तोड़ कहीं जोड़,
गठबंधन है लालच का,
नेता लगे भले अपने,
जिम्मेदार बुरी हालत का।

वादे पे वादे इनके खूनी इरादे,
गठजोड़ है शैतानों का,
वोट की करे राजनीति,
देशभक्ति मुद्दा चुनाव का।

नौटंकी कर चुनकर आए,
परमभक्त बने जनता का,
विनम्रता का बनकर पुतला,
पैसा लुटे फिर जनता का।

सत्ता की बड़ी लालसा,
षड़यंत्र रचे बग़ावत का,
पद की चाह में निरंतर,
शक्ति प्रदर्शन चेलों का।

वादों को सारे भूल जाएं,
यह पैंतरा है बेशर्मों का,
पाँच साल बाद ही देखे,
मुख जनता की हाल का।

कहीं तोड़ कहीं जोड़,
गठबंधन है लालच का।
नेता लगे भले अपने,
जिम्मेदार बुरी हालत का।

गोरक्ष जाधव©®
मंगळवेढा,महाराष्ट्र.

स्वास्थ्य / अनन्तराम चौबे

 राष्ट्रीय हिन्दी साहित्य मंच हमारी वाणी 

साप्ताहिक प्रतियोगिता हेतु 
विषय ...स्वास्थ्य 
दिनांक... 30/6/2026
नाम.. महाकवि डा अनन्तराम चौबे अनन्त जबलपुर 
कविता...

स्वास्थ्य 

स्वास्थ्य शरीर निरोगी काया 
स्वास्थ्य शरीर जीवन आधार ।
सुख शांति परिवार  में होगी 
स्वास्थ्य सुखी रहेगा घर परिवार ।

ईश्वर ने सभी का शरीर बनाया 
शरीर में अंग बहुत होते हैं  ।
हाथ पैर  नाक आंख कान 
और भी अंग शरीर में होते हैं ।

पुरुष और महिला के शरीर भी 
कुछ अंग अलग अलग होते हैं ।
अलग अंगों की पहचान से ही
महिला पुरुष अलग होते हैं ।

शरीर का कोई अंग दुखता है
दैनिक कार्य मुश्किल होता है।
पैरों के घुटनों में जब दर्द होता है
बहुत ही मुश्किल हो जाता है ।

स्वास्थ्य शरीर पावन धाम है
तन मन भी सुखमय रहता है ।
जीवन में सुख चैन जब रहता
पावन धाम सा बन जाता  है ।

मन प्रसन्न निरोगी काया हो
स्वास्थ्य जरूरी है आधार ।
सुख शांति और भाईचारे से
भरा पूरा हर घर परिवार  ।

तन मन स्वास्थ्य रहेगा जब 
सुखी जीवन भी रहेगा उसका ।
आपस में जो मिलकर रहेगा
निरोगी जीवन होगा उसका ।

सारा सच काम क्रोध मोह माया 
का लालच जब मन में रहता है ।
सारा सच मन अशांत हो जाता है
स्वास्थ्य पर असर भी पड़ता है ।

शारीरिक मेहनत जो नही करता
शरीर शिथिल भी हो जाता है ।
सारा सच शरीर दुर्बल रहता है
मेहनत का काम नही होता है ।

स्वास्थ्य जरूरी पावन धाम है 
शारीरिक मेहनत करना होगा ।
काम नही कुछ करना है तो
सुबह शाम घूमना जरूरी होगा।

घर के आसपास में हमेशा
स्वच्छता, सफाई जरूरी है ।
शुद्ध हवा स्वास्थ्य के लिए 
सभी के लिए भी जरूरी है ।

घर के आसपास पेड़ पौधे हों
जो स्वास्थ्य के लिए जरूरी हैं।
सारा सच शरीर स्वास्थ्य रखने 
में शुद्ध पर्यावरण भी जरूरी है।

जहां रहो साफ सफाई से रहना 
वातावरण भी शुद्ध साफ रहेगा।
प्रदूषण भी आसपास नही रहेगा 
सभी का स्वास्थ्य भी ठीक रहेगा 

स्वास्थ्य शरीर सुखी जीवन
सुख शांति का आधार है ।
स्वास्थ्य जरूरी रहेगा तभी 
तो सुखी होगा घर परिवार है ।

