Friday, 22 May 2026

राष्ट्र का आवाह्न - विदुषी प्रज्ञा

राष्ट्र का आवाह्न

*" जागो रे.... अब देश बचाओ वक्त का यह आवाह्न है* ,
*संकट में है देश का गौरव , संकट में स्वाभिमान है* ।

*" स्वर्ण रजत* की कांति मलिन , बाजारों में हाहाकार है ,
*ईंधन* की वेदी पर झुलस रहा , मध्यम वर्ग संसार है ,
*खाध तेल* की लपटों से, जुझ रही जन-जन की थाली है ,
*महंगाई* के इस तांडव ने, हर घर की रौनक हर डाली है ।

*सिंहासन* से गूंज रही आज, विवशता भरी पुकार है ,
*विदेशी मुद्रा* की रक्षा में , संयमित  यहीं व्यवहार है,
त्यागो तुम *परदेश की यात्रा*, देश कोष को अब  बल देना है ,
निजी सुखों की आहुति देकर , हर संकट से लोहा लेना है ।

*वर्जित हो  स्वर्ण-क्रय इस वर्ष* , यह युग का कठिन संदेश है ,
आर्थिक चक्रव्यूह के सम्मुख खड़ा , संकट में आज स्वदेश है ,
*कारपूल* और *जन परिवहन* अगर , जन-जन का हथियार बने ,
    इसी त्याग के बल पर ही *राष्ट्र* को   *आत्मनिर्भरता* की नव श्वास मिले ।

दोषारोपण का समय नहीं , यह राष्ट्र धर्म की बेला है ,
   *वैश्विक संकट* के तूफानों को अकेले भारत ने ही झेला है ,
*देश बचाओ को अब केवल नारा नहीं*, अंतर्मन का संकल्प बनाना है ,
*साधन सीमित*, *निष्ठा असीमित* इसी विकल्प से *भारत* का मान बढ़ाना है...!!

*"सिर्फ हुकूमत को कोसने से यह मंजर नहीं बदलेगा* ,
*जब तक हर शख़्स ना जागेगा , यह वतन कैसे संभालेगा* ? ?

*"जय हिन्द जय भारत"*
लेखिका - विदुषी प्रज्ञा...✍️

सोना - डॉ० उषा पाण्डेय 'शुभांगी'

सोना - डॉ० उषा पाण्डेय 'शुभांगी'

सोना एक धातु है, सबको अच्छा लगता है।
शुभ काम में अक्सर, सोने का जरूरत पड़ता है।
सोना पहन महिलाएं, अपनी शान दिखाती हैं।
उनके सोने का आभूषण देख, अन्य महिलाएं ललचाती हैं।
सोना की जुबान नहीं होती, 
पर बहुत कुछ कह जाता है।
सोना अगर पास हो, आत्मविश्वास बढ़ जाता है। 
कहते हैं, हर चमकती चीज सोना नहीं होती। 
सोना अगर पास हो, 
चेहरे की चमक देखने लायक होती।
सोना होता कीमती, सबके पास नहीं होता। 
सोने का प्रयोग, औषधि बनाने में भी होता।
अन्य धातु पर भी,
सोने का पॉलिश चढ़ता है।
धन और समृद्धि का प्रतीक सोना, मुसीबत में सच्चा साथी बनता है।
शुद्ध सोना खरा है होता।
पीले रंग की बहुमूल्य धातु सोना, सबकी चाहत होता।
कहते हैं, सोना आग में तप कर ही बनता है कुंदन।
हमारे वीर, जो सरहद पर लड़ते हैं, करते हम सब उनका अभिनंदन।
जब दो अच्छी चीजें एक साथ मिल जाए, सोने पर सुहागा कहलाता। 
खूबसूरती और गुण दोनों हो, 
सोने में सुगंध आ जाता।
सोने की चिड़िया कहलाया, अपना भारत देश। 
खुद पर हम गर्व करते हैं, 
जन्म लिए हम इस देश।
ईश्वर ने जो दिया है उसे संभाल कर रखो, जाते देर नहीं लगती। 
सोना मिट्टी हो जाता, देर नहीं लगती।
स्वर्ण पदक जब हमको मिलता,
खुशी का ठिकाना नहीं होता।
जिसके पास सोना नहीं है वह सोचता है, काश मेरे पास भी सोना होता।
बुरे दिनों में सोना साथ निभाता,
सच्चा साथी बन जाता है। 
आजकल सोने पर बैंक कर्ज देता, काम मनुज का चल जाता है।
सोने का महत्व है, क्योंकि यह आग में तपता है।
कठिन परिस्थिति में जो धैर्य रखता,  उसको ही लक्ष्य मिलता है।
सोने जैसा दिल रखो बंधु, औरों के दुख में काम आओ। 
हम भी किसी से कम नहीं, दुनिया को यह बतलाओ।

