Friday, 28 August 2026

आज के युग की सच्चाई / Neha

आज के युग की सच्चाई / Neha 

आज के युग की यही है सच्चाई,
तुम कौन हो भाई ?
जब तक स्वार्थ है, तब तक अपनापन,
फिर चेहरे पर नकली भाईचारा और  दिखावटी अपनापन।

तुम अच्छे हो तब तक ही,
जब तक मेरी कमियाँ तुमने छिपाई,
सच कहा तो रुठ गए सब,
झूठ बोलो तो सब मुस्कुराई।

रिश्ते अब नाप-तोल में बँटते हैं,
सच्चाई सुनकर सब तिलमिलाते हैं,
जो आईना दिखाए, वो दुश्मन कहलाए,
जो झूठ सजाए, वही दोस्त कहाए।

मतलब की डोर से बँधे हैं रिश्ते,
सच्चाई का वजन अब कौन उठाए?
आज का जमाना चाहता है चापलूसी,
सच्चे शब्दों से तो सब कतराए।

Neha 
Delhi 

राजनीति: नेता व जनता कैसे हों / डा मंजु चावला

 राजनीति: नेता व जनता कैसे हों / डा मंजु चावला

हमारे नेता कैसे हों, ऐसे हों या वैसे हों,
देश का भला समझें जो, मेरे ख्याल से वैसे हों ।

दूसरे को नीचा दिखाना , ही ना जिनका मकसद हो,
सुनने की खूब क्षमता, पर बोलने की कुछ हद हो,
वही कहें कि देश का नाम , हो दुनिया में रोशन, ऐसे हों,
देश का भला समझें जो, मेरे ख्याल से वैसे हों ।

सबकी ख्वाहिश पूरा करना, किसी के लिए भी मुश्किल है,
मूल ज़रूरतें पूरी हो जाएं, इतना करना मुमकिन है,
कोशिश करके ज्यादा से ज्यादा, जनता को समझें , ऐसे हों,
देश का भला समझें जो, मेरे ख्याल से वैसे हों।

रोटी, कपड़ा, मकान, शिक्षा , सेहत, यात्रा रोज़गार मिले,
जनता अपने नेता का, चुनाव सोच समझ के करे,
काबिलियत  ईमानदारी हो, ना मांगो फ्री के पैसे हों,
देश का भला समझें जो, सब नेता जनता ऐसे हों,

चाणक्य जैसी सूझ बूझ से राजनीति स्वच्छ करें, ऐसे हों,
कीमती वोट अवश्य डालें, ताकि जनता के नेता ऐसे हों,
देश का भला समझें जो , जनता और नेता ऐसे हों ।

           ' ज़रिया ' डा मंजु चावला
Chandigarh 

कुर्सी का खेल / डॉ अनुपमा वर्मा

 कुर्सी का खेल / डॉ अनुपमा वर्मा

राजनीति की बिसात बिछी,
हर मोहरा तैयार है,
कुर्सी जिसकी हाथ लगी,
वही आज सरदार है।
कल तक थे जो साथ-साथ,
आज बने बागी हैं,
इस्तीफे की चिट्ठी लेकर,
सबकी आँखों में आँधी है।
आदेश आया—“शांत रहो”,
सूचना आई—“बवाल है”,
नेता बोले—“सब नियंत्रण में”,
जनता बोली—“क्या कमाल है!”
कहीं भगदड़, कहीं हंगामा,
कहीं भाषणों की भरमार,
एक-दूजे पर आरोप लगाकर,
सब करते अपना प्रचार।
जो कल तक थे मंच के साथी,
आज वही गिरफ्तार हैं,
सियासत के इस खेल में,
कितने चेहरे बेकरार हैं।
बोखलाहट जब बढ़ जाती है,
शब्दों की तलवार चले,
जनता पूछे—“काम बताओ”,
नेता फिर समाचार बने।
कुर्सी बोले—“मुझको बचाओ”,
नेता बोले—“मैं तैयार”,
देश खड़ा है चुपचाप मगर,
पूछ रहा है बारंबार—
“इस्तीफा हो या बगावत हो,
बवाल हो या गिरफ्तार,
जनता के हित में कौन खड़ा है
कौन निभाएगा अपना किरदार?”
राजनीति का खेल रहे,
पर मर्यादा मत हारो,
सत्ता आए, सत्ता जाए,
जनता को मत भूलो यारो!
कुर्सी केवल कुर्सी है,
जनसेवा ही सम्मान,
लोकतंत्र तभी मजबूत बने,
जब जागे हर इंसान।

डॉ अनुपमा वर्मा "हेमा "
Punjab 

Thursday, 27 August 2026

आदेश / उषा पांडे शुभांगी

 आदेश / उषा पांडे शुभांगी

( दोहे )


चलो सत्य के मार्ग पर, मानो पितु आदेश।
कृपा करेंगे देवता, मिट जाएगा क्लेश।।

जग के पालक तीन हैं, ब्रह्मा विष्णु महेश।
वेदों के हर वाक्य को, मानो तुम आदेश।।

गुरु जी देते ज्ञान हैं, दो उनको सम्मान।
देते वे आदेश जो, 
देना उस पर ध्यान।।

दशरथ नंदन राम ने, माना गुरु आदेश। 
सबका तुम इज्जत करो,
दिया हमें संदेश।।

 माता की हर बात को, मानो तुम आदेश।
विजयी होंगे तुम सदा, करें भला सर्वेश।।

करो नहीं अवहेलना, जो माँ  दे आदेश।
मात-पिता सेवा करो, दें आशीष गणेश।।

कष्ट बड़ों को जो दिया, मान
नहीं आदेश। 
भला नहीं उसका हुआ, कहते हैं शैलेश।।

नहीं फैसला लो कभी, जब आवे आवेश।
शांत चित्त आगे बढ़ो, रहे साथ देवेश।।

गौरा जी ने तप किया,  मिले उन्हें महेश।
माना जो आदेश प्रभु, कृपा किये योगेश।।

हरिश्चंद्र ने त्याग दी, सब ऐशो आराम।
माने हर आदेश ऋषि, लिए ईश
निज धाम।।

रहना माता संग ही, जाना नहीं विदेश। 
मान मात आदेश तुम, करना सदा निवेश।।

वेदों का है सार यह, मानो गुरु आदेश। 
पूरे होंगे काम तव, दया करें अखिलेश।।

डॉ० उषा पांडे शुभांगी 
स्वरचित
वैस्ट बंगाल 

राजनीति / संजय वर्मा

 राजनीति / संजय वर्मा

ओ ऊपर वाले

बंद करवाओ ये मुफ्त की रेवड़ी बाटने की राजनीति

ये सहायता गरीबपन को दर्शाती

देश-विदेश में छवि पिछड़ापन लाती है।

राजनीति मुफ्त का माल देती

कर वृद्धि  से बह जाती गरीब की नाव

उत्पादन कोख उजाड़ती जाती राजनीति

इसमें उलझने आए भूखे मरने की नोबत आती

राजनीति मेहनती इन्सान को आलसी बनाती

इससे ही से तो विकास की गाड़ी पिछड़ जाती

खुद और सरकारों को कर्ज में दफ़नाती है।

अर्थव्यवस्था में सुधार के सपने देखना हो तो

मुफ्तखोरी की राजनीति बंद करो

मुपतखोरी की लत लग जाए तो

विकास पर लग जायेगा जंग

कल्याणकारी योजनाएं तमाशा देख कर

राजनीति के संग हो जाएगी दंग।

संजय वर्मा "दृष्टि"