 महाकवि डा अनन्तराम चौबे अनन्त
    जबलपुर म प्र /8265/
लंदन. यू एस ए. गिनीज वर्ल्ड रिकॉर्ड 

आज़ाद हिन्द - एक गीत / ललित कुमार शर्मा

आज़ाद  हिन्द - एक गीत / ललित कुमार शर्मा


देश की खातिर जब वीरों ने अपना सर्वस्व लुटाया था
तब जाकर भारत माँ  ने आज़ाद  हिन्द  ये पाया था

पहले मुगलों  ने मिलकर हम सब पर अत्याचार किए 
फ़िर अंग्रेज़ो ने कर गुलाम छीन सब अधिकार लिए 
फूट डाल और  राज करो इक ये ही ध्येय अपनाया था
देश की खातिर जब वीरों ने अपना सर्वस्व लुटाया था
तब जाकर भारत माँ  ने आज़ाद  हिन्द  ये पाया था

देकर  लालच भाई को अपने भाई से  ही लड़वाते थे
लड़वाकर आपस में हमको हर प्रांत यहाँ हथियाने थे
धीरे धीरे फिर भारत पर कुछ यूँ अधिकार जमाया था
देश की खातिर जब वीरों ने अपना सर्वस्व लुटाया था
तब जाकर भारत माँ  ने आज़ाद  हिन्द  ये पाया था

1857 में पहला आज़ादी उदघोष हुआ
कारतूसों में चर्बी से सेना में भारी रोष हुआ
विद्रोही कह मंगल पांडे को फिर फाँसी लटकाया था
देश की खातिर जब वीरों ने अपना सर्वस्व लुटाया था
तब जाकर भारत माँ  ने आज़ाद  हिन्द  ये पाया था


फ़िर तो जैसे हर दिल ने बस एक ही था पैगाम दिया
आज़ादी है अधिकार हमारा सबने नारे का नाम दिया
देश के कोने कोने में फिर यही आंदोलन अपनाया था
देश की खातिर जब वीरों ने अपना सर्वस्व लुटाया था
तब जाकर भारत माँ  ने आज़ाद  हिन्द  ये पाया था

जन जन का फिर जोश देख अंग्रेज़ी शासक घबराए थे 
विद्रोही स्वर उठते ही खूब लाठी डंडे चलाए थे
जबरन बंदी बना सबको, जेलों में पहुँचाया था
देश की खातिर जब वीरों ने अपना सर्वस्व लुटाया था
तब जाकर भारत माँ  ने आज़ाद  हिन्द  ये पाया था

एक तरफ गाँधी अहिंसा से लड़ने को बोला करते थे
दूजे थे वो क्रांतिवीर जो जान हथेली पे रखते  थे
कुचलने आवाज़ सभी की सत्ता ने हर रस्ता अपनाया था 
देश की खातिर जब वीरों ने अपना सर्वस्व लुटाया था
तब जाकर भारत माँ  ने आज़ाद  हिन्द  ये पाया था

भगत, सुखदेव और  राजगुरु सब फांसी पे झूल गए 
करने आज़ाद भारत माँ को , अपनी माँ को भूल गए 
जान दे आज़ाद ने अपनी आज़ादी का अलख जगाया था
देश की खातिर जब वीरों ने अपना सर्वस्व लुटाया था
तब जाकर भारत माँ  ने आज़ाद  हिन्द  ये पाया था

लेने को स्वराज सुभाष ने आज़ाद हिन्द फौज बनाई थी
आज़ादी  की भीषण अग्नि ने ब्रिटिश सत्ता जलाई थी
जन जन के संघर्षों ने यह देश आज़ाद कराया था
देश की खातिर जब वीरों ने अपना सर्वस्व लुटाया था
तब जाकर भारत माँ  ने आज़ाद  हिन्द  ये पाया था

आओ हम सब उन वीरों को हाथ जोड़कर याद करें
देश का स्वर्णिम काल लौटा, नव जीवन आबाद करें
जाति,भाषा,धर्म भूलकर,जिस भारत का स्वप्न सजाया था
देश की खातिर जब वीरों ने अपना सर्वस्व लुटाया था
तब जाकर भारत माँ  ने आज़ाद  हिन्द  ये पाया था

स्वरचित एवं मौलिक रचना 
ललित कुमार 
नई दिल्ली