डॉ० उषा पाण्डेय 'शुभांगी'
स्वरचित

महंगाई की मार - गणपत लाल उदय

महंगाई की मार - गणपत लाल उदय 

विधा - कविता 

महंगाई की मार का शायद अब बज चुका है अलार्म,
विदेशी यात्रा पर रोक लगाओ अब कर दो यह कम।
सूत्रों की माने तो रोजमर्रा चींजों पर भी होगा असर,
सोना-चांदी, डीजल-पेट्रोल का उछाल देख रहें हम।।

हो सकती है बढ़ोतरी अब खाद्य-सामग्रियों के अंदर, 
ये फिजुल ख़र्चा कम करो अब घूमें नही इधर उधर।
बैंक ब्याज दर पर भी पड़ सकता है इसका ये असर,
ईरान युद्ध प्रमुख कारण है जो पार है सात समन्दर।।

ना लड़ना, ना कोई झगड़ना दिन अपने ये काट लेना,
लगेगा झटका मध्यम वर्ग को है सबका ऐसा कहना।
अब प्राकृतिक गैस मे भी आ सकता भरकम उछाल,
किराया बढ़ेगा ऑटो-टैक्सी का यह कष्ट भी सहना।।

सहना है मिलकर के सबको महंगाई वाली अब मार,
इसी का नाम है ज़िंदगी कोई इससे नही जाना हार।
चलते जाना है आशा लिए कभी तो आएगी ये बहार,
जंग तपिश से जल रहा है आज सम्पूर्ण यह संसार।। 

अर्थशास्त्रियों ने चेताया अतिशीघ्र होगा यह बदलाव, 
तले-भुने पदार्थों को कम कर बदले अपना स्वभाव।
न लेना कोई इसे हल्के में न समझे शासन का दबाव,
सारासच लिखा है हमने इस कविता में अपने भाव।।

सैनिक की कलम 

गणपत लाल उदय अजमेर राजस्थान 

देश - महाकवि डा अनन्तराम चौबे अनन्त

अंतरराष्ट्रीय हिन्दी साहित्य मंच हमारी वाणी 
साप्ताहिक प्रतियोगिता हेतु 
विषय.... देश - महाकवि डा अनन्तराम चौबे अनन्त 

भारत देश हमारा है
हमें जान से भी प्यारा है ।
भारत देश में जन्म लिया 
ये भी सौभाग्य हमारा है।

आस्था और धर्म का देश है
पावन पवित्र कुंभ का देश है ।
साधू संत मुनियों का देश है
त्रिवेणी संगम गंगा का देश है ।

सोने की चिड़िया भारत था
वो भारत फिर से बनाना है ।
सुख शांति समृद्धि यहां हो
ऐसा ही हिन्दुस्तान बनाना है ।

आतंकवाद और भ्रष्टाचार से
मुक्त हो ऐसा देश बनाना है ।
आरक्षण की वैशाखी न हो
ऐसा हिन्दुस्तान बनाना है ।

सारा सच भारत देश हमारा है 
और सबसे सुन्दर प्यारा है ।
मिल जुलकर हम सब रहते हैं
ऐसा हिन्दुस्तान हमारा है  ।

