Wednesday, 19 August 2026

शरीर / अनीता चमोली

 शरीर / अनीता चमोली

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हमारा शरीर ईश्वर निर्मित प्रकृति का उपहार है।
जो मिलता है हमे हमारे माता पिता से। 
जिसका धर्म से कोई लेना देना नहीं l
फिर हम क्यो बट गये हिंदू मुस्लिम सिख ईसाई मे।
जब ये जमीं बनी तो धर्म नही था  बस एक दिल था शरीर मे
जो धडकता रहा होगा हर एक के लिये क्योंकि उसमे जिंदा रही होगी इंसानियत।
आज न इंसानियत है न धर्म का ज्ञान।
बस एक शरीर है जिसने जहाँ जन्म लिया वो उसी धर्म का हो गया। 
जबकि उसे ज्ञात ही नही धर्म रूपी इंसानियत का।
बन रहे है धार्मिक चल रहे है बिना कुछ जाने उसके नियमों को 
और लड रहे है आपस मे क्योंकि शरीर पाया है सबने अपने अपने धर्म मे।
आधुनिक संस्कार विहीन समाज मे आज धर्म की पहचान सिर्फ शरीर है सिर्फ शरीर।
     अनीता चमोली "अनू"
      देहरादून (उत्तराखंड)
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आत्मा / संजय वर्मा

आत्मा / संजय वर्मा

मौत को देखा है सिसकते हुए 
देखा है वटवृक्ष को निढाल होते हुए 
जिसकी छत्र छाया में पनपे सभी 
उनके लिए आँसू बह निकले 
एक- एक आंसूं है उनकी यादों के 
वो उनकी हर बातों को कह निकले 
कुछ तो बात होगी उनमें जो
हर उम्मीद पर वो खरे उतरे 
जब -जब भी परखा सबने 
साहित्य के कवि  का न रहना 
परख की बेबसी अब सब के सामने 
खड़ी है पोखरण की तरह 
चाहत है  आत्मा बन जाए वैसा रूप 
ऊपर वाला क्या बना सकेगा 
वैसा ही स्वरूप जो निर्णय ले सके 
दुनिया को हिलाने का 
समझ सके हर एक की बातें 
शायद, एक स्वप्न था भारत का 
मृत्यु भी तो अटल सत्य है 
मगर आत्मा अजर अमर 
वो है देश के आसपास।


संजय वर्मा "दृष्टि '
मनावर (धार )मप्र

कविता / दीपक अनंत राव

 कविता /  दीपक अनंत राव

किसी से मिलेगी अब,
खोई हुई मेरी पहचान၊
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​मेरी कक्षा में
एक छात्र ने पूछा कि
दोस्ती का क्या मतलब होता है?
​अकेला रहना,
अपनी ही छाया में चलना,
आईने से बातें करना,
आसमान के तले अपने छाते में रहना,
आरज़ू का मतलब न समझना,
आँसुओं की नमी न पहचानना,
दर्द की दवा न अपनाना,
जिसे यह सब लगे,
वह दोस्ती का क्या मतलब समझता है?
​वह रोज़ ढूँढता था,
रोज़ ढूँढता है,
जवाब कई सवालों का,
जो घर में दादा जी, 
परदादा दोहराते थे,
जो बातें बुजुर्ग कहा करते थे।
​सवालों के ऊपर सवाल, कड़वे सवाल၊
खेत क्या है, 
कैसे दिखता है?
पेड़ का क्या मतलब होता है?
घोंसले में कौन रहता है,
नदी का क्या अस्तित्व है,
लहरों का कैसा निमंत्रण है,
वनस्पति का क्या संदेश है?
​आज वह टूटा हुआ 
एक पुराना टुकड़ा लेकर,
पूछता है कि इसमें क्या रगड़ा हुआ-सा है!
वह 'स्लेट' पर हिंदी का पहला शब्द
'अ' ही चमकता था!
​तकनीक की दुनिया में,
शीतलीकृत सभ्यता में,
कुछ कड़े सवालों के जवाब,
किसी को भी कभी मिलते ही नहीं।
​अब कहीं भी बचा है,
सिर्फ एक नारा मोबाइल फोन का၊
अन्य कई नारे बरसों पहले 
इतिहास हो चुके हैं।
​मैं चुप रहा,
सहमा, लेकिन
बच्चा हमेशा बच्चा ही होता है,
वह अपनी बातें दोहराने को सदा उत्सुक था।
​सभ्यता की बैसाखी को मैंने
ज़मीन में गाड़कर
पल-पल, पल-भर
घसीटता रहा, चलता रहा।
​अंत में किसी सवाल के बिना
एक वल्मीक में छिपा हूँ मैं।
किसी से मिलेगी अब, 
खोई हुई मेरी पहचान ॥

