Saturday, 22 August 2026

वीरगाथा आज़ादी की / डॉमनीषा नाडगौडा

वीरगाथा आज़ादी की / डॉमनीषा नाडगौडा

गाथा बलिदान की भारत के विरोंकी
याद दिलाती है भारत के आजादी की
खून बहाँ जो होली लाल रंग की
जुबाँ पर आज भी महक उस मिटटी की
क़ुरबानी इनकी स्वतंत्रता देश की
किस तरह के दिन थे वो वीर रस से भरे
हर एक के जुबाँ पर नारा था जय भारती का
दि क़ुरबानी हर एक ने किसी न किसी रूप में
किसान कोई जवान कोई था आम नागरिक
हर हिंदुस्थानी में देखा रूप वीर का
गाथा लाल बाल की भगतसिंग राज गुरु की
गांधी नेहरू सावरकर के साहस की
रानी लक्ष्मी बाई रानी चन्नमा के साहस की
ऋणी देश उन विरंगनाओंकी वीरता पर
निछावर भारत पर जान जिनकी
आज भी याद कर  रोमांचित होता कण कण
रखो आबाद इस देश को हे वीर जवानों
विकास की ओर बढ़े हरपल भारत हरदम
आतंकवाद पर विजय पाकर बने विश्वगुरु 
आत्म निर्भर बनें भारत, मिल जुलकर रहे सब रहे सब
लागे याद कर बलिदान इनका
विकास की ओर एक कदम सबका

डॉमनीषा नाडगौडा
Karnataka 

आज़ादी का स्वाभिमान / डॉ अनुपमा वर्मा

 आज़ादी का स्वाभिमान / डॉ अनुपमा वर्मा

तिरंगे की शान में, भारत की पहचान में,
बसता है हिंदुस्तान हमारे अभिमान में।
जो मिली है हमें आज़ादी बलिदानों के बाद,
उसकी कीमत समझें, रखें दिल में याद।

नमन उन वीरों को, जिन्होंने हँसकर प्राण दिए,
मिट्टी की खातिर अपने अरमान दिए।
किसी ने सत्याग्रह किया, किसी ने संघर्ष किया,
किसी ने हँसते-हँसते मातृभूमि पर सर्वस्व दिया।

स्वराज का सपना था, स्वाभिमान की पुकार,
हर भारतीय के मन में था स्वतंत्रता का विचार।
बेड़ियाँ टूटीं तो सूरज नया निकला,
भारत का भाग्य फिर अपने हाथों में दिखा।

आज़ादी केवल पर्व नहीं, जिम्मेदारी भी है,
देश के प्रति हमारी एक वफादारी भी है।
नफरत की दीवारें तोड़ें, प्रेम का दीप जलाएँ,
मिलकर अपने भारत को और महान बनाएँ।

न हो भेद भाषा का, न जाति का अभिमान,
हर दिल में बस जाए भारत माँ का सम्मान।
मेहनत को पूजा मानें, सत्य को आधार बनाएँ,
अपने कर्मों से तिरंगे की शान बढ़ाएँ।

आओ स्वतंत्रता दिवस पर यह संकल्प दोहराएँ,
भारत की एकता और अखंडता को सदा निभाएँ।
आजादी की लौ कभी न होने दें कम,
भारत माता की जय से गूँज उठे हर कदम! 🇮🇳

जय हिंद! 🇮🇳
डॉ अनुपमा वर्मा "हेमा "
Punjab 

Friday, 21 August 2026

ज़रिया / डॉ मेजर मंजु चावला

 कद्र करो आज़ादी की

आज के युवाओं के प्रश्न 

देश ने हमको दिया ही क्या है, हम क्यों देश की सोचें 
 हर तरफ तो चोर भरे हैं, हम क्यों देश की सोचें