गंगा जमुना सरस्वती 
नर्मदा कावेरी ताप्ती हैं।
पावन पवित्र इन नदियों की
महिमा भी सुन्दर लगती है ।

ऐसा हिन्दुस्तान हमारा है
आपस में भाई चारा है ।
एकता आपस में रहती है
ऐसा सुन्दर देश हमारा है ।

धरती माता हैं गौ माता हैं
एक जगत जननी भी माता है ।
बच्चों को हर मां जन्म देती है
स्नेह प्यार और देती ममता है ।

सभी धर्मों का आदर करते हैं
आपस में भाई चारा रखते हैं ।
ये ऐसा सुन्दर देश हमारा है
लोकतंत्र के इस देश में रहते हैं ।

त्योहार सभी मिलके मनाते
दशहरा हो या हो दीपावली ।
भाई बहिन का रक्षाबंधन हो
और रंगों भरी मनाते हैं होली ।

देश की अलग-अलग भाषाएं हैं
और अलग प्रदेशों की बोली है ।
हिन्दी मराठी पंजाबी गुजराती 
तमिल तेलुगू मलयाली बुन्देली है।

ऐसा प्यारा ये देश हमारा 
हमें जान से भी प्यारा है ।
आन बान और शान से रहते
देश की शान तिरंगा प्यारा है ।

आस्था और धर्म का देश है
पावन पवित्र कुंभ का देश है ।
साधू संत मुनियों का देश है
त्रिवेणी संगम गंगा का देश है ।

लक्ष्मी बाई अहिल्या बाई 
रानी दुर्गावती का देश हमारा ।
चन्द्रशेखर आजाद सुभाषचंद्र बोस 
भगत सिंह का देश हमारा ।

योगी और बिस्वा शर्मा जैसा
देश को मुख्यमंत्री चाहिए ।
आरक्षण एस सी एस टी एक्ट 
यू जी सी कानून देश को नहीं चाहिए 

आरक्षण की वैशाखी नही चाहिए 
समान शिक्षा सभी को चाहिए ।
आर्थिक रूप से जो गरीब  है
उनको आर्थिक मदद चाहिए ।

श्रीराम और श्रीकृष्ण का 
ऐसा सुन्दर देश हमारा है ।
भगवान को यहां पूजा जाता है
ऐसा पवित्र देश हमारा है ।

रामायण गीता को यहां 
घर घर में पूजा जाता है ।
देवी और देवताओं को 
श्रद्धा से पूजा जाता है ।

  महाकवि डा अनन्तराम चौबे अनन्त 
   जबलपुर म प्र/

जिंदगी का भरोसा नही - संजय जैन "बीना"

जिंदगी का भरोसा नही - संजय जैन "बीना" 
विधा : कविता

अभी तो हम जिंदा है
अगले पल का भरोसा नही। 
जन्म मृत्यु पर तुम देखो
जोर किसी का चलता नही।। 

जरूरतो को पूरा करना
सबके बस की बात नही। 
इरादा पक्का करना ही
इसका मूल आधार है।। 

हमें और तुमको भी अब
समझना बहुत जरूरी है। 
जमाने के अनुसार भी
हमें चलना जरूरी है।। 

अगर तुम चल नही पाएं
तो जी भी नही पाओगें। 
इसलिए इस युग में तुम्हें
संभलकर चलना पड़ेगा।। 

लोगों का ईमान तुम देखो
सदा ही डोलता रहता है। 
मन की लालच का इसमें
रोल बड़ा जो होता है।। 

कभी खुशियाँ आती है
तो कभी दुख भी आते है। 
पर दोनों परस्थितियों में 
जो सामंजस्य रख पाते है।। 

सफल जीवन भी जीते है
और ऊँचाइयों को छूते है। 
गुरु मंत्र अपना ये सबको
निस्वार्थ भाव से सुनाते है।। 

जय जिनेंद्र
संजय जैन "बीना" मुंबई