®©दीपक अनंत राव,
कवि एवं अध्यापक
केरलम

Tuesday, 18 August 2026

समझौता / संगीता अहलावत

 समझौता / संगीता अहलावत

जब व्यक्तियों के विचारों में भिन्नता होती है फिर संबंधों को निभाया जाता है तो उस व्यवहार को समझौता कहा जाता है l 
प्रत्येक व्यक्ति अपने में भिन्न होता है l उसकी पसंद, जरूरत, उसकी चाहत सब एक दूसरे से अलग होता है l परिवार हो चाहे या घर के बाहर का समाज, हर जगह जब आप एक ध्येय से चलते हैं तो कई बातों में भिन्नता होने पर भी एक राय या एक फैंसले पर आना पड़ता है l 
परिवार में अगर पाँच सदस्य हैं तो भी सभी पसंद उनकी खुशी, उनकी सोच सब अलग होता है लेकिन सभी लोग मिलजुलकर रहते हैं l ऐसे ही जब आप नौकरी करते हैं या व्यवसाय करते है आपको हर जगह दो बातें सुननी पड़ती है और उनकी बात चाहे अनचाहे  माननी पड़ जाती है l समझौते को केवल झुकना नहीं माना जा सकता है, बल्कि धैर्य, समझदारी से कुछ बातों को मानना और एक साथ मिलकर काम को भी कहा जा सकता है l कभी - कभी समझौता थोड़ा सा किसी के न्यायपूर्ण हो सकता है और किसी के लिए अन्यायपूर्ण भी हो सकता है और किसी के लिए अन्यायपूर्ण भी हो सकता है l समझौता तभी अच्छा होता है जब किसी को इसका नकारात्मक पहलू झेलना न पड़े l ये भी कहा जा सकता है कि समझौता जीवन का अनुपम पहलू है जिसकी वजह से कई समस्याओं का समाधान भी होता है l जैसे अगर कोई व्यक्ति आक्रामक प्रवृत्ति का होने के कारण जिद्दी भी हो और वह अनैतिक माँग या अनैतिक कार्यों में लग जाए तो समाज में अशांति और कुकृत्य भी हो सकता है l 
एक दूसरे का सहयोग करना भी समझौते की कड़ी है l घर हो या कार्यस्थल, शिक्षा क्षेत्र, स्वास्थ महकमा या सुरक्षा से संबंधित विभाग, कहीं पर भी बिना समझौते या सहयोग के काम सफल नहीं हो सकता है l कंपनी हो या व्यवसाय, राजनीति, सामाजिक कार्य बिना टीमवर्क कार्य सरलता से हो जाए ऐसी संभावना भी नहीं की जा सकती है l 
समझौते के देखे जाएं तो बहुत सारे 4फायदे भी हैं जैसे इसके कारण गलतफहमियां दूर होती हैं l संवाद से समाधान होता है l तनाव दूर होता है और इस वजह से सभी मिलजुल कर कार्य करते है, लेकिन यहाँ पर ये भी मानना होगा कि अगर समझौते में अपमान, अन्याय, झूठ और नैतिक मूल्यों का पतन हो तो ऐसे समझौतों को स्वीकार नहीं करना चाहिए l 
अंत में समझौता वही अच्छा होता है जिसमें सम्मान कायम रहता है, अन्याय नहीं होता है l जिसमें एक दूसरे के हित का ध्यान रखा जाता है और जिस समझौते से जीवन खुशहाल होता है l 
समझौते की सफलता का श्रेय छोटे- छोटे मतभेदों को दूर कर खुशियों को बटोर कर जीने में है l

          - संगीता अहलावत
उत्तर प्रदेश 

नया दौर: कॉकरोच पार्टी और Gen-Z का धमाका / जौली अंकल

     

                                  नया दौर: कॉकरोच पार्टी और Gen-Z का धमाका / जौली अंकल

 
आजकल देश की हवा में कुछ अलग ही ताज़गी देखने को मिल रही है। वही पुरानी सियासी गपशप और वही टी-स्टॉल वाली बहसें हैं, लेकिन इस बार कहानी में एक बड़ा मोड़ आ चुका है। सालों से हमारे देश का आम आदमी एक आदर्श मौनव्रती बना हुआ था। उसने सरकारी दफ्तरों के चक्कर काटे, बिल भरे, टैक्स दिए और चुपचाप सिर झुकाकर निकल गया। सरकारें भी आराम से कुंभकर्णी नींद सो रही थीं, क्योंकि उन्हें पता था कि जनता के पास सवाल पूछने की फुरसत ही कहाँ है। लेकिन अब पर्दा उठ चुका है और मंच पर आज की नई Gen-Z पीढ़ी की धमाकेदार एंट्री हो चुकी है। इस नई पीढ़ी ने वह अद्भुत कार्य कर दिखाया है जो बड़े-बड़े राजनेता भी वर्षों में नहीं कर पाए। इन्होंने सोती हुई सत्ता को झकझोर कर जगा दिया है और आम आदमी को उसकी खोई हुई आवाज़ पुनः लौटा दी है।
 