देशभक्त गुरु का जवाब

आखिर तुम सब लोग , ऐसा क्यों करते हो,
फ़र्ज़ निभाने की नहीं, हक की बातें करते हो,
भगत सिंह अच्छा लगता है, पर अपने घर पर नहीं
ईमानदारी हमें चाहिए, पर अपने मन में नहीं 
ऐसी सोच ही वजह थी, पहले भी गुलामी की
दिल की खुलकर कह रहे हो, कद्र करो आजादी की
भारत माता हाथ जोड़कर, पैर पकड़ कर मांगती 
अपने ही बच्चों से अपनी , इज्ज़त की रक्षा चाहती 
क्यों काटते हो बांटते हो, मत भूलो मां हूं तुम्हारी 
मैं क्यों करूं ,वो करे , इक दूजे पर डालते जिम्मेवारी
खुश नसीब हूं, आज सबसे अधिक मेरी युवाशक्ति है
याद रखो तुम सबकी तरक्की में ही मेरी तरक्की है
तुम्हारे ही कंधों पर तो मेरा मान टिका है
ऐसे बच्चे बनके रहना, जिसका न ईमान बिका है
आत्मनिर्भर बनकर तुम, विदेशों को दिखला दो
अपने उज्ज्वल विचारों से चारों दिशा महका दो
एक कमजोर होने लगे तो दूजा साहस दे
देश की इज्ज़त हमारी इज्ज़त ऐसा समझा दे
गर्म दल या नर्म दल तरीका कोई भी अपनाओ
मिलकर काम करके देश को दुश्मन से बचाओ 
मेरी मानो बड़े होकर चाहे कुछ भी बनना 
देश प्रेम के रंग से ही जीवन को भरना
जय हिंद
जय भारत मां 

           डॉ मेजर मंजु चावला ' ज़रिया '
Chandigarh 

Wednesday, 19 August 2026

शरीर / अनीता चमोली

 शरीर / अनीता चमोली

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हमारा शरीर ईश्वर निर्मित प्रकृति का उपहार है।
जो मिलता है हमे हमारे माता पिता से। 
जिसका धर्म से कोई लेना देना नहीं l
फिर हम क्यो बट गये हिंदू मुस्लिम सिख ईसाई मे।
जब ये जमीं बनी तो धर्म नही था  बस एक दिल था शरीर मे
जो धडकता रहा होगा हर एक के लिये क्योंकि उसमे जिंदा रही होगी इंसानियत।
आज न इंसानियत है न धर्म का ज्ञान।
बस एक शरीर है जिसने जहाँ जन्म लिया वो उसी धर्म का हो गया। 
जबकि उसे ज्ञात ही नही धर्म रूपी इंसानियत का।
बन रहे है धार्मिक चल रहे है बिना कुछ जाने उसके नियमों को 
और लड रहे है आपस मे क्योंकि शरीर पाया है सबने अपने अपने धर्म मे।
आधुनिक संस्कार विहीन समाज मे आज धर्म की पहचान सिर्फ शरीर है सिर्फ शरीर।
     अनीता चमोली "अनू"
      देहरादून (उत्तराखंड)
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आत्मा / संजय वर्मा

आत्मा / संजय वर्मा

मौत को देखा है सिसकते हुए 
देखा है वटवृक्ष को निढाल होते हुए 
जिसकी छत्र छाया में पनपे सभी 
उनके लिए आँसू बह निकले 
एक- एक आंसूं है उनकी यादों के 
वो उनकी हर बातों को कह निकले 
कुछ तो बात होगी उनमें जो
हर उम्मीद पर वो खरे उतरे 
जब -जब भी परखा सबने 
साहित्य के कवि  का न रहना 
परख की बेबसी अब सब के सामने 
खड़ी है पोखरण की तरह 
चाहत है  आत्मा बन जाए वैसा रूप 
ऊपर वाला क्या बना सकेगा 
वैसा ही स्वरूप जो निर्णय ले सके 
दुनिया को हिलाने का 
समझ सके हर एक की बातें 
शायद, एक स्वप्न था भारत का 
मृत्यु भी तो अटल सत्य है 
मगर आत्मा अजर अमर 
वो है देश के आसपास।


संजय वर्मा "दृष्टि '
मनावर (धार )मप्र