इस नए दौर की सबसे दिलचस्प और क्रांतिकारी उपज कॉकरोच पार्टी का जन्म है। अब आप सोचेंगे कि भला कॉकरोच पार्टी का राजनीति से क्या संबंध हो सकता है। ज़रा गहराई से विचार कीजिए। कॉकरोच वह जीव है जिसे आप जितना भी दबाने का प्रयास करें, वह किसी भी कोने या दरार से बाहर निकल ही आता है। ठीक उसी प्रकार, आज का युवा किसी भी तानाशाही या उपेक्षा के आगे झुकने वाला नहीं है। सोशल मीडिया के डिजिटल माध्यमों से लेकर सड़कों पर शांतिपूर्ण प्रदर्शनों तक, युवाओं ने यह स्पष्ट कर दिया है कि उन्हें नज़रअंदाज़ करना अब किसी के लिए भी संभव नहीं है। अब प्रत्येक राजनेता और प्रशासनिक तंत्र को यह भली-भांति समझ आ गया है कि देश की सबसे बड़ी सामर्थ्य कोई कागज़ी फाइलें नहीं, बल्कि इस देश की युवा शक्ति है। Gen-Z का यह आत्मविश्वास और दृढ़ संकल्प सच में अनुकरणीय है।
 
यहाँ हमारे आदरणीय अभिभावकों को भी अपने दृष्टिकोण में थोड़ा परिवर्तन लाने की आवश्यकता है। प्रायः घर के बुजुर्ग बच्चों को सलाह देते थे कि इन पचड़ों में मत पड़ो और केवल अपनी पढ़ाई व नौकरी पर ध्यान दो। अब वह समय बीत चुका है। बच्चों को अधिक संवेदनशील या भयभीत मत बनाइए। उन्हें प्रारंभिक जीवन से ही अपने न्यायसंगत अधिकारों के लिए तत्पर रहना और निर्भीकता से संवाद करना सिखाइए। यदि बचपन में अपने अधिकारों के लिए बोलना नहीं सीखा, तो भविष्य में समाज और राष्ट्र के प्रति अपने दायित्वों को निभाना कठिन हो जाएगा। देश का युवा यदि आज अपनी बात स्पष्टता से रख रहा है, तो यह उसकी बदतमीज़ी नहीं, अपितु एक सशक्त और जागरूक राष्ट्र के निर्माण का संकेत है।
 
दूसरी ओर हमारी सरकारों को भी यह तथ्य स्वीकार करना होगा कि जनता ने यदि आपको जनप्रतिनिधि चुना है, तो आपकी प्रथम प्राथमिकता जनता के प्रति पूर्ण जवाबदेही होनी चाहिए। चुनाव के समय तो हाथ जोड़कर जनता जनार्दन के समक्ष नतमस्तक हुआ जाता है, परंतु सत्ता प्राप्त होते ही जनहित को पृष्ठभूमि में धकेल देना उचित नहीं है। अब कोई भी नया नियम, नीति या योजना लागू करने से पूर्व यह गहन विचार करना आवश्यक है कि क्या यह निर्णय वास्तव में जनकल्याण के अनुकूल है या नहीं। आधुनिक लोकतंत्र में एकतरफा आदेशों से शासन नहीं चलाया जा सकता। अब तो आपसी समन्वय, निरंतर संवाद और पूर्ण पारदर्शिता से ही कुशल प्रशासन संभव है।
 
सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि एक स्वस्थ लोकतंत्र में प्रश्न पूछने की संस्कृति को सदैव प्रोत्साहित किया जाना चाहिए। यदि कोई जागरूक नागरिक या युवा सरकार से विकास कार्य अथवा सार्वजनिक नीतियों पर प्रश्न करता है, तो उसे किसी भी प्रकार की नकारात्मक संज्ञा देना सरासर अनुचित है। तर्कसंगत प्रश्न पूछना प्रत्येक नागरिक का संवैधानिक अधिकार है, कोई राष्ट्रविरोधी कृत्य नहीं। लोकतंत्र की वास्तविक सुंदरता इसी में निहित है कि जनता निसंकोच प्रश्न करे और सरकार पूर्ण विनम्रता व उत्तरदायित्व के साथ उसका समाधान प्रस्तुत करे। जौली अंकल भी इस बात को मानते है की इस नए दौर ने यह सिद्ध कर दिया है कि जब देश का युवा संकल्पबद्ध होकर जागृत होता है, तो परिवर्तन की एक नई कहानी लिखी जाती है। इसलिए मुस्कुराते रहिए, जागरूक बने रहिए और इस नए दौर की सकारात्मक ऊर्जा का मज़ा लीजिए।
- जौली अंकल